रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके अनुसार महात्मा बुद्ध ही अपने पूर्व जन्म में राम पण्डित थे। अतः बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल होने के कारण रावणवध का अभाव स्वाभाविक है । बौद्ध जातकों की शैली के अनुसार राजधानी अयोध्या न होकर वाराणसी है। वनवास का स्थान हिमालय है जो बौद्ध कथाओं में अत्यन्त लोकप्रिय है और जिसका उल्लेख जातकों में निरन्तर होता रहता है । वनवास का कारण विमाता के षड्यन्त्रों का भय है जो अनेक बौद्ध कथाओं में भी मिलता है। राम और सीता, भाई-बहन का विवाह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कहा जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बौद्धसाहित्य में कई उदाहरण प्रस्तुत हैं। दशरथ के अन्तकाल के विषय में ज्योतिषियों का कथन असत्य सिद्ध होता है। इसमें भी चिन्तामणिवैद्य बौद्ध-प्रभाव देखते हैं। बौद्धों की ज्योतिषियों में जो अरुचि थी वह इस भूल में प्रगट की गयी है। सारांश यह है कि दशरथजातक में जो आन्तरिक असङ्गति मिलती है वह वाल्मीकीय कथा को इस जातक का आधार होना सिद्ध करती है । दूसरी ओर जातक तथा रामायण में जो अन्तर पाये जाते हैं वे भी उपर्युक्त कारणों से स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। बौद्ध साहित्य में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, उसके विश्लेषण से सिद्ध होता है कि दशरथ- जातक के गद्य में जो वृत्तान्त प्रस्तुत हुआ है वह तो वाल्मीकीय कथा का विकृत रूप है ही, किन्तु इस जातक की गाथाओं का भी मूल स्रोत बौद्ध नहीं है। फिर भी इनका आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण भी नहीं हो सकता, अतः ये गाथाएँ पुराने आख्यान काव्य पर निर्भर होंगी ।”१ बुल्के का उपर्युक्त कथन तब सत्य होता जब कि वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण जैसे ग्रन्थों की बौद्धग्रन्थों से अतिप्राचीनता सिद्ध न होती । वेद, उपनिषद् अनादि हैं और रामायण राम के समकाल की रचना है। यह बात वा० रा० १म काण्ड तथा तर्कों द्वारा सिद्ध की जा चुकी है, अतः रामायण को ही उन गाथाओं का मूल स्रोत मानना उचित है । जयद्दिसजातक और वेस्संतरजातक की कथाएँ वाल्मीकिरामायण की प्रतिच्छाया हैं, यह भी कहा जा चुका है । सामजातक (सं० ५४०) का वृत्तान्त रामायण की अंधमुनि-पुत्रवधसम्बन्धी कथा का अन्य रूप है। बौद्ध जगत् मे इस जातक की लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि साँची और अमरावती के स्तूपों पर तत्सम्बन्धी चित्र अङ्कित किये गये हैं। अन्ध मुनि के पुत्र की कथा रघुवंश नवें सर्ग में भी मिलती है पर ये वृत्तान्त रामायण की तत्सम्बन्धी कथा पर निर्भर हैं; और सामजातक से कोई सीधा सम्बन्ध नही रखते । सामजातक का संक्षिप्त वृत्तान्त इस प्रकार है--निषादों के कुल में उत्पन्न दुकूलक छोर पारिका हिमालय प्रदेश के किसी आश्रम में तपोमय जीवन बिताते हैं। विवाहित होकर भी वे ब्रह्मचारी ही रहते हैं। बोधिसत्व अलौकिक रीति से पारिका के गर्भ से जन्म लेते हैं और साम कहलाते हैं। साम के १६ नर्ष में दुकूलक और पारिका दोनों को एक सर्प अन्धा कर देता है। उसी समय से साम अपने माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा करने लगता है। एक दिन साम पानी लेने किसी नदी पर जाता है और वहीं काशीराज के विष-दिग्ध बाण से विद्ध हो जाता है। राजा उसके पास जाता है ! साम को किञ्चित्मात्र भी क्रोध नहीं होता, परन्तु वह अपने माता-पिता के भाग्य पर फूट-फूट कर रोता है। राजा उसके माता-पिता के पास जाकर उसके वध का समाचार सुनाता है। समाचार सुनकर दोनों विलाप करने लगते हैं। तदनुसार उनके कहने पर राजा उनको मृत पुत्र के पास ले जाते हैं। वहाँ पहुँचने पर १. रामकथा, पृ० ९४-९६ ।