रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ रामायणमीमांसा पञ्चम वान् आदि वानरनायकों को मैंने द्वापर के अन्ततक जीवित बने रहने का आशीर्वाद दिया।" आश्चर्य है—चार्वाक- प्राय कौसल्यायन को ऐसी बातों में विश्वास कैसे हो गया ! आगे कौसल्यायन के अनुसार "सरयू नदी पर पहुँच कर राम ने तथा राम का अनुसरण करते हुए विशाल जनसमूह ने जलसमाधि ले ली। राम की ही तरह वे भी परम धाम को प्राप्त हुए। सभी पुरवासी राम के पीछे हो लिये एक भी प्राणी पीछे नहीं रहा, कोई पशु-पक्षी भी पीछे नहीं रहे।" प्रश्न यह है कि कौसल्यायन को यह कैसे विश्वास हो गया कि समस्त जनता और पशु-पक्षियों तक ने जलसमाधि (डूबने) के लिए श्रीराम का अनुसरण किया ? आगे कौसल्यायन के अनुसार श्रीराम ने कहा कि 'मैं चाहता हूँ कि उन भयावह भूलों से लोग बचें जिन भूलों को मैंने अपने जीवन में बार-बार दुहराया है।' पर यह भी कौसल्यायन की मनगढ़न्त कल्पना ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में ऐसा कोई भी शब्द नहीं है, जिसका यह अर्थ होता हो। केवल जनता की आँखों में धूल डालने के लिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का उद्धरण किया है। उनकी दुष्कल्पनाएँ रामायण तथा वेदादि शास्त्रों, दर्शनों तथा सत्तर्कों से अत्यन्त विरुद्ध हैं। जलसमाधि बतलानेवाला भी वाल्मीकिरामायण का कोई वचन नहीं है। परम्परा से भी दूर से भी किसी श्लोक का ऐसा अर्थ नहीं है। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड में स्पष्ट कहा गया है—श्रीराम की अयोध्या के पुरवासी तथा पशु-पक्षी तक सम्पूर्ण जीवित प्राणी राम के साथ हो लिये— "नोच्छ्वसत्तदयोध्यायां सूक्ष्ममपि दृश्यते । तिर्यग्योनिगताश्चैव सर्वे राममनुव्रताः ॥" (वा० रा० ७।१०९।२२) क्या किसी राजा के साथ पशु-पक्षी सहित सभी पुरवासी जलसमाधि (डूबने) के लिए जा सकते हैं ? क्या यह श्रीराम के परब्रह्म होने में प्रमाण नहीं है ? श्रीराम सरयूतट पर डेढ़ योजन पश्चिम की ओर गये। उसी समय सब देवों एवं महात्माओं से परिवृत लोकपितामह ब्रह्माजी वहाँ आये; जहाँ श्रीरामजी परमधाम जाने के लिए प्रस्तुत थे। शतकोटि दिव्य विमानों से तथा दिव्य तेजों से वहाँ का आकाश दिव्य ज्योतिर्मय, स्वयंप्रभ, पुण्यकर्मा स्वर्गियों से दीप्त हो रहा था, दिव्य गन्धवान् पुण्य वायु बह रहा था और पुष्पवृष्टि हो रही थी— "अथ तस्मिन् मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः । सर्वैः परिवृतो देवैर्भूषितैश्च महात्मभिः ॥" (वा० रा० ७।११०।२) "आययौ यत्र काकुत्स्थः स्वर्गार्थं समुपस्थितः । विमानशतकोटीभिर्दिव्याभिरभिसंवृतः ॥" (वा० रा० ७।११०।७) बाजे बज रहे थे। गन्धर्व, अप्सरा आदि से वह स्थान सङ्कुल था। श्रीराम ने सरयूसलिल में अपने चरणों से चलना आरम्भ किया— "सरयूसलिलं रामः पद्भ्यां समुपचक्रमे ॥" (वा० रा० ७।११०।७) उसी समय आकाश से पितामह ब्रह्मा ने दिव्य वाणी से कहा—"हे विष्णो ! आपका भद्र हो। बड़े सौभाग्य से आप प्राप्त हुए हो। देवतुल्य अपने भ्राताओं के साथ अपने सगुण निर्गुण जैसे स्वरूप की इच्छा हो, उसे स्वीकार करो। आप वैष्णवी तनु अथवा शुद्ध सनातन शुद्ध ब्रह्मरूप से विराजमान हों। आप ही सब लोगों को दिव्य गति प्रदान करनेवाले और आप ही सब लोगों के गन्तव्य परमपद हैं। आपकी विशालाक्षी, ज्ञानशक्तिरूपा, पूर्वपरिग्रहा, नित्यसिद्धा सहजा माया के अनुग्रह के बिना अतिशय तपःसम्पन्न लोग भी आपके अचिन्त्य महान् अपरिच्छिन्न अक्षय ब्रह्मरूप को नहीं जानते हैं। श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा भक्ति, ध्यान आदि से प्रसन्न हुई विशालाक्षी, नित्यसिद्धा आपकी चितिरूपा महाशक्ति के अनुग्रह से ही आपका ज्ञान होता है—