भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 257

और वृत्र का यह वृत्तान्त राम और रावण के युद्ध के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। अतः रावण और वृत्र का मूलरूप एक है। इसके अन्य लक्ष्य भी मिलते हैं—रावण के पुत्र मेघनाद की उपाधि इन्द्रजित् है और उसका भाई कुम्भकर्ण एक गुफामें रहकर वृत्र का स्मरण दिलाता है। इन्द्र का दूसरा कार्य पणियों द्वारा चुराई हुई गायों की पुनः प्राप्ति है (ऋ० सं० २।१२)। देवसुनी शरमा रसा नदी को पार कर इन गायों का पता लगाती है (ऋ० सं० १०।१०८)। वैदिक काल में पशुपालन करनेवाले आर्यों के लिए गायों का जो स्थान था वही कृषकों के लिए खेती की सीता का था, अतः गायों का हरण सीता-हरण में बदल गया। जिस तरह सरमा इन्द्र की सहायता करती है उसी तरह हनुमान् भी राम के लिए सीता की खोज करते हैं। हनुमान् का गाँवों में लोकप्रिय होने का एकमात्र कारण यही हो सकता है। याकोबी के अनुसार हनुमान् कृषि से सम्बद्ध कोई देवता थे। सम्भवतः वर्षाकाल के अधिष्ठाता देवता हों। वह वायु-पुत्र हैं। बादलों के समान कामरूपी हैं और आकाश में उड़ते हैं। वह भी दक्षिण की ओर से, जहाँ से वर्षा आती है, सीता अर्थात् कृषि सम्बन्धी शुभ समाचार लेकर राम के पास पहुँचते हैं। इस सबके अतिरिक्त इन्द्र का एकनाम शिप्रवत् भी है (ऋ० ६।१७।२)। निरुक्त में "शिप्रे हनू नासिके वा" उल्लेख है। इससे इन्द्र और हनुमान् इन दोनों का वर्षा के देवताओं से सम्बन्ध निर्दिष्ट होता है। लक्ष्मण रामके सहायकमात्र हैं। वे कहीं भी घटनाओं की प्रगति को बदलने की चेष्टा नहीं करते। फिर भी उनका वैदिक देवता मित्र से सम्बन्ध असम्भव नहीं, क्योंकि वे सुमित्रा के पुत्र हैं।" डा० याकोबी के उपर्युक्त मत की समालोचना करते हुए बुल्के कहते हैं कि उनका मत कल्पनाप्रधान है। इस कल्पना को प्रमाणित करने के लिए तर्क कम हैं। रामायण की सीता के वृत्तान्त पर वैदिक सीता के व्यक्तित्व का प्रभाव हम भी मानते हैं, लेकिन दोनों में समानता की अपेक्षा भिन्नता अधिक है।" यद्यपि बुल्के का यह कथन कि डा० याकोबी का मत कल्पनाप्रधान है, ठीक है; तथापि उनका भी मत निराधार है। पिछले प्रकरणों में मैंने यह सिद्ध किया है कि कृषि की अधिष्ठात्री देवता रामायण की सीता का ही एक अंश है। इसी तरह राम और वृत्रहन्ता देवराज इन्द्र दोनों भिन्न हैं। तथापि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (बृ० उ० २।५।१९) इत्यादि स्थलों पर परम ऐश्वर्य के योग से परमेश्वर में इन्द्रपद का प्रयोग हुआ है। वही परमेश्वररूप इन्द्र राम के रूप में अवतीर्ण होते हैं। इतना ही नहीं, देवराज इन्द्र परमेश्वर इन्द्र रूप राम का ही एक अंश हैं। इन्द्र और उपेन्द्र का असाधारण सम्बन्ध भी प्रसिद्ध है, अतः इन्द्र-पत्नी और पर्जन्य-पत्नी शब्दों का प्रयोग भी रामायणीय सीता की अंशभूत कृषि की अधिष्ठात्री देवता में युक्त ही है। बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् के सम्बन्ध में डा० याकोबी का यह अनुमान ठीक है कि रामायण में उनका उल्लेख उनकी लोकप्रियता का एकमात्र कारण नहीं हो सकता। इसका कारण यही हो सकता है कि प्राचीन यक्ष पूजा के साथ हनुमान् का सम्बन्ध स्थापित किया गया है", किन्तु उनका यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि वेदों, रामायणों तथा प्राकृत भाषा के ग्रन्थों में सर्वत्र रामकथा तथा राम का महत्त्व वर्णित है। महाभारत के भीम और अर्जुन के परम हितकर और पूज्य होने के कारण भी उनका महत्त्व है। निर्गुणवादी कबीर प्रभृति भी रामनाम का सहारा लेते रहे हैं। रामनाम का माहात्म्य अत्यन्त प्रसिद्ध है। राम के परम-प्रिय भक्त तथा सीता के परम कृपा- पात्र होकर उनसे अगणित वरदान प्राप्त करने के कारण ही हनुमान् की प्रख्याति बढ़ी। उसी के प्रभाव से राम- भक्ति और रामतत्त्व-ज्ञान के अतिरिक्त लौकिक अभीष्ट सिद्धि भी हनुमान् की पूजा से प्राप्त होने के कारण सर्व- साधारण में उनका महत्त्व और बढ़ गया। महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने राष्ट्रोद्धार के लिए गाँव-गांव में हनुमान् महावीर की स्थापना की। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस, हनुमान्- चालीसा, सङ्कटमोचन आदि ग्रन्थों एवं रामलीलाओं के विस्तार से घर-घर हनुमान् की पूजा लोकप्रिय हुई। यक्षरूप हनुमान् की पूजा का कोई प्रमाण कहीं भी प्राप्त नहीं होता। ऐसी निराधार कल्पना पाश्चात्यों के उच्छृङ्खल मस्तिष्क

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 257, कुल 1049 में से · BharatKosha