रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५ ) रामराज्य में सभी सुखी और सभी शोकरहित थे— हरषित भये गये सब सोका । राम ने अपने राज्य को 'आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी' के अनुसार बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण थे, राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न जैसे शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे । तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी सती पुरन्ध्रियाँ होती थीं । राष्ट्र के रथी विजेता होते थे। राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । समय-समय पर वृष्टि होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक को प्राप्त होती थीं । राष्ट्र के योग-क्षेम की पूर्ण व्यवस्था थी । राम गौओं और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अपने अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत् कर्म की साधना में उद्यत रहे— गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥ रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे— दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहि काहुहि व्यापा ॥ (रामचरितमानस ७।२०।१) उच्च धर्मनिष्ठता एवं ब्रह्मनिष्ठता का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को कोई पीड़ा नहीं होती थी । सब सुन्दर और नीरोग होते थे । कोई दुःखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षणवाला भी नहीं होता था— अलप मृत्यु नहि कबनेउ पीरा । सब सुन्दर सब निरूजसरीरा ॥ नहिं दरिद्र कोउ दुःखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥ सब उदार सब पर उपकारी । विप्रचरनसेवक नर नारी ॥ एकनारिव्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥ वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम का मन्त्रिमण्डल था, जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, अस्त्रशस्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान मन्त्री थे । सीताराम का महत्त्व पद्मपुराण के अनुसार श्रीहरि का एक-एक नाम समस्त वेदों के समान परमपावन है और हरि के सहस्र नामों के तुल्य एक श्रीरामनाम है । तभी तो भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं—हे वरानने ! मैं मनोरम राम में राम, राम, राम जपता हुआ सदा रमण करता हूँ । राम का एक-एक नाम हरि के सहस्र नामों के तुल्य हैं । जैसे सच्चिदानन्दघनमूत्ति राम हैं वैसी ही राम की ह्लादिनी, सन्धिनी और संविन्मूत्ति जनकनन्दिनी जानकी हैं । आह्लादिनी आदि शक्तियों से विशिष्ट ही परिपूर्ण ब्रह्म होता है । उसी तरह सर्वालङ्कारों से अलङ्कृता सुवर्णवर्णा द्विभुजा चिद्रूपिणी कमलधारिणी श्रीजनकनन्दिनी सीता से आश्लिष्ट होकर ही श्रीरामचन्द्र परात्पर परब्रह्म हैं । सकल सत्शास्त्रों का तात्पर्य सीता में पर्यवसित है, क्योंकि सीतोपनिषद् के अनुसार सीता ब्रह्मसत्तासामान्य- रूपा है । तभी तो श्रीपराशरभट्ट स्वामी कहते हैं—केवल श्रीसूक्त तथा रामतापनी उपनिषद् ही हाथ उठाकर आपको ही जगत् की एकमात्र नियन्त्री नहीं कहते हैं, किन्तु रामायण महान् आर्ष ग्रन्थ भी आपके चरित्र का प्रतिपादन कर के ही जीवनधारण करता है । जितने स्मृतियों के प्रणेता मनु आदि हैं वे सभी पुराणों के सहित वेदों को आपकी महिमा में प्रमाण मानते हैं ।