भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

( २० ) श्रीराम की नीति शुक्रनीति के अनुसार रामसदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही बानरों तथा भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी । श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से ही वानर और भालु भी राम के साथी हो गये । ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है । इसके उदाहरण श्रीराम हैं । नहि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः । तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति ॥ जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र हो जायेगा । भगवान् के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं— मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने । चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥ भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं । ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण ( २०५।७४,७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड़, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी मङ्गल हैं । दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीयगुणागार चक्रवर्त्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्वपूर्ण है । राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित संसार में कोई है ही नहीं— नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः । श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन कर के धर्म का पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं युद्धादि रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष प्रदान कर रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों, नाटकों में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहु- चर्चित राम को अनैतिहासिक कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है । भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु एवं रामेश्वर की स्थापना भी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं । नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के रहस्यज्ञ श्रीराम वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को एकमात्र राम ही जानते थे । भगवती सीता के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थसामञ्जस्य हुआ है । नीति—लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गतिविधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई-भतीजों के स्वार्थ वश शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नहीं ठुकरा सकता । धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं । राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था । स्नेह, दया, सुख कि बहुना अपनी हृदयेश्वरी जनक- नन्दिनी को भी त्यागना पड़े तो मुझे व्यथा न होगी । यद्यपि श्रीजनकन्दिनी महारानी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था, कुछ ही लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख दिया । इस प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियाँ भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा का अवश्य ही भङ्ग