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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 200

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२३ निम्नोक्त बात कहते है—'प्रत्येक पुरुष अपने युग के मिथ्या विश्वासों का शिकार होता है। मैं नहीं जानता था कि कोई स्वर्गलोक है अथवा नहीं। किन्तु मेरे समय के लोग मानते थे कि है और मैं भी मानता था कि है। मैं नहीं जानता कि मरने के बाद कोई भी किसी भी स्वर्गलोक में जाता है, या नहीं। किन्तु मेरे युग के लोग मानते थे कि आदमी सशरीर भी स्वर्ग जा सकता है। मैं भी ऐसा ही मानता था। मैं नहीं जानता था कि किसी शूद्र के लिए तपस्या करना क्यों निषिद्ध ठहराया गया था। पैर ऊपर सिर नीचे करके तपस्या करने से स्वर्ग होता है या नहीं यह सब मैं नहीं जानता था। परन्तु मेरे युग के सब लोग यह सब मानते थे। तपस्या करना शूद्र का विहित कर्म नहीं है और मैं भी मानता था कि उसका ऐसा करना अधर्म है। मैं यह नहीं जानता था कि शूद्र का तपस्या करना किसी ब्राह्मण के लड़के की मृत्यु का कारण कैसे हो सकता है ? किन्तु नारद मुनि ने ऐसा कहा था। मैंने इसपर विश्वास कर लिया था। ये सारे विश्वास सत्ययुग में ब्राह्मणों तक ही सीमित थे। त्रेतायुग में हम क्षत्रिय भी इनके शिकार हो गये और अब वैश्य और शूद्र भी। अन्यथा किसी शूद्र को क्या पड़ी थी कि वह पेड़ पर सिर नीचा और पैर ऊपर करके लटके और सोचे कि वह सशरीर स्वर्ग पहुँच जायगा। जहाँ तक मिथ्या विश्वास का सम्बन्ध है मुझमें और उस शूद्र में कोई अन्तर नहीं था। भावी इतिहासकार मुझे शम्बूक का वध करने के लिए दोषी ठहरायेंगे। वे यह नहीं सोचेंगे कि मैं स्वयं कितने अधिक मिथ्या विश्वासों का शिकार था। सही बात यही है कि मैं द्विजों के स्वार्थों के संरक्षण को साक्षात् मूर्ति था। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतिनिधि था। ब्राह्मणबालक का मरण ब्राह्मणवाद का मरण था और शम्बूक का वध शूद्रों की जाग्रत् चेतना की हत्या। एक के जीवित रहने के लिए दूसरे का निधन आवश्यक था। मृत ब्राह्मण जी उठे उसके लिए यह अनिवार्य था कि शम्बूक शूद्र की हत्या हो। मैं तो केवल एक निमित्त मात्र था। क्या भावी इतिहास लेखक मुझे क्षमा नहीं करेंगे ?" कौसल्यायन की यह अपने फितूरी मस्तिष्क की कल्पना है। इसका वाल्मीकिरामायण तथा श्रीराम से कोई सम्बन्ध नहीं है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो शम्बूक स्वयं अपने को शूद्र योनि में उत्पन्न मानता था और तपस्या से स्वर्ग की प्राप्ति सम्भव मानता था— “शूद्रयोन्यां प्रजातोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः । देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः ॥ (वा० रा० ७।७६।२) जब ब्राह्मणयोनि और शूद्रयोनि में भेद है तो उसके कर्मों में भी भेद हो ही सकता है। यदि कौसल्यायन थोड़ा और प्रगतिशील हों और बौद्ध धर्म छोड़कर चार्वाक हो जायें तब तो उनको बौद्ध धर्म भी अन्धविश्वास ही प्रतीत होगा; क्योंकि पुनर्जन्म की मान्यता बौद्ध धर्म में भी है। लङ्कावतारसूत्र में हत्या करने से, झूठ बोलने से तथा मांस खाने से अधम योनियों की प्राप्ति बतलायी गयी है। तप और व्रत आदि का महत्त्व भी बौद्ध धर्म में मान्य है। आज भी बौद्धगया में अनेकों बौद्ध भिक्षु दण्डवत् प्रणाम करते दिखायी देते हैं। 'मणिपद्मे हुँ' की चरखी भी चलाते हुए अनेक तिब्बती बौद्ध लामा दिखायी देते हैं। यह सब भी तो क्या मिथ्या विश्वास नहीं है। वस्तुतः कौसल्यायन का उक्त कथन बौद्ध धर्म के विरुद्ध ही है। कारण कि बौद्ध लोग भी धर्म, अधर्म में भगवान् बुद्ध के वचनों को ही प्रमाण मानते हैं। इसी लिए बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि के लिए उनका महान् प्रयास है। सामान्य और प्रत्यक्ष अनुमान से ही सब काम सिद्ध हो जायें तो बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि का कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। नैयायिक आदि ईश्वर को सर्वज्ञ तथा ऋषियों को परावरद्रष्टा मानकर ईश्वर के वेद तथा आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही धर्माधर्म का निर्णय करते हैं। पूर्वोत्तरमीमांसक अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्ष धर्म-ग्रन्थों से धर्मादि का निर्णय करते हैं। जैसे चक्षु द्वारा रूप का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है; श्रोत्र द्वारा शब्द का ज्ञान, मन द्वारा सुख-दुख का ज्ञान मिथ्या ज्ञान नहीं है वैसे ही वेदादि शास्त्रों के द्वारा धर्म और ब्रह्म का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है। उसके अनुसार तपस्या का स्वरूप और उसका फल विदित होता है। उनके अनुसार श्वान, शूकर, गौ, गर्दभ, अश्व आदि योनियों के समान ही ब्राह्मण, शूद्र आदि योनियाँ भी सिद्ध होती हैं।

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