रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७३ मर्मस्पर्शी विलाप करते हुए शपथ करते हैं। पारिका कहती है कि "यदि मेरा पुत्र माता-पिता का सच्चा भक्त था तो विष लुप्त हो जाय" दुकूलक भी अपने और अपनी पत्नी के नाम पर शपथ करता है। वनदेवी भी उन्हीं की तरह शपथ करती है। साम उठ बैठता है और राजा का स्वागत करते हुए कहता है कि मैं मूर्च्छित हुआ था, जो माता- पिता की सेवा करता है वह दोनों लोकों में सुख पाता है। तदनन्तर साम राजा पिलियक को राजधर्म का उपदेश देता है। रामायण की कथा में आहत मुनि-पुत्र उत्तेजित हो जाता है, उसके माता-पिता का विलाप भी अत्यन्त कारुणिक एवं अधिक हृदय-स्पर्शी है और वह पुनः जीवित भी नहीं होता इन अन्तरों के रहते हुए भी दोनों वृत्तान्तों का पारस्परिक सम्बन्ध सन्दिग्ध नहीं कहा जा सकता। रामायण और गाथा की कथाओं में शाब्दिक साम्य भी हैं। उदाहरणतः - "इयमेकपदी राजन् ।” (वा० रा० २।६३।४४) "अयं एकपदी राज।" (गाथा २९) "वृद्धौ च मातापितरावाहं चैकेषुणा हतः ।” (वा० रा० २।६३।३२ ) "अदूसक पितापुत्ता तयो एकेसूना हता।" (गाथा ३९ ) "कन्दमूलफल हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम् । भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम् ॥” (वा० रा० २।६४।३४) "को दानि भुजयिस्सति वनमूलफलानि च । सामो अयं कालकतो अंधानं परिचारक ॥" (गाथा ८५) बुल्के के कथनानुसार "सामजातक के सरल वृत्तान्त में इस रामकथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है। यह वृत्तान्त रामकथा से स्वतन्त्ररूप में भी प्रचलित था और कालान्तर में रामायण की कथा में उसे एक नया और काव्यात्मक रूप मिला।" बुल्के की यह मान्यता असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की प्राचीनता सिद्ध है। इतना ही नहीं, इस स्थिति में यही युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है कि कथा के इस अंश को भी बौद्धों ने वाल्मीकिरामायण से लेकर अपने साँचे में ढाल लिया है। यदि रामायण में बौद्ध-कथा का अनुकरण किया गया होता तो मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और माता-पिता के शपथ से उसके जी उठने जैसे अंश भी अवश्य ही अनुकृत होते । जैसे इतर प्राकृत संस्कृत का अपभ्रंश है वैसे ही उक्त प्राकृत गाथाएँ भी संस्कृत रामायण का ही अपभ्रंश एवं विकृत रूप हैं। 'प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्' इस प्राकृत नियम के अनुसार संस्कृत प्रकृति है उससे उत्पन्न होनेवाली भाषा प्राकृत है। वेस्सन्तर जातक यह जातक बौद्ध जगत् में सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसकी ७८६ गाथाओं में राजकुमार वेस्सन्तर की दानवीरता का चित्रण हुआ है। कथावस्तु इस प्रकार है। राजकुमार वेस्सन्तर ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं किसी भी माँगी हुई वस्तु के देने से इनकार नहीं करूँगा। देश की भलाई का ध्यान न रखते हुए उसने एक अलौकिक हाथी दान में दे दिया। दण्डस्वरूप उसको वनवास दिया गया। उसकी पतिभक्त पत्नी मद्दी और दो पुत्र उसके साथ गये। वह चार घोड़ों के रथ में चले। पथ में एक ब्राह्मण भिखारी ने रथ माँग लिया। वेस्सन्तर ने उसे