भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

कर वन-वन भटकने के लिए मेरे साथ चली आयी थी, जिस सीता ने मेरे वल्कलवसन धारण करने पर स्वयं भी वल्कल- वसन धारण कर लिये थे, जिस सीता ने गङ्गातरण के समय मेरे सकुशल अयोध्या लौट आने पर अनेक मन्नतें (मान- ताएँ) मानी थीं, जो सीता ऋषिपत्नी अनसूया की आज्ञा मानकर उसके द्वारा प्रदत्त वस्त्राभूषणों को पहनकर वन में भी मेरे पास आयी थी, जिस सीता ने मुझसे निरपराध प्राणियों के न मारने और अहिंसाधर्मपालन करने का अनुरोध किया था, जिस सीता ने उस स्वर्णवर्ण कपटमृग को जीवित या मृत अवस्था में लाने के लिए मुझे उसके पीछे दौड़ाया था, जिस सीता की सुरक्षा के लिए मैं लक्ष्मण को उसके पास छोड़ आया था, जिस सीता ने अपनी तनिक भी चिन्ता न कर लक्ष्मण को मेरी सहायता के लिए जाने को मजबूर किया था, जिस सीता को रोती बिलखती अवस्था में रावण उठाकर ले गया था, जिस सीता को रावण ने अनेक प्रलोभन दिये थे और जिसने मेरे मुकाबले में रावण को हमेशा नगण्य समझा था, जिस सीता को रावण ने केवल दो मास और जीवित रहने की धमकी दी थी, जो इससे भी टस से मस नहीं हुई थी, जिस सीता ने परपुरुष के शरीर तक का स्पर्श न करके अपनी मर्यादा को निभाने के कारण हनुमान् की पीठ पर बैठने से इनकार कर दिया था, जिस सीता के चरित्र पर सन्देह करके मैंने रावणवध के अनन्तर उसे अन्यत्र जाने के लिए कह दिया था, जिस सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म को निष्कलङ्क सिद्ध करने के लिए अग्नि में प्रवेश किया था, जिस सीता को मूर्तिमान् अग्निदेव ने मुझे समर्पित कर उसकी पवित्रता को प्रमाणित किया था और जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया था, जिस सीता को भद्र की अशुभ सूचना पर मैंने त्याग दिया था और जिसके चरित्र की परिशुद्धता को मुनि वाल्मीकि ने प्रमाणित किया था, उसी सीता को मैंने एक बार फिर भरी सभा में अपनी शुद्धता को प्रमाणित करने के लिए शपथ ग्रहण करने को कहा। मुझे इसमें अब कोई सन्देह नहीं कि मेरे जैसे लोका- पवादभीरु पति के साथ रहने की अपेक्षा सीता ने, उस भूमिपुत्री ने, पुनः भूमि में ही समा जाना श्रेयस्कर समझा। उस समय सीता तपस्विनियों के अनुरूप गेरुवा वस्त्र धारण किये हुए थी। सारी उपस्थित जनमण्डली की ओर करबद्ध मुद्रा अपनाये हुए वे बोलीं-मैं श्रीरघुनाथ के सिवा किसी भी पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। श्रीराम को छोड़कर मैं किसी दूसरे पुरुष को नहीं जानती, यदि यह कथन सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। पृथ्वी माता ने विवर दे दिया। सभी लोगों के देखते-देखते जानकी रसातल प्रयाण कर गयी। वहाँ एकत्रित जनता नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न भावनाओं से ग्रस्त हो उठी। मैंने मिथलेशकुमारी के चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाया था और उसने स्वप्न में भी मेरे बारे में अन्य कुछ न सोचा था। मैं पातकी सिद्ध हुआ और वह पतितपावनी। ऋषि-मुनि ही नहीं सभी राक्षस तथा वानर भी पुकार उठे :-साध्वी सीते तुम धन्य हो....।।" कौसल्यायनने अपने बौद्ध स्वभाव के कारण यहाँ भी श्रीराम के द्वारा मैं पातकी हूँ इत्यादि दुष्कल्पना करा ही डाली। परन्तु भाव, कुभाव किसी तरह श्रीरामाचरित पढ़ते-पढ़ते कौसल्यायन की बुद्धि ठिकाने आ गयी और उन्होंने श्रीसीता के निर्मल चरित्र का यथावत् वर्णन कर डाला। सीता का अग्निप्रवेश स्वीकार किया और मूर्तिमान् अग्निदेव ने सीता को राम के लिए समर्पण किया-यह मान लिया और यह दुस्तर्क नहीं किया कि कोई मनुष्य अग्नि में प्रविष्ट होकर जीवित कैसे निकल सकता हैं, अग्नि मूर्तिमान् देवता कैसे हो सकता हं और वह सीता को समर्पित कैसे कर सकता हैं ? कौसल्यायन के राम कहते हैं-"श्रीलक्ष्मण ने हाथ में जल लिया और प्राणवायु का अवरोध कर वहीं शान्त हो गये। तब विभीषण को मैंने आशीर्वाद दे दिया। जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी तबतक इस भूतल पर तुम्हारा राज्य रहेगा। हनुमान् से भी मैंने कहा-हरीश्वर ! जबतक संसार में मेरी कथाओं का प्रचार रहे तबतक तुम भी मेरी आज्ञाओं का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहना। जाम्ब-