रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८३ कल्पित कहे जा सकते हैं। इन बातों का उत्तर पाश्चात्यों एवं तदनुयायियों के पास नहीं है। तथापि वे अपनी उच्छृङ्खल कल्पनाओं से विरत नहीं होते । स्वयं बुल्के ही रावण को कहीं जैन-धर्मावलम्बी तो कहीं बौद्धधर्मावलम्बी कहते हैं । निश्चय ही इन दोनों कथनों में से एक तो भ्रामक है ही। जैन साहित्य में रावण की कथा स्वतन्त्ररूप से नहीं मिलती, रामकथा के अन्तर्गत ही उसका उल्लेख है। बुल्के के कथनानुसार "जैन साहित्य में प्रचलित रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर ही आधारित है। (५७ अनु० ) में वे कहते हैं— जैन-रामकथा में प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावणादि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण का राक्षस तथा सुग्रीव आदि का वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है, अतः जैन-रामकथा में रामकथा का मूलस्रोत खोजना व्यर्थ है ।" बौद्ध लङ्कावतारसूत्र दिनेशचन्द्र सेन के मतानुसार "यह रचना पहले दूसरी शती ई० की मानी जाती थी और इसका प्रथम अध्याय जिसमें लङ्कापति रावण तथा बुद्ध का संवाद मिलता है, प्रामाणिक माना जाता था । लेकिन आजकल इसके प्रमाण मिलते हैं कि लङ्कावतारसूत्र चौथी शती ई० का है और उसका प्रथम अध्याय प्रक्षिप्त है। मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। गुणभद्र ने उसका ४४३ ई० में अनुवाद किया था। इसके चीनी अनुवाद में रावण-बुद्ध-संवाद नहीं मिलता और न रावण का कोई उल्लेख ही है। ५१३ ई० में इस रचना का पुनः चीनी भाषा में अनुवाद किया गया है और इस छठी शताब्दी के अनुवाद में एक नया प्रथम अध्याय मिलता है, जिसमें रावण धर्म के विषय में बुद्ध से प्रश्न करता है। इस अध्याय के प्रक्षिप्त होने के अन्तरङ्ग प्रमाण भी मिलते हैं। अन्य अध्यायों में गद्य और पद्य का सम्बन्ध ऐसा है कि पद्य गद्य का अर्थ दुहराता है तथा सारी रचना बुद्ध तथा बोधिसत्त्व महामति के संवाद के रूप में है। उसमें कहीं भी रावण का उल्लेख नहीं मिलता। केवल प्रथम अध्याय में पद्य गद्य का अर्थ नहीं दुहराता और इसमें ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो सूत्र को समझने के लिए आवश्यक हो। डी० टी० सुज़ुकि का अनुमान है कि रामकथा की लोकप्रियता के कारण लङ्कावतारसूत्र का सम्बन्ध इससे जोड़ा गया है। लङ्कावतार का अर्थ है बुद्ध का लङ्का में अवतार । लङ्का दक्षिण में मानी जाती थी । इसके अतिरिक्त इसमें रामकथा-विषयक कोई भी निर्देश नहीं मिलता । रावण सिंहलद्वीप का राजा हुआ हो इसके लिए भी वहाँ के प्राचीनतम ग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं पाया जाता । दीपवंश ( चौथी शती ई० ) तथा महावंश (पांचवीं शती ई० ) सिंहलद्वीप के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक काव्य हैं इनमें रामकथा का निर्देश मिलता है। लेकिन सिंहलद्वीप के राजा रावण का कही भी उल्लेख नहीं पाया जाता है।" ( अनु० १०३ में ) बुल्के का मत है कि "वाल्मीकि के पहले हनुमान् के विषय में आख्यान-काव्य प्रचलित रहा होगा और वाल्मीकि ने उसका प्रयोग अपनी रामकथा के लिए किया होगा, दिनेशचन्द्र की इस धारणा के लिए कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह अनुमानमात्र ही है। वैदिक साहित्य में हनुमान् का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है। बौद्ध त्रिपिटक के जातकों में भी हनुमान् का नाम नहीं आया । अतः उनके विषय में रामकथा के पहले स्वतन्त्र आख्यान प्रचलित थे, यह बहुत सन्दिग्ध है। समुग्गजातक ( जातक नं० ४३६ ) में एक वायुरस पुत्त नामक विद्याधर, जो ऐन्द्रजालिक था, का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसके सम्बन्ध में न तो हनुमान् का उल्लेख हुआ है और न किसी अन्य वानर का । हनुमान् शब्द सम्भवतः एक द्रविड़ शब्द का रूपान्तर है। ( आण-नर, मन्दि-कपि ) जिसका अर्थ है 'नरकपि' । इसी कारण अनुमान किया गया है कि 'वृषाकपि' तथा हनुमान् दोनों किसी प्राचीन द्रविड़ देवता के नाम