भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 205

१२८ रामायणमीमांसा पञ्चम इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशस्विनः । भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते ॥ तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः । लोकान् सन्तानकान्नाम यास्यन्तीमे समागताः ॥ यच्च तिर्यग्गतं किञ्चित्त्वामेवमनुचिन्तयत् । प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या तत् सन्तानेषु निवत्स्यति ॥ सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युक्ते ब्रह्मलोकादनन्तरे । वानराश्च स्विकां योनिमृक्षाश्चैव तथा ययुः ॥” (वा० रा० ७।११०।१६-२०) अवधवासी सभी प्रजा ने प्रसन्नता एवं हर्षपूर्ण आनन्दाश्रु से विह्वल होकर सरयू में स्नान करके स्वेच्छा से प्राणत्याग किया और विमान पर आरूढ़ होकर वे सन्तानकलोक पहुँच गये । न केवल मनुष्य ही; किन्तु पशु-पक्षी भी सरयूजल से क्लिन्न होकर प्रभावान् दिव्य देह से युक्त होकर दिव्य देवलोक में चले गये— “भेजिरे सरयू सर्वे हर्षपूर्णाश्रुविक्लवाः । अवगाह्याप्सु यो यो वै प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत् ॥ मानुषं देहमुत्सृज्य विमानं सोऽध्यरोहत । तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम् ॥ सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवपूंषि तु । दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन् ॥ गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च । प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन् ॥” (वा० रा० ७।११०।२३-२६) इतने स्पष्ट उल्लेख पर भी यह कहना कि श्रीराम ने अपनी प्रजा के साथ जलसमाधि ले ली—स्पष्ट ही सत्य का तिरस्कार है और प्रजा की आँखों में धूलिप्रक्षेप करना है। इस तरह स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण का नाम लेकर मिथ्या कल्पना के आधार पर ही आनन्द कौसल्यायन ने जो ‘राम की जबानी राम की कहानी’ लिखी है वह निराधार, निष्प्रमाण अतएव उपेक्षणीय ही है । ✤ जैनमत में रामकथा बुल्के के कथनानुसार जैनधर्म में रामकथा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। राम (पद्म), लक्ष्मण और रावण न केवल जैनधर्मावलम्बी थे; किन्तु उनकी गणना जैनियों के त्रिषष्टि महापुरुषों में होती है। इन त्रिषष्टि महापुरुषों का वर्णन इस प्रकार है—२४ तीर्थङ्कर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव । इन सब की जीवनियां जैनधर्म में महाभारत, रामायण तथा पुराणों के समान आदरणीय हैं । त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण, आदिपुराण, उत्तरपुराण एवं पउमचरियं में उनका विस्तृत वर्णन है। पउम- चरियं (रामचरित) चौथी शती ई० का माना जाता है। प्रत्येक कल्प में ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव होते हैं। वे ही क्रमशः राम, लक्ष्मण और रावण माने जाते हैं। बलदेव और वासुदेव किसी राजा की विभिन्न