भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१३० रामायणमीमांसा पञ्चम वस्तुतः यह भी वाल्मीकि का ही अनुकरण है; क्योंकि वहाँ भी रामायण को वेद-उपनिषद् पर आधारित माना जाता है। बुल्के ने प्राकृत पद्मचरित या रामचरित की चर्चा करते हुए विमलसूरिकृत पउमचरियं को ईसा की तीसरी या चौथी शताब्दी की रचना स्वीकार किया है, साथ ही ईसा की नवीं शताब्दी में शीलाचार्यकृत रामलक्खणचरिय को विमलसूरि की परम्परान्तर्गत मानते हुए भी वाल्मीकीय रामायण से अधिक प्रभावित माना है। भद्रेश्वरकृत कहावली के अन्तर्गत रामायण, भुवनतुङ्गसूरिकृत सीयाचरिय तथा रामलक्खणचरिय को भी ग्यारहवीं ई० शती की रचना माना है। संस्कृत जैन रामायणों की चर्चा में रविषेणकृत पद्मचरित को सन् ६६० ई० का माना है। हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र की टीका में सीतारामकथानकम्, जिनदासकृत रामायण या रामदेवपुराणम् को ईसा की १५ वीं; पद्मदेवविजयगणिकृत रामचरित और सोमसेनकृत रामचरित को १६ वीं तथा सोमप्रभकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुष- चरित और मेघविजयगणिवरकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित को ई० १७ वीं शती की रचना माना है। इसी तरह पद्मपुराण अथवा रामचरित्र, सीताचरित्र, रामायणकथानकम्, सीताकथानकम् आदि ग्रन्थों की भी प्रसिद्धि है। अपभ्रंश में प्राप्त स्वयम्भूदेवकृत पउमचरिउ अथवा रामायणपुराण ८ वीं ई० शती, रइधूकृत पद्मपुराण अथवा बलभद्र- पुराण १५ वीं शती, कन्नड़ में पम्परामायण या रामचन्द्रचरितपुराण ११ वीं, कुमुदेन्दुकृत रामायण और देवप्पकृत रामविजयचरित १६ वीं शती तथा चन्द्रसागरवर्णीकृत जिनरामायण १९ वीं शती की रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। उक्त सभी ग्रन्थ ईसा की तीसरी चौथी शती के बाद की ही रचनाएँ हैं, अतः बाल्मीकिरामायण से अर्वाचीन ही हैं, सुतरां उन सब का मूल वाल्मीकिरामायण ही है। रावणचरित (पर्व १-२०) के प्रारम्भ में विद्याधरलोक, राक्षस-वंश तथा वानर-वंश का वर्णन है, जो वाल्मीकिरामायण के उत्तर-काण्ड में वर्णित रावण से सम्बन्धित होने पर भी उससे पर्याप्त भिन्न भी है। रावणचरित के अनुसार राक्षसराज रत्नश्रवा से कैकेसी में दशमुख (रावण), भानुकर्ण (कुम्भकर्ण), चन्द्रनखा (शूर्पणखा) और विभीषण ये चार सन्तानें हुईं। रत्नश्रवा ने जब अपने पुत्र को पहले पहल देखा तब वह अपने गले में एक माला पहने हुए था; उस माला में पिता को बालक के दस सिर दिखाई पड़े; अतः उस शिशु का नाम दशमुख रख दिया गया। अपने मौसेरे भाई वैश्रवण का विभव देखकर दशमुख ने अपने भाइयों के साथ तप किया और विभिन्न विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उसने मन्दोदरी तथा अन्य छः विद्याधर कन्याओं से विवाह किया और कालान्तर में वैश्रवण और यम को परास्त कर पुष्पक विमान प्राप्त कर लङ्का में प्रवेश किया। रावणवालि-संघर्ष रावण ने वाली के पास अपना दूत भेज कर कहलाया कि वह स्वयं आकर उसको प्रणाम करे और अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह उसके साथ कर दे। वाली जिनवरेन्द्र से अन्य किसी को भी प्रणाम नहीं करता था; अतः वह अपने भाई सुग्रीव को राज्य देकर स्वयं जैनदीक्षा लेने चला गया (पर्व ९)। सुग्रीव ने रावण को प्रणाम किया और उसके साथ अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह भी कर दिया। बाद में, वाली द्वारा रावण को पराजित किये जाने का वृत्तान्त एक सर्वथा नवीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। तदनुसार वाली रामायणीय कथा के शिव का रूप लेता है और रावण द्वारा उठाये हुए पर्वतों को अपने पैर के अंगूठे से दबा देता है। आगे रावण द्वारा इन्द्र, वरुण एवं यम पर विजय प्राप्त करने का भी वर्णन है। जैनकथानुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी है। उसने जैन-मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाया और ऐसे यज्ञों पर, जिनमें पशुवध होता हो, रोक लगायी (पर्व ११), नलकूबर की पत्नी उपरम्भा के प्रेम-प्रस्ताव को अस्वीकार किया (पर्व १२) और अनन्तवीर्य के धर्मोपदेशों को सुन कर व्रत ले लिया है कि वह विरक्त परनारी के साथ रमण नहीं करेगा।