रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय जैनमत में रामकथा १२९ रानियों के पुत्र हैं। वासुदेव अपने बड़े भाई बलदेव के साथ प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) से युद्ध कर उसका वध करते हैं। दिग्विजय कर वे भारत के तीन खण्डों पर अधिकार कर अर्धचक्रवर्ती बन जाते हैं। मरने पर वासुदेव को प्रतिवासुदेव के वध के कारण नरक जाना पड़ता है। नौ वासुदेवों में लक्ष्मण और कृष्ण विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। बलदेव अपने भाई की मृत्यु के कारण शोकाकुल होकर जैनदीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। प्रतिवासुदेव सदैव वासुदेव का विरोध करते हैं और वासुदेव के चक्र से मारे जाते हैं। जैन कथा के अनुसार वानर और राक्षस दोनों विद्याधरवंश की विभिन्न शाखायें हैं। कथासरित्सागर, रामायण तथा महाभारत में विद्याधर देवयोनि का वर्णन अवश्य है। परन्तु महाभारत तथा रामायण के अनुसार उनका कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। महाभारत आदि में हनुमान्, वाली, सुग्रीव आदि विद्याधर नहीं, किन्तु वायु, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं के अंशभूत विशिष्ट वानर ही थे। जैनों के अनुसार ऋषभ ने अपने सौ पुत्रों में से भरत को अपना राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली। पश्चात् नमि और विनमि ने उनके पास पहुँचकर राज्यलक्ष्मी माँगी तो उनको विविध विद्यायें मिलीं। ऋषभ के परामर्शानुसार विन्ध्य-प्रदेश में उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया। ये ही दो राजकुमार विद्याधरों के पूर्वज हैं (पउमचरियं पर्व ३)। ये सब मनुष्य ही थे। उनको कामरूपत्व, आकाशगामित्व आदि विद्यायें सिद्ध थीं। वानर-वंशीय विद्याधरों की ध्वजाओं एवं महलों पर वानरों के चिह्न होते थे। इसलिए वे 'वानर' कहलाये (पउमचरियं ६।८९)। जैन रामकथाओं में प्रारम्भ में ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने की असत्य कथायें वर्णित हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैन रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद ही प्रचारित हुई है। वस्तुतः अनादि वेद तथा उपनिषद् मूलक वाल्मीकिरामायण ही राम के चरित्र में परम प्रमाण है। रामचरित्र की अत्यन्त लोकप्रियता देखकर जैन तीर्थङ्करों ने यह सोचा होगा कि यदि जैन जनता वाल्मीकिरामायण की ओर आकर्षित हुई तो स्वभावतः उनकी प्रीति वेद एवं ईश्वर तथा वैदिक कर्मकाण्ड में हो जायगी, परन्तु यह जैनधर्म के विरुद्ध है; अतः वाल्मीकिरामायण से रामचरित लेकर उसे विकृत रूप में उपस्थित किया जाय । श्वेताम्बर-सम्प्रदाय में विमलसूरि की राम-कथा प्रचलित है; दिगम्बर सम्प्रदाय में विमलसूरि एवं गुणभद्र की रामकथा का प्रचलन है। विमलसूरि की परम्परा की चर्चा करते हुए बुल्के ने स्पष्ट कहा है कि "विमलसूरि ने पउमचरियं लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है" (पृ० ६७ अनु० ५८)। विमलसूरि का काल जैन-परम्परा के अनुसार (पउमचरियं ११८।१०३) पउमचरियं ७२ ई० की रचना है। भाषा के आधार पर डा० याकोबी आदि विद्वान् पउमचरियं को तीसरी अथवा चौथी शती ई० की रचना मानते हैं। यह ग्रन्थ शुद्ध जैन-महाराष्ट्री में लिखा गया है। इसका संस्कृत रूपान्तर रविषेणाचार्य ने ६६० ई० में किया, जो पद्मचरित के नाम से प्रसिद्ध है। बुल्के के अनुसार "संघदासकृत वसुदेवहिण्डि में जो संक्षिप्त रामकथा मिलती है वह विमलसूरि की अपेक्षा वाल्मीकि के अधिक निकट है।" यद्यपि विमलसूरि का कहना है कि पद्मचरित आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा है और नामावली- बद्ध था; पर इसका इतना ही अर्थ है कि कथा के प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों, भवान्तरों आदि के नाम ही उसमें होंगे। पल्लवित कथा का रूप विमलसूरि ने ही निर्मित किया है। १७