भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 264

जेन्दावेस्ता आदि किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में ऐसा कोई उल्लेख, जो इसका द्योतक हो, प्राप्त नहीं होता। वस्तुतः सम्पूर्ण भारतके निवासी भारतीय हैं; हिन्दू हैं और वैदिक हैं। वे सब भारतीय देवी-देवताओं के पूजक हैं, परन्तु जङ्गलों में रहने के कारण नगरवासियों से भिन्न प्रतीत होते हैं तथापि भिन्न नहीं हैं। आदिवासी कोई जाति नहीं है; आर्य लोग भारत के ही ( आदि ) अनादिवासी हैं। पाश्चात्यों ने फूट का बीज बोने के लिए जङ्गलनिवासी भारतीयों को आदिवासी कहकर आर्यों का बाहर से आना माना है।१ कृषि की उन्नति रामराज्य का असाधारण गुण तो मान्य ही है। जब कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता महाराज्ञी होकर भूतल पर विराजमान हों तो कृषि की उन्नति होना स्वाभाविक ही है। सुभिक्ष का आधार भी तो उत्तम कृषि तथा उत्तम फल-फूल युक्त वृक्ष एवं दुधारू गाये ही हैं। यही सब रामराज्य की प्रशस्ति के बोधक ग्रन्थों में मिलता है। रामायण, महाभारत आदि की कथाओं में रूपक-कल्पना कोई नवीन वस्तु नहीं है; अतएव श्रीशङ्करा- चार्य आदि की रूपककल्पना भी सङ्गत ही है— “तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषांश्च राक्षसान् । शान्तिसीतासमायुक्तः आत्मरामो विराजते ॥” अर्थात्, मोहरूपी समुद्र को पार कर और राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार कर शान्तिरूपी सीता से युक्त होकर आत्मरूप राम विराजमान होते हैं। तदनुसार ही आनन्दरामायण में मनोदुर्वृत्ति के नाश को ही ताड़का-वध तथा मनोवेग-भङ्ग को ही धनुर्भङ्ग, अविवेकवध को बालिवध, अज्ञानतरणोपाय को सेतुबन्ध, मद-निग्रह को कुम्भकर्ण- वध, अहङ्कारघात को रावण वध माना गया है तथा हृदयाकाश-गमन को ही राम का अयोध्यागमन कहा गया है।२ इसी तरह राम-रावण-सङ्ग्राम और कौरव-पाण्डव-सङ्ग्राम को देवासुर-सङ्ग्राम का ही प्रतीक माना जाता है। सन्त एकनाथ रचित 'भाव-रामायण' के सभी पात्र प्रायः आध्यात्मिक ही हैं। इतने पर भी ऐतिहासिक तथ्यों का अपलाप नहीं किया गया है। “सति कुड्ये चित्रोल्लेखः ।” अर्थात् भित्ति रहने पर ही चित्र-निर्माण सम्भव है; वैसे ही राम-रावण एवं कौरव-पाण्डवों के ऐतिहासिक अस्तित्व के आधार पर ही इन रूपकों की कल्पना उचित प्रतीत होती है। अनुच्छेद १०९ में डा० बुल्के लिखते हैं, "रामकथा का ऐतिहासिक आधार मानते हुए भी एम० वेङ्कटरत्नम् का विश्वास है कि यह वास्तव में मिस्र देश के रैमेसेस नामक राजा का इतिहास है। रैमेसेस के विषय में आधुनिकतम खोज के आधार पर जो कुछ ज्ञात हुआ है उससे स्पष्ट है कि बाल्मीकिरामायण से उस राजा का कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता ।”३ एक पाश्चात्य विद्वान् के कथनानुसार ही 'वेङ्कटरत्नम् की मान्यता आधुनिकतम शोध से प्राप्त तथ्य के विपरीत है। वस्तुतः ऐसा कथन दासतापूर्ण मनोवृत्ति का ही परिणाम है। दासता की मनोवृत्ति में अपने शास्त्र, अपनी सभ्यता और अपना इतिहास तुच्छ तथा अविश्वसनीय और हर परायी बात सत्य एवं महत्त्वपूर्ण प्रतीत होने लगती है। यही कारण है कि बहुत से भारतीय विद्वान् भी पाश्चात्यों का अन्धानुकरण करते हुए रामायण एवं महा- भारत जैसे प्रामाणिक भारतीय आर्ष-इतिहासों का आधार अन्य राष्ट्रों के इतिहासों में खोजने में व्यस्त हैं। संसार के सर्वप्राचीन, अनादि, अपौरुषेय ग्रन्थ वेद और उपनिषदों में भी जब रामकथा विद्यमान है तब उसका आधार मिस्र के इतिहास में खोजने का—आधुनिक शोध के आधार पर उसके अप्रामाणिक सिद्ध होने पर भी—प्रयास करना, शुद्ध दास-वृत्ति का ही परिचायक है।


१. 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृति-मीमांसा' । २. आनन्दरामायण, सर्ग ३ । ३. रामकथा पृ० १२० ।