भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८१ की ही उपज है। अस्तु, जैसे बुल्के के कथनानुसार ही डा० याकोबी का यह मत कि वर्षाकाल के किसी अधिष्ठाता देवता अथवा इन्द्र से हनुमान् की अभिन्नता में कोई प्रमाण या सङ्केत नहीं है वैसे ही बुल्के की उक्त कल्पना भी सर्वथा निराधार ही है क्योंकि उसमें भी कोई प्रमाण नहीं है । डा० हॉपकिन्स के अनुसार महाभारत के 'शान्तिपर्व' में जो रामकथा मिलती है उससे डा० याकोबी के कथन की पुष्टि होती है । इस कथा में जो रामचरित्र मिलता है वह किसी प्राचीन देवतासम्बन्धी आख्यान पर आधारित होगा । बाद में इससे सीता कृषि की अधिष्ठात्री की कथा जोड़ दी गयी। अन्त में वाल्मीकि ने रावण, हनुमान्, लङ्का आदि का वृत्तान्त लेकर उसे बढ़ाया है। बुल्के का कहना है कि "राम का व्यक्तित्व इन्द्र की कथाओं से विकसित हुआ हो, यह तो शान्तिपर्व के प्रसङ्ग से विरुद्ध है। वहाँ १६ राजाओं के संक्षिप्त वृत्तान्त दिये गये हैं । ये सब राजा महान् थे, परन्तु सभी मर गये । अतः सृञ्जय को अपने पुत्र की मृत्यु के कारण शोक नहीं करना चाहिए। पर बेचारे बुल्के नहीं जान सके हैं कि राम विष्णुरूप से साक्षात् परमेश्वर परब्रह्म हैं। उनका जन्म और मरण दोनों ही अतात्त्विक हैं। अवतार लीला में वे नर के तुल्य उत्पन्न हुए और असाधारणरूप से रामरूप से विष्णु- रूप में परिवर्तित हो साकेत धाम चले गये । यह तथ्य वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के वर्णन से अत्यन्त स्पष्ट है तथापि सृञ्जय को धैर्य बँधाने के लिये अत्यन्त स्थूल दृष्टि से उनके भी मर्त्यलोक से प्रस्थान करने की चर्चा की गयी है। “स चतुर्दश वर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः । दशाश्वमेधान् जाहूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥” ( म० भा० १२।२९।५३ ) इस पद्य में चौदह वर्ष पर्यन्त वनवास के बाद अश्वमेध किये जाने का स्पष्ट उल्लेख है । हापकिन्स के अनुसार यहाँ वनवास का अभिप्राय वानप्रस्थाश्रम से है, परन्तु यह मान्यता भी असङ्गत है, क्योंकि वानप्रस्थाश्रम में काल की सीमा नहीं बाँधी जाती हं और न उससे लौट कर आना ही सम्भव होता है । अतः यहाँ वनवास का वानप्रस्थ अर्थ नहीं किया जा सकता, इसलिए उक्त श्लोक वाल्मीकिरामायण की कथा के अनुसार ही है। वाल्मीकिरामायण की कथा मुख्यरूप से वेदों पर ही आधारित है । वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण ही मानते हैं, यह सिद्धान्त मन्त्ररामायण के विवरण से स्पष्ट है । परन्तु पाश्चात्य लोग अपनी कल्पनाओं के आधार पर उस सिद्धान्त को दूषित करने का प्रयास करते हैं । इन्द्र, वृत्र आदि शब्द प्रत्यक्ष वृत्ति से देवराज इन्द्र तथा वृत्रासुर के बोधक होते हुए भी परोक्ष वृत्ति से राम और रावण के बोधक भी होते हैं । डा० वान नेगेलैन के अनुसार भी रामकथा वैदिक साहित्य सामग्री से ही विकसित हुई है । "बुल्के उसे कष्टकल्पना ही मानते हैं । 'पुरूरवा उर्वशी' ( ऋ० सं० १०।९५ ), 'रामः पृथुवैन्यः' ( ऋ० सं० १।११२ ) उर्वशी आदि अप्सराओं का मनुष्यों के साथ विवाह रामकथा का बीज है। सीता के सौन्दर्य और उनके अलौकिक जन्म का उल्लेख उनके अप्सरा होने का निर्देश है। सीता पृथ्वी के मानवीकरण का परिणाम है। राम और पृथु वैन्य ( ऋ० सं० १।११२।१५ आदि ) अभिन्न हैं ।'” कष्टकल्पना तो नहीं, परन्तु विकृत कल्पना अवश्य ही हैं। रामायण के राम को वैदिक पृथु (वैन्य ) से भिन्न मानने पर भी वहीं वर्णित राम से तो अभिन्न मानना ही होगा। प्रत्यक्ष रूप से पुरूरवा और उर्वशी राम एवं सीता से भिन्न होने पर भी परोक्षरूप से अभिन्न ही हैं । गीता के अनुसार जो भी विभूतिमत् ऊर्जित सत्त्व है वह सब भगवान् का अंशविशेष है— १. रामकथा, पृ० १११ ।