भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१८२ रामायणमीमांसा षष्ठ “यद् यद् विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम् ॥” ( गी० १०।४१ ) डा० याकोबी यह भी कहते हैं कि “ईरानीय 'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूलस्रोत एक ही है । साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अवेस्ता के देवताओं के अस्पष्ट एवं धुंधले व्यक्तित्व के कारण इस प्रश्न का निर्णय असम्भव है । फिर भी अन्य अनेक ग्रन्थों की अपेक्षा अवेस्ता बहुत प्राचीन है । उसकी भाषा भी वैदिक भाषा के अत्यन्त निकट है, अतः वैदिक राम से अवेस्ता लेखक का प्रभावित होना असम्भव नहीं है । रामहुवास्त्र ( ह्वास्त्र ) का उल्लेख जेन्द अवेस्ता में प्रायः वायु तथा मिथ्र के साथ होता है । राम का अर्थ है शान्तिविश्राम, हुवास्त्र का अर्थ चरागाह है, 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है चरागाह में विश्राम । कहा जाता है कि प्रारम्भ में वायु एवं मिथ्र देवता से 'रामहुवास्त्र' चरागाह में विश्राम माँगा जाता था। बाद में रामहुवास्त्र स्वयं देवता बन गया । साथ ही वह अ छा वायु स्वरूप हो गया । इसके नाम पर एक पूरा यश्त जेन्द अवेस्ता में मिलता है । इसका रचना-काल चौथी शती ई० पू० माना जाता है ।” वस्तुतः जैसे वेदों तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों में अपनी दुष्कल्पना भिड़ायी गयी है वैसी ही जेन्द अवेस्ता आदि में भी दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं । जिस रामहुवास्त्र पर जेन्द का एक पूरा यश्त है उसका पीछे देवता बन जाने की बात दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । वस्तुतः 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है विश्राम का विस्तृत क्षेत्र; उसका रामायण के राम से स्पष्ट ही सम्बन्ध है । प्रसिद्ध भारतीय हनुमन्नाटक में रामायणीय दाशरथि राम के नाम को कविवरवचःस्तोम का विश्राम-स्थान कहा गया है— “विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानाम् ।” इसी तरह असीरियन देवता रम्मन अथवा रम्मान या हिब्रू भाषा का रिमोन, जो मेघगर्जन का देवता माना जाता है, भी रामायणीय राम से भिन्न नहीं है, कारण जैसे संसार के थाईलैण्ड आदि अनेक देशों में रामकथा का प्रसार हुआ वैसे ही असीरिया में रामकथा का प्रसार हुआ हो यह असम्भव नहीं है । भारत में भी देहातों में मेघ का गर्जना और बरसना राम का ही काम माना जाता है । हिब्रू में राम धातु का अर्थ है श्रेष्ठ । बाइबिल में इस धातु से अनेक नगरों के नाम तथा दो तीन व्यक्तियों के नाम भी मिलते हैं । ( दे० एफ० बिगू : दिक्सियोनेर दि ला बिबल, पेरिस ) यह भी वेदों एवं रामायणों के राम का परोक्ष प्रभाव ही है । दिनेशचन्द्र सेन के अनुसार “रामकथा के दो प्रधान स्रोत हैं दशरथजातक और दक्षिण में प्रचलित रावण-सम्बन्धी आख्यान । तीसरा गौण आधार हनुमान्सम्बन्धी सामग्री भी है । इसमें वानरपूजा का अवशेष भी पाया जाता है । रावण-सम्बन्धी आख्यानों में रावण की धार्मिकता, तपस्या तथा महत्त्व वर्णित है । इस मत की सिद्धि के लिए जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों का सहारा लिया जाता है । उनके अनुसार राम की अपेक्षा राक्षस और वानर अधिक लोकप्रिय थे । लङ्कावतारसूत्र में रावण तथा बुद्ध का धार्मिक संवाद वर्णित है, परन्तु राम-रावण युद्ध का किञ्चित् भी सङ्केत नहीं है । रावण रामकथा की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रसिद्ध था । धर्मकीर्ति ( ६ठी शती ई० ) आदर्श बौद्ध राजा रावण को रामायण के दोषारोपण से बचाने का प्रयत्न करता है ।'’ आश्चर्य है कि जब वेद, उपनिषद् एवं रामायण जैसे परम प्रामाणिक सद्ग्रन्थों में ऐतिहासिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक रूप से सुस्पष्ट सुबोध रामकथा वर्णित है तब पाश्चात्य विद्वान् उसको विकृत करने के लिए इतस्ततः कुशकाश का अवलम्बन करते हुए क्यों भटकते हैं ? यदि उनकी दृष्टि से वेद, उपनिषद् तथा रामायण प्रामाणिक नहीं हैं तो जातक एवं उपाख्यानों की प्रामाणिकता का आधार ही क्या है ? यदि रामायण किसी अन्य मूलस्रोत के आधार पर की गयी काव्यकल्पनामात्र है तो वह स्रोत तथा मूलभूत ग्रन्थ भी किसी अन्य मूलस्रोत के आधार पर