भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १६ ) भक्त वैष्णवाचार्य तो मुक्तकण्ठ से स्पष्ट कहते हैं—हे माता मैथिली, लङ्का में नित्य अभिनव अपराध करनेवाली राक्षसियों का रोषपूर्ण हनुमान् से, अनेक हेतुदर्शक वचनों द्वारा बिना शरण से आये ही, संरक्षण कर आपने राघवेन्द्र श्रीराम की गोष्ठी (संसद्) को लघु बना दिया, क्योंकि राघवेन्द्र रामचन्द्र भगवान् ने तो जयन्त तथा विभीषण का ही संरक्षण शरण में आनेपर ही किया, किन्तु आपने तो अपने परमोत्कृष्ट क्षमागुण के प्राबल्य से शरण में आये बिना, अहैतुकी कृपा से, उन कई राक्षसियों का संरक्षण किया—आपकी वह आकस्मिकी क्षमा हमें महान् अपराधों से क्षमा कर सुखी करे । संमोहनतन्त्र के अनुसार गौर तेज (महालक्ष्मीस्वरूपा जनकनन्दिनी जानकी) के बिना श्याम तेज (नीलसरोरुह-द्युति विष्णुरूप भगवान् श्रीराम) के पूजन, भजन तथा ध्यान से पूर्ण सिद्धि मिलना तो दूर पातक ही हाथ लगता है । ब्रह्माजी श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्रजी से कहते हैं— सीता लक्ष्मोर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः । वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥ (वा० रा० ६।११७) विष्णुपुराण के अनुसार जैसे विष्णु सर्वगत हैं वैसे ही उनकी अनपायिनी शक्ति भी सर्वगत एवं नित्य ही है । विष्णु अर्थ हैं तो भगवती वाणी हैं, भगवती नीति हैं तो भगवान् नय हैं, विष्णु बोध हैं तो लक्ष्मी बुद्धि हैं एवं भगवान् धर्म हैं तो भगवती सत्क्रिया हैं । आगे विष्णुपुराण में कहा गया है— महालक्ष्मी ही विष्णु के राघव हो जाने पर सीता बन जाती हैं, कृष्ण होने पर रुक्मिणी बन जाती हैं, जगत्स्वामी विष्णु जब-जब अवतार लेते हैं, महालक्ष्मी उनकी सहायिनी होकर प्रकट होती हैं। अन्य अवतारों में भी विष्णु के अनुरूप ये बन जाती हैं । मनुष्य बनने पर मानुषी बन जाती हैं । सर्वथा विष्णु के अनुरूप ही अपना स्वरूप बना लेती हैं । आगे लक्ष्मीजी को सम्बोधित कर कहा गया है—माँ, लक्ष्मीजी, आप सब लोगों की माता हैं और देवाधिदेव हरि पिता हैं । आपसे और भगवान् विष्णु से सारा जगत् व्याप्त है । स्कन्दपुराण में भी कहा गया है— कमलेयं जगन्माता लीलामानुषविग्रहा । देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी ॥ विष्णोर्देहानुरूपा वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् । श्रीराम कहते हैं—अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा । अर्थात् सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न है जैसे कि भास्कर से उनकी प्रभा अभिन्न है । श्रीसीताजी भी कहती हैं— अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा । जैसे भास्कर से प्रभा अभिन्न है वैसे ही मैं श्रीराघवेन्द्र से अभिन्न हूँ। श्रीराम के लोकोत्तर गुण उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित्र वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते हैं । उन्हें कौन जान सकता है । राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ ।

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