भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१३४ रामायणमीमांसा पञ्चम तथा सोलह हजार रानियां और राम की आठ हजार पत्नियां बतायी गयी हैं, जिनमें सीता, प्रभावती, रतिनिभा तथा श्रीदामा प्रधान कही गयी हैं (पर्व ८५-९१)। सीता-त्याग की भी कथा वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसके अनुसार सीता के दो पुत्र लवण तथा अंकुश थे। वे नारद के भड़काने पर राम एवं लक्ष्मण से युद्ध के लिए आते हैं। युद्ध के अनन्तर सुग्रीव, हनुमान् और विभीषण आदि के अनुरोध पर राम सीता को बुला भेजते हैं, परन्तु उनके सतीत्व का प्रमाण भी चाहते हैं : सीता अग्निपरीक्षा में सफल होकर दीक्षा ग्रहण कर लेती हैं और स्वर्ग में इन्द्र बन जाती हैं¹। राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा के लिए देवताओं ने लक्ष्मण को राम के देहान्त का समाचार दिया, इससे लक्ष्मण का देहान्त हो जाता है। शोकातुर होकर मरने से नरक जाते हैं। लक्ष्मण की अन्त्येष्टि के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और १७ हजार वर्ष साधना कर निर्वाण को प्राप्त होते हैं। अन्त में कहा गया है कि लक्ष्मण, सीता और रावण भी अनेक जन्म लेने के बाद मुक्त हो जायेंगे (पर्व ११०-११२)। अनीश्वरवादी जैनाचार्य ईश्वर मानते ही नहीं, अतः अपने मत के रक्षार्थ ही साक्षात् परब्रह्मरूप राम तथा परब्रह्मरूपिणी सीता को मनुष्य ही मानकर उनके दीक्षा-ग्रहण की धृष्ट कथाओं का प्रचार करते हैं। इसी तरह भगवान् राम के स्वरूप लक्ष्मण के नरक जाने को वेद-शास्त्र विरुद्ध जैन-कथा सर्व वैदिक-धर्म-द्वेषमूलक ही है। बुल्के कहते हैं—परवर्ती जैन-कथाओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। हरिभद्रकृत उपदेशपद, भद्रेश्वरकृत कहावली और हेमचन्द्रकृत जैनरामायण एवं रामचरित्र से रावण का चित्र सीता के परित्याग का कारण माना जाता है। हेमचन्द्रकृत सीतारावणकथानकम् के अनुसार कैकेयी अपने दूसरे वरदान के बदले में राम, लक्ष्मण और सीता के लिए १४ वर्ष पर्यन्त का वनवास माँगती है। गुणभद्र की रामकथा उत्तरपुराण में आठवें बलदेव, नारायण तथा प्रतिनारायण—जो वाल्मीकिरामायण के राम, लक्ष्मण तथा रावण हैं—का चरित्र ६७वें और ६८वें पर्वों में १११७ श्लोकों में वर्णित है। यह कथा विमलसूरि और वाल्मीकि दोनों से बहुत भिन्न है। इसमें सीता को रावण एवं मन्दोदरी की औरस पुत्री कहा गया है। सीताजन्म की कथा का इस रूप में उल्लेख सर्वप्रथम सङ्घदासकृत वसुदेवहिण्डि में प्राप्त होता है। गुणभद्र का आधार अज्ञात है; परन्तु कहा जा सकता है कि वे विमलसूरि तथा सङ्घदास की रचनाओं तथा परम्पराओं से परिचित थे। जिनसेन अपने ग्रन्थ आदिपुराण में कवि परमेश्वर की गद्यकथा का उल्लेख करते हैं और उसे ही अपनी रचना का आधार मानते हैं। गुणभद्र जिनसेन की अधूरी रचना पूर्ण करते हैं; अतः बहुत सम्भव है कि वे भी परमेश्वर कवि की कथा पर निर्भर रहे हों। परमेश्वर कवि की रचना अप्राप्य है। तिब्बती रामायण तथा अन्य तिब्बती ग्रन्थों में भी सीता मन्दोदरी की पुत्री ही मानी गयी हैं। जैन कवियों ने इसे अपने जैन धर्म के ग्रन्थों में स्थान दिया होगा। चामुण्डराय त्रिषष्टिलक्षणमहापुरुष के लेखकों की सूची में कूचिभट्टारक, नन्दिमुनीश्वर, कवि परमेश्वर, जिनसेन और गुणभद्र का उल्लेख करते हैं। गुणभद्र की रामकथा अन्य जैन-ग्रन्थों में भी सुबद्ध मिलती है। गुणभद्र- १. अपने धर्म के प्रचार और दीक्षा की महत्ता को स्थापित करने की दृष्टि से ही जैन तीर्थङ्कर सीता, राम, भरत आदि के द्वारा जैन-दीक्षा ग्रहण करने की कपोल-कल्पित कथाओं की चर्चा करते हैं। इसी आधार पर जैन-धर्माचार्य तुलसी ने भी अपनी पुस्तक ‘अग्निपरीक्षा’ में सीता एवं राम के सम्बन्ध में जनापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है।