रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७५ इसके बाद दोनों राजधानी लौटते हैं। कृतघ्न सोत्थिसैन अन्य स्त्रियों के साथ विलास करके अपनी पत्नी को दुःख देता है। अन्त में अपने पिता के कहने पर वह संबुला से क्षमा माँगता है और दोनों का जीवन सुखमय बन जाता है। संबुला और सीता दोनों वनवासी पति की सेवा करती हैं। संबुला की सच्चक्रिया सीता की अग्निपरीक्षा के समय की शपथ का स्मरण दिलाती है। दानव और रावण दोनों की धमकी में भी शाब्दिक समानता मिलती है। “यदि तुम मेरी महिषी बनने के लिए सहमत न हुई तो तुम मेरा प्रातः का भोजन (पातराशाय—प्रातराश) बन जाओगी। “नो चे तुवं महेसेय्यं संबुले कारयिस्ससि । अलं त्वं पातरासाय मज्जे भक्खा भविस्ससि ॥” ( गाथा १० ) "द्वाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् । मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥”१ ( वा० रा० ५।२२।९ ) यह कथा भी परम प्रसिद्ध एवं व्यापक रामायण की रामकथा के अंश का सङ्कलन ही प्रतीत होती है। इन कथाओं को रामकथा का मूल मानना उपहासास्पद है । महासुतसोम जातक इस जातक की गाथा (नं० ५३७) भी अत्यन्त एकदेशीय है। 'महासत्तो' (बोधिसत्त्व) एक 'पोरिसाद' (पुरुषाद) को भर्त्सना देकर कहता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्खा खत्तियेन पजानता । अभक्खं राजा भक्खेसि ततमा अधम्मिको तुव ॥ ( गाथा ५८ ) यह राम के प्रति वाली की उक्ति का स्मरण दिलाता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव ।” ( वा० रा० ४।१७।३९ ) श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा । भक्ष्यान् पञ्चनखेष्वाहुः” ( मनु० ५।१८ ) दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि “जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने अपनी सामग्री प्राप्त की है और इसे अपनी अमर रचना के नये साँचे में ढाला है।” किन्तु यह मत प्रमाणशून्य है। जातकों में रामकथा से सीधा सम्बन्ध रखनेवाली सामग्री इस प्रकार है— 'शोकापनोदन' का एक छोटा सा भाषण, जलक्रिया के विषय में एक गाथा, राम के राज्यकाल के विषय में एक गाथा, राम का दण्डकारण्य में वनवास का उल्लेख और सीता का अपने पति के साथ वन गमन का उल्लेख । इसके अतिरिक्त वेस्संतरजातक की कथावस्तु रामायण के वृत्तान्त से कुछ मिलती जुलती है । संबुला तथा महासुतसोम जातक में एक गाथा पायी जाती है। जिसका रूपान्तर रामायण में भी मिलता है। सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र के वध की कथा का आधार माना जा सकता है। १. रामकथा, पृष्ठः १०१ ।