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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 209

१३२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की आज्ञा से राजा सुरप्रभ ने वंशपर्वत पर बहुत से मन्दिर बनवाये थे; इससे उसका नाम रामगिरि हुआ (पर्व ४०) । दण्डकारण्य में प्रवेश करने पर एक मुनिवर ने जटायु से सीता की रक्षा करने के लिए निवेदन किया। सीताहरण और अन्वेषण (पर्व ४३-५३) विमलसूरि के कथनानुसार चन्द्रनखा के पुत्र शम्बूकने सूर्यहास खड्ग की सिद्धि के लिए बारह वर्ष पर्यन्त साधना की। उसकी सफल साधना से खड्ग प्रकट हुआ। संयोगवशात् उसी समय लक्ष्मण वहाँ पहुँचे और खड्ग को उठाकर पास के बाँस को काटकर शम्बूक का सिर भी काट दिया। चन्द्रनखा अपने मृत पुत्र को देखकर विलाप करती हुई बन में भटकने लगी । भटकते-भटकते राम-लक्ष्मण के पास पहुँच कर उसने उनकी पत्नी बननेका प्रस्ताव किया । प्रस्ताव के अस्वीकार होने पर वह अपने पति के पास गयी और उसको पुत्र-वध का समाचार सुनाया। रावण को भी सूचना भेजी गयी। इस बीच लक्ष्मण अकेले ही खरदूषण की सेना को रोक लेते हैं। रावण वहाँ पहुँचता है। रावण अवलोकनी-विद्या के द्वारा यह जान लेता है कि लक्ष्मण ने रामको बुलाने के लिए सिंहनाद का संकेत बताया है, अतः वह सिंहनाद कर राम को लक्ष्मण के पास भेज कर सीता हरण-करने में सफल हो जाता है। सीता-हरण के पश्चात् सुग्रीव तथा राम के सख्य का वर्णन है। साहसगति ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य छीन लिया था। राम ने साहसगति को मारकर सुग्रीव को उसका राज्य लौटा दिया। सुग्रीव ने राम के लिए अपनी तेरह कन्याएँ समर्पित कीं; किन्तु सीता के वियोग में राम को उनके संग सुख नहीं मिलता था। सुग्रीव की आज्ञा से विद्याधर सीता की खोज करने जाते हैं। खोज लेते हुए सुग्रीव ने रत्नजटी से सुना कि रावण ने सीता का हरण किया है। यह सुनकर सब विद्याधरों ने रावण से भयभीत हो युद्ध करने से अस्वीकार कर दिया। उस समय सुग्रीव को स्मरण होता हैं कि अनन्तवीर्य ने रावण से कहा था कि जो कोटिशिला उठा सकेगा उससे तेरी मृत्यु होगी। वे सब विमान पर चढ़ कर वहाँ जाते हैं; लक्ष्मण कोटिशिला उठा लेते हैं; परन्तु विद्याधर रावण के भय से मुक्त नहीं हो पाते और हनुमान् को रावण के पास भेज कर विभीषण की सहायता से उसको समझाने का प्रयास करने की सलाह देते हैं। हनुमान् अपनी इस यात्रा में अपने नाना महेन्द्र को परास्त करते हैं; क्योंकि उन्होंने हनुमान् की माता अञ्जना को अपने घर से निकाल दिया था। तदनन्तर वे दधिमुखनगर के राजा की तीन कन्याओं से, जिनका विवाह साहसगति को मारनेवाले के साथ करने का निश्चय किया गया था, भेट करते हैं। लङ्का के पास पहुँच कर विभीषण द्वारा निर्मित प्राचीर पार कर वज्रमुख का वध करते हैं; तदनन्तर उसकी कन्या लङ्कासुन्दरी को परास्त कर उसके साथ रातभर क्रीड़ा करते हैं। लङ्का में प्रवेश कर सीता से मिलते हैं। वहाँ के महलों एवं उद्यानों का विध्वंस करते हैं। ओर इन्द्रजित् द्वारा बाँधे जाकर रावण के सामने उपस्थित किये जाते हैं। हनुमान् रावण को धमका कर अपने बन्धनों को तोड़ रावण का महल ध्वस्त कर सीता का सन्देश राम के पास ले जाते हैं। युद्ध (पर्व ५४-७७) युद्धपर्व के उल्लेखों में भी वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से निम्नाङ्कित स्थानों में भिन्नता है। १. वाल्मीकिरामायण में वर्णित सेतुबन्ध प्रसङ्ग का यहाँ सर्वथा भिन्न वर्णन दिया गया है। तदनुसार समुद्र नामक एक राजा वानरों की सेना को रोक लेता है, परन्तु नल द्वारा पराजित होकर लक्ष्मण को अपनी चार कन्याएँ समर्पित कर देता है।