भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 210

अध्याय जैनमत में रामकथा १३३ २. विभीषण द्वारा सीता को लौटा देने का अनुरोध किये जाने पर रावण विभीषण को अपने नगर से निकल जाने का आदेश देता है; फलतः वह अपनी समस्त सेना के साथ हंसद्वीप जाकर राम की शरण लेता है। उसी समय सीता के भाई भामण्डल भी राम के साथ युद्ध में भाग लेने के लिए आ पहुँचते हैं। ३. सुग्रीव तथा भामण्डल इन्द्रजित् के नागपाश में बँध जाते हैं और गरुड़-केतु लक्ष्मण द्वारा मुक्त किये जाते हैं। राम और लक्ष्मण नागपाश में नहीं बँधे (पर्व ६०)। ४. लक्ष्मण को रावण की शक्ति लगने पर द्रोणमेघ को कन्या विशल्या उनकी चिकित्सा करती है। तदनन्तर लक्ष्मण और विशल्या का विवाह सम्पन्न हो जाता है। वे दोनों पूर्वजन्म के पुनर्वसु एवं अनङ्गशरा थे (पर्व ६१-६४)। ५. रावण ने सामन्त नामक अपने दूत को राम के पास सन्धि प्रस्ताव लेकर भेजा। इस सन्धि की शर्त थी—'राम सीता का त्याग कर दें और कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् एवं मेघवाहन को छोड़ दें तो रावण राम को अपने राज्य का एक अंश और तीन हजार कन्याएँ देगा (पर्व ६५)। ६. रावण बहुरूपा साधक विद्या को सिद्ध करने के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में साधना करता है। वानरों के द्वारा उसका ध्यान-भङ्ग करने का निष्फल प्रयास किया जाता है। अन्ततोगत्वा रावण अपनी विद्यासाधना में सफल होता है (पर्व ६६-६८)। बहुरूपा विद्या सिद्ध करने पर रावण सीता के पास जाकर उसको धमकी देता है कि अब मैं अवश्य ही राम का वध कर तुमको अपनी रानी बना लूँगा। ७. सीता उत्तर देती हैं कि मेरा जीवन राम के जीवन पर अवलम्बित है और मूर्च्छा खाकर गिर पड़ती है। राम के प्रति सीता के प्रेम को देखकर रावण पश्चात्ताप करता है कि वह राम एवं लक्ष्मण को संग्राम में हराकर सीता को लौटा देगा (पर्व ६९)। ८. लक्ष्मण (नारायण) ने ही रावण (प्रतिनारायण) का वध किया। ९. रावण के वध के बाद उसके दोनों पुत्र इन्द्रजित् तथा मेघवाहन ओर कुम्भकर्ण जो युद्ध में बन्दी किये गये थे, मुक्त कर दिये जाते हैं। वे तीनों विरक्त होकर तप करने चले जाते हैं। साथ ही मन्दोदरी, चन्द्रनखा आदि आठ हजार युवतियाँ भी महलों को त्याग कर साधनामय जीवन व्यतीत करने लगती हैं (पर्व ७५)। १०. लङ्का-प्रवेश कर राम सर्वप्रथम सीता से मिलने जाते हैं। देवता दोनों का मिलन देख कर पुष्पवृष्टि करते हैं तथा सीता के निर्मल चरित्र की साक्षी देते हैं। राम के किसी सन्देह तथा सीता की अग्निपरीक्षा का कोई सङ्केत नहीं मिलता (पर्व ७६)। ११. तदनन्तर राम एवं लक्ष्मण रावण के महलों में रहने लगते हैं और उन कन्याओं को, जिनके साथ उनकी मँगनी हो चुकी थी, बुला कर विवाह करते हैं। यह विवाह लङ्का में ही सम्पन्न होता है। राम एवं लक्ष्मण छः वर्ष पर्यन्त लङ्का में रहते हैं (पर्व ७७)। उत्तरचरित (पर्व ७८-११८) नारद लङ्का में राम के पास जाकर पुत्र-वियोग के कारण दुःखित अपराजिता की दशा का वर्णन करते हैं, जिससे राम और लक्ष्मण साकेत लौटने का निश्चय करते हैं (पर्व ७८)। उनके आगमन के पश्चात् भरत को वैराग्य उत्पन्न होता है और वे दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त करते हैं (पर्व ८०-८४)। अनन्तर लक्ष्मण के राज्याभिषेक और उनके द्वारा विद्याधर राजाओं पर विजय प्राप्त करने का वर्णन है। लक्ष्मण की विशल्या आदि आठ पटरानियाँ