रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय जैनमत में रामकथा १५७ अशोकवाटिका में रखी गयी । यदि राम ने ऐसी धर्षणा को सहन कर लिया तो अन्य लोगों के लिए भी वैसा सह्य हो सकेगा। पुरवासियों को लङ्का की अग्निपरीक्षा का ज्ञान नहीं था। राम चाहते तो उसी का प्रचार कराकर जन- भ्रम दूर कर सकते थे। पर वैसा करना एक सरकारी प्रचार ( प्रोपेगण्डा ) समझा जाता । सीता की शुद्धि का उल्लेख अब्भक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, परमाप्त, राज्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र महर्षि के द्वारा होने में ही महत्त्व है। इसी दृष्टि से महर्षियों के आश्रमों के सन्निधान में सीता को छोड़ा गया । श्रीराम के इस कार्य से नीति में बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी आदर हुआ है । “सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय ।” भाई-भतीजावाद का अत्यन्त उन्मूलन हुआ है । श्रीराम ने एक हजार वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत पालन- पूर्वक ब्रह्मात्मनिष्ठा के द्वारा परमार्थ तथा तपोवन में भावी सम्राट् के संस्कार, विद्या, शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था कर परमार्थ और स्वार्थ का समन्वय किया है । “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ॥” ( रा० मा० २।२५३।३ ) श्रीराम ने एक पत्नीव्रत के अनुसार सीता के वनवास के पश्चात् भी अन्य पत्नी का वरण नहीं किया । यज्ञों में काञ्चनी सीता को ही रखा जाता था । “काञ्चनीं मम पत्नीं च दीक्षायां ज्ञांश्च कर्मणि । अग्रतो भरतः कृत्वा गच्छत्वग्रे महायशाः ॥” ( वा० रा० ७।९१।२५ ) यहाँ श्रीराम ने आदेश दिया है कि महायशस्वी भरत मेरी दीक्षानिमित्ता काञ्चनी पत्नी और कर्म के विषय में विज्ञ महर्षियों को लेकर आगे चलें । यहाँ यह भी विचार है, यह समझना चाहिए कि यज्ञों में पति और पत्नी दोनों का सहाधिकार होता है, अतः पति-पत्नी दोनों ही यजमान होते हैं । “स्वामिनोऽग्नेर्देवतायाश्चशब्दात् कर्मणश्च प्रतिनिधिर्निवृत्तः ।” इस आपस्तम्ब सूत्र के अनुसार स्वामी, अग्नि तथा देवता का प्रतिनिधि नहीं होता । ऐसी स्थिति में मुख्य पत्नी ही यज्ञ में अपेक्षित होती है । काञ्चनी प्रतिमा सीता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती । तथापि वचनान्तरों के अनुरोध से कई परिस्थितियों में पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है । “यस्य भार्यान्यदेशस्था नेष्यते पतिनाथवा । अशक्ता प्रतिकूला वा तस्याः प्रतिनिधिक्रिया ॥” जिसकी भार्या अन्य देश में हो या पति को इष्ट न हो, असमर्थ या प्रतिकूल हो वहाँ पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है। “अन्ये कुशमयीं पत्नीं कृत्वा तु गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते यावज्जीवमनुव्रताः ॥ सौवर्णीं वा षोडशपलैः माषकैः षोडशैरपि ।”