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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

रामायण के पहले हुई थी, अतः रामायण पर बौद्ध प्रभाव का पड़ना असम्भव नहीं कहा जा सकता ।" १ सर्वथा असङ्गत है यह बात पीछे कही जा चुकी है। जैसे मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के रहने पर भी उनके ईश्वरवाद, आत्मवाद एवं यज्ञवाद का प्रभाव त्रिपिटक पर इसलिए नहीं पड़ा कि बौद्ध उनके विरोधी थे। इसी लिए रामायण के रहने पर भी बौद्धों के ग्रन्थों पर उसका प्रभाव कम पड़ा है। पूर्ववर्ती रामायण पर त्रिपिटक का प्रभाव न होना ठीक ही है। दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि "वाल्मीकि ने एक विशेष उद्देश्य से दशरथजातक का सरल वृत्तान्त विकसित कर दिया है। बौद्ध तपस्या और भिक्षुपन की प्रतिक्रिया स्वरूप आदि कवि ने रामायण में हिन्दूगृहस्थ जीवन का आदर्श अपने पाठकों के सामने रखा है।" ह्वीलर भी रामायण का उद्देश्य बौद्धों के साथ जोड़ते हैं। इनके अनुसार रामायण का समस्त काव्य ब्राह्मण और बौद्ध दोनों धर्मों के सङ्घर्ष का प्रतीक है, उसमें सिंहलद्वीप के बौद्धों के प्रति वाल्मीकि का विरोध और द्वेष प्रकट है।२" बुल्के स्वयं ही उपर्युक्त मतों का खण्डन करते हैं। उनके कथनानुसार "लङ्का और सिंहलद्वीप की अभिन्नता संदिग्ध है। राक्षस ब्राह्मणों के विरोधी अवश्य हैं, लेकिन वे स्वयं भी यज्ञ करते हैं और नरभक्षी भी कहे जाते हैं। रामायण में जो राक्षसों का चित्रण मिलता है उसमें उनके बौद्ध होने का कोई निर्देश नहीं मिलता।"३ इसके अतिरिक्त जब यह सिद्ध है कि रामायण की रचना बुद्ध के जन्म से पहले हो चुकी थी तब उसमें बौद्ध के द्वेष की कल्पना ही क्योंकर सम्भव हो सकती है ? रामायण में जाबालि-वृत्तान्त के अन्तर्गत बुद्ध के लिए 'चोर' और 'नास्तिक' शब्दों का प्रयोग अवश्य ही हुआ है— “यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि ।” ( वा० रा० २।१०९।३४ ) इसी आधार पर ह्वीलर का कथन है कि “जाबालि बौद्ध-धर्म के प्रतिनिधि हैं और राम उनके विरुद्ध ब्राह्मण-धर्म का पक्ष लेते हैं ।"४ इस पहलू पर भी ह्वीलर से बुल्के का मतभेद है। "बुल्के के अनुसार जाबालि बौद्ध- धर्म का पक्ष न लेकर लोकायत ( चार्वाक ) दर्शन का प्रतिपादन करते हैं और राम उसका खण्डन करते हुए नास्तिकों के प्रसङ्ग से बुद्ध का उल्लेखमात्र करते हैं। वस्तुतः जाबालि केवल लोकायत मत का ही नहीं किन्तु बौद्ध धर्म का भी प्रतिपादन करते हैं। बौद्धों के क्षणभङ्गवाद के अनुसार ही जाबालि भी कहते हैं— “अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते ।” ( वा० रा० २।१०८।१०) । क्षणभङ्गवाद के अनुसार पिता-पुत्र में कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता । यद्यपि विज्ञानसन्तान में कार्यकारणभाव होता है तथापि निमित्तकारण की ही उपपत्ति होती है, उपादानकारण की नहीं। “बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च ॥” ( वा० रा० २।१०८।११ ) पिता जन्तु का बीज ( निमित्त ) मात्र होता है; जैसे यूका, लिक्षा आदि मनुष्य से उत्पन्न होने पर भी उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं बनता वैसे ही तुम्हारा भी दशरथ से कोई सम्बन्ध नहीं। “दानसंवनना होते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः । यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व सन्त्यज ॥” १. रामकथा, पृष्ठ १०४, अनुच्छेद ९० । २. वही, पृष्ठ १०४ । ३. रामकथा, पृष्ठ १०४ । ४. वही, पृष्ठ १०५ । ५. वही, पृष्ठ १०५ । २३