रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसी प्रकार के १६ वचनों के द्वारा जाबालि ने बौद्धों के समान ही वेदादि-शास्त्रों का अप्रामाण्य और यज्ञ, तप, दान एवं दीक्षा आदि को निरर्थक कहा है। अस्तु, वेदप्रामाण्यबाधक होने के कारण ही राम ने चोरतुल्य बौद्धादि नास्तिकों को धर्मानुसारी राजा द्वारा दण्डनीय कहा है। बुल्के के मतानुसार “बुद्धसम्बन्धी श्लोक गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठों में अप्राप्त होने के कारण प्रक्षिप्त हैं।” परन्तु उनकी यह मान्यता सङ्गत नहीं, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ में, जो परम प्रामाणिक मान्य है, उक्त श्लोक प्राप्त हैं । हाँ, यहाँ शङ्का की जा सकती है कि जब बुद्ध के जन्म के पूर्व राम के राजसिंहासन होने के समय रामायण का निर्माण हुआ तो उसमें बुद्ध का उल्लेख क्यों कर सम्भव हुआ ? परन्तु उस शङ्का का खण्डन बहुत ग्रन्थों के ही आधार पर हो जाता है । बुद्धजातकों तथा लङ्कावतारसूत्र के अनुसार अनेकों बुद्ध गौतम-बुद्ध के पूर्व भी हुए थे। त्रेताकालीन लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले बुद्ध त्रेता में भी थे। अतः राम के द्वारा बुद्ध का उल्लेख असङ्गत नहीं । आदिरामायण की चर्चा भी व्यर्थ है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से भिन्न आदिरामायण नामक किसी ग्रन्थ का अस्तित्व प्रमाणशून्य है । बुल्के के कथनानुसार “रामायण के रचना-काल में कोशल में बुद्ध-धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था, अतः यह असम्भव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में रहते हुए भी परोक्षरूप से बौद्ध आदर्शों से प्रभावित हुए थे । सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण, जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है; प्रक्षिप्त माना जा सकता है । लेकिन राम का अत्यन्त शान्त और कोमल स्वभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता है कि वे मुनि पहले थे, क्षत्रिय बाद में । अतः इनके चरित्रचित्रण में किञ्चित् परोक्ष बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल कल्पना नहीं प्रतीत होती है ।”१ परन्तु उनका यह कथन निरर्थक है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों एवं रामायण आदि सभी भरतीय ग्रन्थों में विविध प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन मिलता है। जिन अति प्राचीन उपनिषदों का लक्ष्य ही मुनिजनसम्मत अखण्ड अनन्त परब्रह्म का निरूपण है और जिनका आदर्श ही शान्ति, दान्ति, उपरति और तितिक्षा है उनमें भी क्रूर मारणादि प्रयोगों के वर्णन मिलते हैं, परन्तु उनका लक्ष्य भी उग्र प्रकृतिवाले जनों को वैदिक कर्म-काण्ड में विश्वास दिला कर उनको भी निवृत्तिमार्ग की ओर अग्रसर कर देना ही है। महाभारत में भी जहाँ भीम जैसे उग्रतेजा का वर्णन है वहीं राम जैसे ही परम शान्त युधिष्ठिर का भी वर्णन है। शान्ति, दान्ति और अहिंसा आदि का महत्त्व एवं गौरव वैदिक धर्म में बौद्ध धर्म के पूर्व से ही विद्यमान है। वेद, उपनिषदादि अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ हैं और उनमें वर्णित वसिष्ठ, वामदेव, शुक, सनकादि महर्षियों के चरित्र इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वस्तु- स्थिति तो यह है कि अति प्राचीन वेद, उपनिषद्, रामायण एवं महाभारतादि ग्रन्थों से ही सत्य, अहिंसा आदि को बौद्धों ने कुछ विकृत रूप में अपनाया है । मनु का माहात्म्य शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित है; रामायण तथा महाभारत में भी उनका नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। इन्हीं मनु महाराज के द्वारा वर्णित अहिंसा और संन्यास-धर्म की शान्ति, दान्ति और अहिंसा आदि का सम्यक् अनुकरण भी बौद्ध नहीं कर पाये । सीता के अहिंसासम्बन्धी भाषण और राम के सौम्य स्वभाव वर्णन पर परोक्षरूप से बौद्ध प्रभाव मानना सर्वथा निर्मूल ही है । जिन वेदों, उपनिषदों तथा मन्वादि शास्त्रों का प्रभाव बौद्धों की विकृत अहिंसा और शान्ति पर पड़ा था उनके अनुसार सीता और राम की अहिंसा, शान्ति आदि समझनी चाहिये । * १. रामकथा, पृष्ठ १०५ ।