रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ रामायणमीमांसा षष्ठ वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार परिशिष्ट २ के अन्तर्गत डा० बुल्के लिखते हैं, "रामायण के वानर, ऋक्ष और राक्षस विन्ध्यप्रदेश तथा महाभारत की आदिवासी अनार्य जातियां थीं। इसके विषय में प्रायः मतभेद नहीं है।" यह कथन रामायण के सर्वथा विपरीत पड़ता है, इसकी अप्रामाणिकता पूर्व प्रसङ्गों में सिद्ध की जा चुकी है।१ इस परिशिष्ट में डा० बुल्के आगे लिखते हैं, "सी० वैद्य के मतानुसार वानर जाति के लोग सचमुच वानर के समान दिखलायी पड़ते थे और इससे उनका यह नाम पड़ा। अन्य विद्वान् जैन-रामायण के अनुसार मानते हैं कि वानर, ऋक्ष आदि नाम उन जातियों की ध्वजा के कारण उत्पन्न हुए। जिस जाति की ध्वजा पर बन्दर का चिह्न था वह वानर जाति कहलाती थी एवं जिसकी ध्वजा पर रीछ का चिह्न था वह रीछ कहलाती थी, जैसा कि आजकल रूसियों की ध्वजा पर रीछ तथा अंग्रेज जाति की ध्वजा पर सिंह का चिह्न होने से उस देश के वीरों को ब्रिटिश लायन्स और रसियन बीयर्स कहते हैं। जैनों की राम-रावण कथा में वानरचिह्नाङ्कित ध्वजा-मुकुटधारी जाति वानरवंशीय कही गयी है। यह मत असम्भव नहीं कहा जा सकता है। फिर भी जैनियों ने अनेक स्थलों पर रामकथा में अनेक चिन्त्य परिवर्तन किये हैं। सबसे स्वाभाविक अनुमान यह है कि आजकल के आदिवासियों के समान उन जातियों के विभिन्न कुल विभिन्न पशुओं और वनस्पतियों की पूजा करते थे। जिस कुल के लोग जिस पशु या वनस्पति की पूजा करते थे, वे उसी के नाम से पुकारे जाते थे। इस पशु या वनस्पति पूजा को आज- कल के विद्वान् टोटम कहते हैं। आधुनिक भारत के आदिवासियों में ऐसे टोटम या गोत्र विद्यमान हैं, जिनका उल्लेख रामायण में हुआ है; अर्थात् वानर, ऋक्ष ( जाम्बवान् ) और गीध ( जटायु, सम्पाति और रावण )। आर० वी० रसेल के अनुसार बन्दर और रीछ तेरह सर्वाधिक प्रचलित टोटमों में सम्मिलित हैं।"२ बुल्के के अनुसार ही जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण का विकृत रूप है। किसी पशु अथवा वनस्पति की पुजा के कारण उनके नामों से पुकारे जाने अथवा किसी टोटम या गोत्र के नाम पर परिचय दिये जाने की बात रामायणविरुद्ध न होकर विचारणीय हो सकती थी। शास्त्र-वचनों का उद्धरण देते हुए बताया जा चुका है कि ब्रह्मा के आदेश से विशिष्ट देवगण ही वानर, रीछ आदि रूपों में अवतीर्ण हुए थे। यही कारण है कि उनमें सामान्य ऋक्ष तथा वानरों से तो विशेषता स्पष्ट ही लक्षित होती है। साथ ही उनकी शक्ति, बल, पराक्रम, विद्या आदि तो देवताओं से भी कहीं अधिक थी। यह प्राप्त वर्णनों से अत्यन्त स्पष्ट है। जटायु, सम्पाति आदि गृध्र, गरुड़, अरुण आदि भी सामान्य पक्षियों के रूप में परिगणित नहीं किये जा सकते, क्योंकि वे विशिष्ट शक्तिशाली श्रीविष्णु एवं राम आदि परमेश्वरस्वरूपों से सम्बद्ध थे। इसी तरह शेष, वासुकि, तक्षक आदि भी साधारण सर्प नहीं थे तथापि मनुष्य भी नहीं थे; यह बात भी उनसे सम्बद्ध कथाओं से स्पष्ट हो जाती है। बुल्के लिखते हैं, "छोटा नागपुर में रहनेवाली उंराओं तथा मुण्डा जातियों में तिग्गा, हलमान, बजरङ्ग और गड़ी नामक गोत्र मिलते हैं : इन सब का अर्थ बन्दर ही है। इसी प्रकार रेड्डी, बरई, बसोर, मैना एवं खंगार आदि जातियों में बानरद्योतक गोत्र मिलते हैं। सिंहभूम की भुइयाँ जाति हनुमान् के वंशज होने का दावा करती है। वे अपने को पवन-वंश कहते हैं। ऋक्षसूचक गोत्र रेड्डी, बरई, गडबा, केवत, सुध आदि जातियों में मिलते हैं। इसी प्रकार मैना, उराओं और बिहोर जातियों में गिद्ध या गिधि गोत्र प्रचलित हैं। उराओं, असुरों, खरिया आदि आदिम जातियों की भाषा में 'रावना' शब्द का अर्थ गीध ही है। निष्कर्ष यह है कि हनुमान् की तरह ही रावण का नाम भी एक वास्तविक अनार्य नाम का संस्कृत रूपान्तर ही है। रायपुर जिले के गोड़ अपने को रावण के वंशज मानते हैं। उराओं का भी कहना है कि रावण से ही उनकी जाति उत्पन्न हुई है, अतः आदिवासियों का १. रामकथा, पृ० १२१ । २. वही, पृष्ठ १२१-१२२ ।