भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १९ )

अनेकों दान, यज्ञ एवं श्रेष्ठ कर्म भी किये हैं। विराध के इच्छानुसार राम ने विराध का अवट (गर्त) में निक्षेप कर तथा कबन्ध के इच्छानुसार उसका दाह कर दोनों को कृतार्थ किया था। लङ्का जैसे वैभवशाली राष्ट्र को जीतकर भी राम ने उसके वैभव पर दृष्टि नहीं डाली। रावण के भाई विभीषण को ही लङ्का सौंप दी। इसी लिए रामायण की रामाभिरामी टीका में कहा गया है— त्यक्त्वा जीर्णदुकूलवद् वसुमतीं बद्धोऽम्बुधिर्बिन्दुवद् बाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः । लङ्का कापि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽर्पिता श्रुत्वैवं रघुनायकस्य चरितं को वा नरो नाचति ॥ राम दो बार बाण नहीं चलाते और दो बार नहीं बोलते अर्थात् एक ही बाण से सब अभीष्टों की सिद्धि हो जाती थी। श्रीभागवत के अनुसार एक ही बाण से राम ने रावण का वध किया था— इस तरह धनुष पर सन्धान किये हुए बाण का प्रक्षेप करते हुए राम ने उस बाण से वज्रतुल्य रावण के हृदय को छिन्न-भिन्न कर डाला। वह दसों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ वैसे ही विमान से गिर पड़ा जैसे सुकृत-क्षय होने पर लोगों के हाहाकार के बीच सुकृती विमान से गिर पड़ता है।

राम की ऐतिहासिकता हिन्दूजाति के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव है। हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म सम्बन्धी एवं रामविवाहसम्बन्धी गीत गाये जाते हैं। शरीर की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है। भारत के कोने-कोने में राम के मन्दिर हैं। लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं। अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं। करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाईलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी रामायण से सम्बन्धित होते हैं। राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम ही है। भारत के बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर रामनाम रहता है। काशी में जीवों की मुक्ति के लिए भगवान् शिव रामनाम का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है। वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास, तज्जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धित शिलालेख, ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोक-परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। भारत में उनका नाम प्रत्येक जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी नहीं है जैसी राम की है। भारत में ही नहीं सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर उनकी लीलाएँ तथा नाटक होते है। चौबीस हजार श्लोकों की वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है। महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया। पिता की आज्ञा से धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने उन्हें देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ। शङ्कराचार्य की राम- पद की व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में, श्रीमद्भागवत भागवतों का परमादरणीय ग्रन्थ है, प्रतिवर्ष उसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की विशद चर्चा है।