भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 235, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 235

१५८ रामायणमीमांसा पञ्चम “मृतायामपि भार्यायां वैदिकीं न त्यजेद् द्विजः । उपाधिनापि तत्कर्म यावज्जीवं समापयेत् ॥” ( विष्णु स्मृ० ) इत्यादि वचनों के अनुसार कुशमयी, सौवर्णी या षोडशमाषमयी पत्नी प्रतिनिधि के रूप में धर्मशास्त्र- सम्मत है । विशेषतः प्रकृत में तो श्रीराम की सौवर्णी पत्नी प्रतिनिधि नहीं है किन्तु देवता प्रतिमाओं के समान उसमें सीताबुद्धि ही थी, सादृश्यबुद्धि नहीं । भगवान् के संकल्प से और ऋषियों के आवाहनसामर्थ्य से उसमें ठीक सीताबुद्धि का ही उदय हुआ था। और उसके द्वारा पूर्णरूप से आज्यावेक्षण आदि पत्नीकर्म की निष्पत्ति होती थी । यही बात अन्य सर्गों में उक्त है । श्रीराम ने सीता से व्यतिरिक्त भार्या का वरण नहीं किया । प्रत्येक यज्ञ में पत्नी का कार्य करने के लिए काञ्चनी जानकी ही राम की पत्नी होती थी। उसी काञ्चनी सीता के द्वारा श्रीराम दस सहस्र वर्ष पर्यन्त वाजि- मेध, वाजपेय, अग्निष्टोम, अतिरात्र आदि बहु सुवर्णादि दक्षिणावाले महाधनसमृद्ध यज्ञों का अनुष्ठान करते रहे । “न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ दशवर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ॥” ( वा० रा० ७।९९।७-८ ) लोकवाद से भी राम को सीता के प्रति भ्रान्ति नहीं हुई । वे सर्वथा ही सीता को पवित्र मानते रहे हैं। लङ्का में अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में श्रीराम ने कहा था कि रावण के अन्तःपुर में दीर्घ काल तक सीता रही थी, अतः सीता की अग्निशुद्धिरूप पवित्रता अपेक्षित थी । बिना शोधन किये सीता का ग्रहण करने में दशरथात्मज राम कामात्मा एवं बालिश हैं, यह साधारण लोग कह सकते थे । अतः अग्निशुद्धि के लिए सीता के अग्नि-प्रवेश की मैंने अनुमति दी थी । सीता अनन्यहृदया हैं, मेरे में ही नित्य स्थिर होने के कारण वह अपने शील की रक्षा कर सकती है, ऐसा मैं जानता हूँ । अपने तेज से ही सीता पूर्ण परिरक्षित है । सीता जैसे अग्नि को शीतल कर सकती है वैसे ही रावण को भस्म भी कर सकती थी । तभी तो सीता ने कहा था, राम का आदेश न होने एवं तपस्या-रक्षा की दृष्टि से दशग्रीव, मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं करती हूँ— “असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥” ( वा० रा० ५।२२।२० ) महोदधि जैसे बेला का अतिक्रमण नहीं कर सकता वैसे ही रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । दुष्टात्मा रावण अप्राप्य दीप्त अग्निशिखा के समान मैथिली का मन से भी प्रधर्षण नहीं कर सकता था। रावण के अन्तःपुर में रहकर भी वह वैक्लव्य कातर्य को नहीं प्राप्त हो सकती थी । भास्कर की प्रभा के समान सीता मुझसे अभिन्न है । सीता तीनों लोकों में विशुद्ध है । आत्मवान् जैसे कीर्ति से रहित नहीं हो सकता वैसे मैं सीता से वियुक्त नहीं हो सकता— “अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावनमर्हति । दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥ बालिशो बत कामात्मा रामो दशरथात्मजः । इति वक्ष्यति मां लोको जानकीमविशोध्य हि ॥ अनन्यहृदयां सीतां मच्चित्तपरिरक्षिणीम् । अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥

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