भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 251

१७४ रामायणमीमांसा पञ्चम निःसङ्कोच रथ दे दिया। अन्त में चारों एक कुटी में पहुँचकर वहाँ निवास करने लगे। तब सक्क (शक्र) एक कुरूप ब्राह्मण के वेश में दिखायी पड़े और उन्होंने वेस्सन्तर के दोनों पुत्रों को दास के रूप में माँगा और प्राप्त किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण ने पत्नी को भी माँग लिया। इसपर ब्राह्मण अपना परिचय देता है और कथा आनन्दपूर्वक समाप्त होती है। मद्दी कहती है— 'अवरुद्धस्सहं भरिया राजपुत्तस्य सिरीमतो। तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता॥' (गाथा ५४१) मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राजकुमार की भार्या हूँ। अनुगामिनी सीता जिस तरह राम का आदर करती थी इस तरह मैं इनका आदर करती हूँ। इस जातक में अनेक स्थलों पर रामकथा से मिलते-जुलते प्रसङ्ग मिलते हैं। राम के समान वेस्सन्तर का वनवास के पहले दान देना, कौशल्या तथा वेस्सन्तर की माता का विलाप, वन और कुटी का वर्णन। मद्दी और सीता दोनों अपने पति के साथ वन जाने का अनुरोध करती हैं। 'अग्गिं निज्जालायित्वान एकजालसमाहितम्। तत्थ मे मरणं सेय्यो यं चे जीवे तया विना॥' (गाथा ७३) "यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि। विषमग्नि जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥" (वा० रा० २।२९।२१) पूर्वोद्धृत गाथा में मद्दी ने तो स्पष्टतः सीता का उल्लेख किया है।२ बुल्के कहते हैं "वेस्सन्तर जातक का रचयिता रामकथा से परिचित था, लेकिन वह रामायण भी जानता था, इसके लिए वेस्सन्तर जातक में कोई आधार नहीं मिलता।"३ वस्तुतः रामायण की कथावस्तु का ज्ञान रामायण से ही हो सकता हूँ। उससे भिन्न अनुपलब्ध एवं अश्रुत उपाख्यानों एवं गीतों को गाथाओं का आधार मानना सर्वथा निर्मूल है। उपस्थित का परित्याग कर अनुपस्थित की कल्पना ही युक्ति-रहित एवं अमान्य है— "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्।" संबुला जातक इस 'जातक' की गाथा रामायण की कथा से कुछ मिलती है। गाथा (५१९) में पतिभक्त संबुला का वृत्तान्त दिया गया है। अपने कुष्ठरोगी पति राजकुमार सोत्थिसेन के साथ वनवासी बन कर उसकी सेवा में अपना जीवन बिताती है। किसी दिन दानव संबुला को वन में देखता है और उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता है। संबुला अस्वीकार करती है और सक्क (शक्र) द्वारा बचायी जाती है। इस घटना का वृत्तान्त सुनकर सोत्थिसेन अपनी पत्नी के सतीत्व पर सन्देह करता है। यह देख कर संबुला एक 'सच्चकिरियम् (सत्यक्रिया) द्वारा अपने पति को नीरोग कर देती है। "तथा मं सच्चं पालेतु पालयिस्सति चे ममं। यथानं नाभिजानामि अञ्जं पियतरं तया॥ रतेन सच्चवज्जेन व्याधि ते वूपसम्मति (उपशमति)।" (गाथा २७) १. रामकथा—पृष्ठ ९९-१००। २. "तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता।" (५४१) ३. 'रामकथा' पृ० १००।