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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 253

१७६ रामायणमीमांसा पञ्चम बुल्के कहते हैं “इस सामग्री की अल्पता का ध्यान रखकर यह निस्सङ्कोच कहा जा सकता है कि समस्त रामायण का आधार पाली गाथाओं में ढूंढना व्यर्थ है। रामायण रामकथा-सम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर है और इस आख्यान काव्य की थोड़ी सी सामग्री पाली गाथाओं में आ गयी है। इसका अर्थ यह है कि जिस समय पाली तिपिटक बनता रहा ( चौथी शताब्दी ई० पू० ) उस समय रामकथा को लेकर पर्याप्त मात्रा में आख्यान-काव्य की रचना हो चुकी थी । आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता है कि रामायण की भी रचना हो चुकी थी ।” बुल्के कहते हैं “उपर्युक्त सामग्री से ऐसा प्रतीत नहीं होता । सामजातक के अतिरिक्त पाली तिपिटक में केवल पांच गाथाओं में रामायण के श्लोकों से शाब्दिक समानता पायी जाती है। यदि रामायण जैसे महाकाव्य की रचना हुई होती तो गाथाओं के कवि इससे कहीं अधिक प्रभावित हुए होते । इसके अतिरिक्त रामायण की अपेक्षा पाली तिपिटक की सामग्री पुराने आख्यान काव्य की शैली और छन्द से कहीं अधिक निकट है। सामजातक के वृत्तान्त में भी सम्भवतः अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है ।”१ बुल्के के कथनानुसार सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनि के पुत्र के वध की कथा का आधार माना जा सकता है। परन्तु वह सङ्गत नहीं है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण बुद्ध से अति प्राचीन है। आधुनिक दृष्टिकोण से भी मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और पुनर्जीवित हो जाने आदि कथाओं का वाल्मीकिरामायण में अनुकृत न होने से रामायण में उनका अनुकरण सङ्गत नहीं । उपर्युक्त उद्धरणों से यह भी स्पष्ट है कि रामायण के रचना-काल-सम्बन्धी ( बुल्के द्वारा दिये गये ) तर्क भी निस्सार हैं, क्योंकि उनके ही कथनानुसार पर्याप्त मात्रा में आख्यान काव्यों की रचना हो चुकी थी; फिर 'गाथा' के कवि उनसे क्योंकर प्रभावित नहीं हुए ? साथ ही एक और प्रश्न उठता है । अपार बौद्ध-साहित्यान्तर्गत रामकथा सम्बन्धी सामग्री इतनी कम मात्रा में क्यों मिलती है ? वस्तुतः तो रामकथासम्बन्धी उपाख्यानों एवं गीतों का मूल भी वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण ही हैं । रामायण महाकाव्य के विद्यमान रहने पर भी बुद्ध के अनात्मवाद, अनीश्वरवाद और वेदाप्रामाण्यवाद का प्रभाव होने के कारण बौद्धों की वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण की ओर प्रवृत्ति कम ही हुई। बुल्के भी स्वीकार करते हैं कि “आगे चलकर बौद्धों में रामकथा की लोकप्रियता घटने लगी” ।२ सर्वसम्मति से उस समय रामायणमहाकाव्य के विद्यमान रहने पर भी ऐसा क्यों हुआ ? इसका कारण कहा ही जा चुका है । तिपिटक के ५४७ जातकों में यक्ष, दानव, नाग, रक्खस, बन्दर और अन्य असंख्य पशु आदि के विषय में कितनी ही कहानियाँ मिलती हैं; परन्तु कहीं भी राक्षस रावण अथवा हनुमान् आदि रामायण के अन्य कपियों का उल्लेख नहीं हुआ है । निष्कर्ष यह कि तिपिटक के रचनाकाल में रामकथासम्बन्धी स्फुट आख्यान काव्य प्रचलित हो चुका था । लेकिन रामायण की रचना उस समय नहीं हो पायी थी ।”३ उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार 'तिपिटक' के ५४७ जातकों में राक्षस रावण और हनुमान् आदि का उल्लेख न होना रामायण के रचनाकाल के निर्णय के अपर्याप्त प्रमाण है। केवल इस आधार पर यह कदापि नही कहा जा सकता कि उस समय रामायण की रचना ही नहीं हुई थी । स्वयं बुल्के के कथनानुसार रामकथासम्बन्धी अन्य उपाख्यान पर्याप्त मात्रा में प्रचलित थे ही । अतः प्रश्न होता है कि फिर भी राक्षस रावण और हनुमान् का उल्लेख क्यों नहीं हुआ ? किसी ग्रन्थ में किसी अन्य ग्रन्थ का अनुल्लेख या उसकी कथावस्तु का अनुल्लेखमात्र से यह नहीं कहा जा सकता कि वह ग्रन्थ अथवा उसकी कथावस्तु का अस्तित्व ही नहीं था । स्वयं बुल्के भी यह न कह सकेंगे कि उस समय तक रावण और हनुमान् उत्पन्न ही नहीं हुए थे या उपाख्यानों में उनका वर्णन नहीं था । वाल्मीकिरामायण पर बौद्ध प्रभाव के प्रसङ्ग में बुल्के का यह कहना कि 'पाली-तिपिटक की रचना १. रामकथा, पृष्ठ १०३ । २. रामकथा, पृष्ठ ६४ अनुच्छेद ५४ । ३. वही; पृष्ठ १०३ ।

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