रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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माता-पिता की आज्ञा के पालन के प्रसङ्ग में श्रीराम ने अखण्डभूमण्डल के राज्य को तृणवत् त्यागकर सहर्ष वनवास स्वीकार किया । बड़े से बड़े आदरणीय कुलपूज्य महर्षि जाबालि से भी जब राम को लौटाने की दृष्टि से ही उनके द्वारा कही गयी वेदशास्त्रविरुद्ध माता-पिता के श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, होम तथा परलोक के अपलाप से युक्त नास्तिकता की बात सुनी तो क्षुब्ध हो उठे और उनके कथन का युक्तियुक्त खण्डन करके यहाँ तक कह दिया कि इस प्रकार की बुद्धि से व्यवहार करनेवाले तथा धर्ममार्ग से हटे हुए आप जैसे नास्तिक को मेरे पिता ने याजक बनाया, मैं उनके उस कार्य की निन्दा करता हूँ । अपने प्रिय भ्राता लक्ष्मण ने भी जब कैकेयी की उचित निन्दा की तो राम ने स्पष्ट कह दिया—तात, मेरी मध्यमा अम्बा कैकेयी की निन्दा मत करो, भरत की ही चर्चा करो । यद्यपि वाली ने राम का कोई अपराध नहीं किया था तो भी सुग्रीव का अपराध करने से ही राम ने उसे अपना ही अपराधी माना और उसके वध के अनेक हेतुओं में राम ने उसका भी उल्लेख किया है । राम धनुर्वेदविदों में सर्वश्रेष्ठ थे एवं अतिरथियों में भी उनकी धाक थी । वे शत्रुसेना पर आक्रमण और प्रहार करने में दक्ष और सैन्यसंचालन में विशेष निपुण थे । संग्राम में क्रुद्ध देवता एवं दानव भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे । इतने पर भी वे दूसरों की असूया नहीं करते थे और न ही क्रुद्ध होते थे । घमण्ड एवं परोत्कर्ष की असहिष्णुता उनमें नहीं थी । फिर भी उनकी युद्धकुशलता और दृढ़ प्रहार शत्रुओं पर अपना इतना गहरा प्रभाव डालते थे कि वे सदा आतंकित रहते थे । तभी तो मारीच राम से इतना प्रभावित था कि रत्न, रथ आदि शब्दों के रकार सुनकर राम समझकर भयभीत हो जाता था । रावण के गुप्तचर भी यह अनुभव करते हैं कि राम के कुपित होने पर उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता । वे सम्पूर्ण लोकों का संहार करके नये सिरे से प्रजासृष्टि करने में समर्थ हैं । सब देवगण एवं असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते । राम के अनुसार शत्रु भी यदि शरण में आये, हाथ जोड़ कर दया की याचना करे तो आनृशंस्य की दृष्टि से कभी भी उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । आर्त हो यदि वह शत्रु के शरण में आया हो तो शत्रु को अपने प्राणों का त्याग कर भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये । महर्षि वसिष्ठ एवं विश्वामित्र तथा अगस्त्य से राम को उत्तमोत्तम शस्त्रास्त्र प्राप्त थे । वे चाहते तो उन्हें उपयोग में लाकर अनायास हो सबका संहार कर सकते थे, किन्तु राम ने कभी भी उन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग नहीं किया । मेघनाद छलपूर्वक ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वानरों, मनुष्यों तथा राम और लक्ष्मण दोनों को परेशान करता था । एक बार लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा चाही, पर राम ने कहा एक के लिए पृथिवी भर के अयुद्धयमान, प्रच्छन्न, प्राञ्जलि शरणागत, पलायमान एवं मत्त सबको मारना उचित नहीं है । इन्द्रजित् को मारने के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ । इतना ही क्यों राम ने तो श्रान्त, विरथ तथा निःशस्त्र रावण को भी अवसर दिया कि वह स्वस्थ, रथी, धन्वी होकर आये तब उससे युद्ध किया जाये । तभी मारीच जैसे राक्षस ने भी राम को निर्दोष विग्रहवान् धर्म ही बतलाया था । राम धर्म के मूर्तिमान् रूप हैं । साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं । रावणवध के बाद विभीषण ने पहले शोक व्यक्त करते हुए रावण के गुणों का वर्णन किया, परन्तु अन्त में जब उसकी अन्त्येष्टि का प्रसङ्ग आया तब उसके सीताहरण आदि दुष्कृत्यों का स्मरण करके अन्त्येष्टि करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया । तब राम ने कहा— मरने तक ही बैर रहता है । हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है । अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी है । तुम इसका दाहादि संस्कार करो । राम ने उसकी प्रशंसा भी की। रावण अधर्मी, असत्यवादी होने पर भी संग्राम में तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है । इन्द्रादि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे । इसने