रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 256, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनायें डा० वेबर का मत डा० वेबर के मतानुसार रामकथा के दो मूल स्रोत है—एक दशरथजातक और दूसरा होमर का काव्य । बुल्के के लेखानुसार ही डा० वेबर के मत से अन्य कोई भी विद्वान् सहमत नहीं । वे स्वयं डा० वेबर के मत का खण्डन करते हैं । “होमर के काव्य में नावों को बहुत महत्त्व दिया गया है । यदि वाल्मीकि इससे परिचित होते तो उन्होंने सेना को समुद्र पार पहुँचाने के लिए सेतु के स्थान पर नावों का सहारा अवश्य लिया होता । होमर तथा वाल्मीकि की रचना में जो साम्य ( स्त्री का हरण तथा धनुष-सन्धान ) है वह इतना सामान्य और साधारण है कि जब तक अन्य विशेषताओं में कोई साम्य नहीं मिलता तब तक पारस्परिक प्रभाव मानने की आवश्यकता नहीं ।”१ वस्तुतः उपर्युक्त पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों ही अकिञ्चित्कर हैं । वाल्मीकि वेद से परिचित थे; ऋग्वेद में बड़ी से बड़ी समुद्री नावों का वर्णन है । तुग्रपुत्र भुज्यु की नाव के समुद्र में भग्न हो जाने पर अश्विनों ने अपनी सौ यन्त्रोंवाली शतारित्रा नाव से भुज्यु को उसके पिता के पास पहुँचाया था । गङ्गा पार करने के लिए राम ने भी नाव का उपयोग किया ही था । महर्षि वाल्मीकि को सत्य घटना का वर्णन अपेक्षित था । किसी काव्य-कल्पना अथवा किसी का अनुसरण नहीं करना था । उन्होंने वेदों तथा उपनिषदों के अध्ययन से जो प्राप्त किया और परम्परा से जो सुना, उसका ब्रह्माजी के आदेश से समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा साक्षात्कार कर उसी का उल्लेख किया । उनका यह रामायण किसी अन्य पुस्तक या आख्यान से प्रभावित नहीं है । भले ही, सर्वज्ञ होने के कारण उनको रामायण-निर्माण के पूर्व ही पीछे घटी हुई एवं भविष्य में होनेवाली घटनाओं का ज्ञान रहा होगा तो भी उन्होंने रामायण में रामचरित्र की घटनाओं एवं वस्तुस्थिति का क्रमिक एवं यथार्थ ही वर्णन किया है । महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे और होमर आदि अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः होमर के काव्य को रामायण का आधार मानना युक्तिसङ्गत नहीं है । डा० याकोबी का मत डा० याकोबी के अनुसार “रामायण की रामकथा स्पष्टतया स्वतन्त्र भागों के संयोग से उत्पन्न हुई है । प्रथम भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ प्रधान नायक हैं । द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावण सम्बन्धी कथा मिलती है । इसका मूलस्रोत देवतासम्बन्धी कथाएँ प्रतीत होती हैं । बहुत से विद्वान डा० याकोबी के इस मत का आजकल भी समर्थन करते हैं । डा० याकोबी के अनुसार वैदिक सीता और रामायण की सीता की अभिन्नता असन्दिग्ध है ।२ इसके अतिरिक्त गृह्यसूत्रों में सीता को पर्जन्यपत्नी कहा गया है । इससे स्पष्ट है कि राम इन्द्र का एक अन्य रूपमात्र हैं । वैदिक साहित्यमें इन्द्र का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वृत्र-वध है । इन्द्र वृत्र या अहि को मार कर पर्वत में रोके हुए पानी को विमुक्त कर देते हैं । सायण के अनुसार वृत्र का अर्थ मेघ है जिसमें पानी वृत्र के ही द्वारा रोका जाता है । इन्द्र १. रामकथा, पृष्ठ १०७ । २. वही, पृ० १०८ ।