रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय] जैनमत में रामकथा [१३१ वस्तुतः अत्यन्त परोक्ष अतीत घटनाओं में प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं होता । वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ रामराज्य-काल में ही लेखबद्ध किया गया था । एकमात्र वही प्रामाणिक ग्रन्थ है; वह अनादि वेदों के उपबृंहणार्थ लिखा हुआ आर्ष इतिहास है । रामायण की लोकप्रियता के कारण ही धर्मान्ध लोगों ने उसको विकृत कर अपने धर्म-प्रचारार्थ उसका दुरुपयोग किया है । यदि रावण धर्मभीरु और सदाचारी होता तो वह सीताहरण ही क्यों करता ? और राम उसका वध क्यों करते ? इसी तरह हनुमान् के चरित्रवर्णन में भी मनमानी तथा उलटफेर किया गया है। उन्हें पवनञ्जय एवं अञ्जनासुन्दरी का पुत्र माना गया है जैन-कथानुसार हनुमान् वरुण के विरुद्ध रावण की सहायता करते हैं ! चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा के साथ विवाह करते हैं, साथ ही अनेक अन्य विवाह भी करते हैं। अखण्डब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ हनुमान् के सम्बन्ध में उक्त कल्पनाएँ सर्वथा निराधार हैं । जैनकथा में राम और सीता के जन्म एवं विवाह के सम्बन्ध में बहुत सी कल्पनाएँ हैं जो वाल्मीकि- रामायण के सर्वथा विपरीत हैं। तदनुसार ( पर्व २१-३२ ) अपराजिता और सुमित्रा के साथ दशरथ का विवाह हो जाने पर नारद ने उनको सूचना दी कि विभीषण उनको मारना चाहता है, क्योंकि एक नैमित्तिक के कथनानुसार दशरथ का पुत्र सागर के मार्ग से आकर जनक-पुत्री सीता के कारण रावण को मारेगा । नारद ने जनक को भी सावधान किया । दशरथ और जनक दोनों ही राजा अपने अपने राज्य छोड़ कर पृथ्वी-भ्रमण करने लगे और उनके मन्त्रियों ने उनके प्रतिरूप बनवा कर उनके महलों में रखवा दिये । विभीषण ने दशरथ की मूर्ति का सिर कटवाया । रविषेण के अनुसार परदेश में घूमते हुए दशरथ एवं जनक कैकेयी के स्वयंवर में पहुँचे । स्वयंवरा ने दशरथ के गले में माला डाल दी। इसपर अन्य राजाओं के साथ युद्ध हुआ जिसमें कैकेयी ने बड़े कौशल से दशरथ के रथ का संचा- लन किया । विवाह सम्पन्न होने पर दोनों राजा अपनी अपनी राजधानी लौट गये । घर पहुँच कर दशरथ ने कैकेयी को वर दिया । कैकेयी ने कहा कि अवसर आने पर इच्छित वर माँग लूँगी। श्रीराम या पद्म का अपराजिता ( कौशल्या ) से, लक्ष्मण का सुमित्रा से और भरत एवं शत्रुघ्न का कैकेयी से जन्म हुआ । रविषेण के अनुसार शत्रुघ्न का जन्म दशरथ की चतुर्थ महिषी सुप्रभा से हुआ था । अधिकांश जैन लेखक रविषेण का ही अनुसरण करते हैं । राजा जनक की विदेहा रानी से एक पुत्री सीता और एक पुत्र भामण्डल का जन्म हुआ । राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की, जिसके फलस्वरूप राम तथा सीता का वाग्दान हुआ। तदनन्तर सीतास्वयंवर के समय राम ने धनुष चढ़ाया और राम सीता का विवाह सम्पन्न हुआ । पश्चात् दशरथ को वैराग्य हुआ । उस समय कैकेयी ने पूर्व वरदान के बल पर भरत के लिए राज्य माँग लिया; यह सुन कर राम, सीता और लक्ष्मण दक्षिण दिशा की ओर वन चले गये । पश्चात्तापिनी कैकेयी के अनुरोध पर भरत ने वन में जाकर राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध किया । राम के अस्वीकार करने पर भरत अयोध्या लौट आये और राज्यभार ग्रहण किया तथा किसी मुनि के सामने उन्होंने प्रतिज्ञा की कि राम के प्रत्यागमन पर मैं दीक्षा ग्रहण कर लूँगा । जैन-ग्रन्थों में अपने धर्म के प्रति इतनी धर्मान्धता है कि वे देवता, दानव, मानव सब को जैन-दीक्षा ग्रहण करवा देते हैं । पउमचरियं के वन-भ्रमण ( पर्व ३३-४२ ) में चित्रकूट का उल्लेख है; परन्तु वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से अत्यन्त भिन्न है । 'वन-भ्रमण के उल्लेखानुसार वज्रकर्ण ने ८ तथा सिंहोदर आदि राजाओं ने ३०० कन्याएँ लक्ष्मण को प्रदान की थीं। इसके अतिरिक्त वनमाला; रतिमाला और जितपद्मा नामक कन्याओं को भी लक्ष्मण ने प्राप्त किया ।