भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१२४ रामायणमीमांसा पञ्चम “श्वयोनिं वा शूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा.....” (छा० उ० ५।१०।७) योनिभेद से कर्मभेद होते हैं। सम्राट् हो जाने पर भी कोई राजसूय का अधिकारी नहीं हो सकता है यदि क्षत्रिय योनि में पैदा न हुआ हो। इसी प्रकार तपस्या में शूद्र का अधिकार नहीं हो सकता। यह भी शास्त्रगम्य धर्म है, अन्धविश्वास नहीं है। ब्राह्मणवाद कोई वाद नहीं है। वेदादिशास्त्रप्रामाण्यवाद आस्तिकमात्र का वाद है। राम उसी शास्त्ररक्षण की साक्षात् मूर्ति थे। उनसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ही नहीं विश्व के प्राणिमात्र का कल्याण होता है। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतीक न होकर प्रमाद का प्रतीक था। कारण कि जिन शास्त्रों के अनुसार तपस्या का महत्त्व है, तपस्या से स्वर्गप्राप्ति कही गयी है, उन्हीं शास्त्रों में शूद्र के लिए तपस्या वर्जित भी है। क्या आधी मुर्गी पकाने और आधी अण्डा देने के काम में आ सकती है ? इसी तरह उन्हीं शास्त्रों का कोई अंश स्वीकार कर लेना, अन्य अंश छोड़ देना क्या उचित है ? वैसा करना चेतना नहीं प्रमाद है। जो जिसमें अधिकृत है उसे छोड़ कर अन्य अच्छे कर्म में भी प्रवृत्ति प्रमाद है, अपराध है और ऐसा करनेवाला दण्डनीय भी है। उदाहरणार्थ मार्गदर्शक या एक यातायातनियामक आरक्षी ( पुलिस ) यदि अपना काम छोड़कर किन्हीं सभ्य पुरुषों की हमलावर गुण्डों से रक्षा करने के काम में भी लग जाता है तो वह दण्डनीय है। गुण्डों से सभ्य पुरुषों की रक्षा करना अच्छी बात है, परन्तु यदि इसी बीच यातायात का नियन्त्रण न होने के कारण मोटर आदि का एक्सीडेण्ट हो जाने से अनेकों सभ्य पुरुषों की मृत्यु हो जाय तो उसका उत्तरदायित्व उसी पर होगा और वही होगा दण्ड का भागी। एक न्यायाधीश की दृष्टि में किसी हत्यारे को फाँसी देना आवश्यक है फिर भले ही उसकी फाँसी से उसके बूढ़े माँ-बाप अनाथ हो जायें, उसकी विधवा स्त्री और छोटे-छोटे बच्चे अनाथ होकर घोर विपत्ति में पड़ जायें। दया करना बहुत अच्छी बात होने पर भी उस न्यायाधीश का दया करके हत्यारे को फाँसी न देना प्रमाद होगा। उसी तरह एक शासक जो धन, धर्म तथा मर्यादाओं की रक्षा के लिए उत्तरदायी है, उसका स्वकर्तव्यविमुख अन्य के कर्म में तल्लीन नागरिक को दण्ड देना अत्यावश्यक है। यदि कोई सफाई-विभाग या हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी बिना त्यागपत्र दिये तथा दूसरे अधिकारी को बिना चार्ज दिये अपना काम छोड़कर आसन, प्राणायाम या तपस्या में रत हो जाय और सफाई में गड़बड़ी होने से कॉलरा फैल जाय तथा कई नागरिकों की मृत्यु हो जाय तो उस काण्ड का उत्तरदायी और दण्ड्य वह अधिकारी ही होगा, अन्य नहीं । इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए यदि स्वकर्तव्यविमुख होकर तपस्या मे लगने के कारण शम्बूक को श्रीराम ने दण्ड दिया, तो वह सर्वथा उचित ही है। दण्ड्य को दण्ड नहीं देनेवाले और अदण्ड्य को दण्ड देनेवाले शासक समानरूप से दोषी होते हैं। श्रीराम ने जैसे स्वकर्तव्यविमुख शम्बूक शूद्र को दण्ड दिया वैसे ही स्वकर्तव्यविमुख रावण जैसे ब्राह्मण को भी दण्ड दिया था। अतः सचमुच नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ का वेत्ता श्रीराम के समान अन्य कोई नहीं हुआ— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ।।” (रा० मा० २।२५२।३) उच्छृङ्खलता और धर्मनियन्त्रण दोनों परस्पर विरुद्ध ही हैं। एक के उन्मेष में दूसरे की मृत्यु निश्चित है। उच्छृङ्खलता के उज्ज्रीवन से विश्व में विप्लव होगा, उसके विनाश एवं धर्मनियन्त्रण के रक्षण से विश्व का कल्याण होगा। इसी लिए श्रीराम ने देवता, दानव, ब्राह्मण, शूद्र सभी के कल्याणार्थ उच्छृङ्खलता का वध कर धर्मनियन्त्रण का रक्षण किया। यही है शम्बूक के वध से ब्राह्मणपुत्र की रक्षा का अभिप्राय । सीता के शपथ के सम्बन्ध में कौसल्यान की कल्पना है—“श्रीराम ने कहा कि किसी के अपमान की कोई हद होती है। अपनी प्राणप्रिया सीता का मैं अनन्त अपमान कर चुका था। जो सीता सारे राजसुखों का त्याग