भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 266

अध्याय वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८९ रामकथा से सम्बन्ध अवश्य ही है। रामायण के ऋक्ष तथा वानर वास्तव में ऋक्ष, वानर तथा गीध गोत्रीय आदिवासी थे।”१ वस्तुतः पाश्चात्य विद्वानों एवं उनसे प्रभावित अन्य लोगों का उपर्युक्त विचार भ्रामक एवं अशुद्ध है। यत्र तत्र प्रचलित ऐतिह्य एवं किंवन्तियों के आधार पर वाल्मीकिरामायण जैसे आर्ष इतिहास का अपलाप नहीं किया जा सकता। पिछले प्रकरणों में स्पष्ट कर दिया गया है कि रामायण के ऋक्ष, वानर आदि यथार्थतः देवता थे। नर और वानर से भिन्न अन्य किसी के द्वारा न मारे जाने का वरदान रावण को प्राप्त था, अतः उसे मारने के लिए विभिन्न देवता ही इस रूप में प्रकट हुए थे। इन सब का वैदिक धर्म, कर्म एवं संस्कृति से सम्बन्ध था। यथार्थतः असुर, राक्षस, गिद्ध, गरुड़ एवं नाग आदि विभिन्न पत्नियों से उत्पन्न वैदिक प्रजापति कश्यप की ही सन्तानें थीं। प्रसिद्धि अथवा किंवदन्ती अन्ध-परम्परामात्र होने से प्रमाण नहीं मानी जा सकती। जैसे अश्वकर्ण नामक वृक्ष का अश्व के कानों से अथवा अश्वगन्ध नामक औषध का अश्व के गन्ध से अथवा मुसलमानों के धार्मिक पर्व रमजान से राम का कोई सम्बन्ध नहीं है, वैसे ही कहीं कहीं कुछ जातियों के गोत्र, रावन, हनुमान्, वानर, गीध आदि होने पर भी केवल नाम-साम्य के कारण ही प्रामाणिक इतिहासरूप वाल्मीकिरामायण के प्रसिद्ध वानरों, ऋक्षों, जटायु, सम्पाति आदि गिद्धों को आदिवासी मनुष्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। रामायण के अनुसार सामान्य पशु-पक्षियों से उनकी विशिष्टता सिद्ध होती है। अस्तु, यथार्थतः आर्य वैदिक ही भारत के अनादिवासी आदिवासी हैं; इनसे भिन्न आदिवासियों की चर्चा ही पाश्चात्य भेद-कारक नीति का षड्यन्त्र है। परिशिष्ट २, अनुच्छेद १११ में डा० बुल्के लिखते हैं—‘‘वैदिक साहित्य, विशेष करके अथर्ववेद में रक्षस्, राक्षस, पिशाच आदि भूतों का उल्लेख मिलता है। ये मनुष्यों के शत्रु हैं। इनके विरुद्ध अथर्ववेद में बहुत से मन्त्र दिये गये हैं। इसी तरह राक्षस एक प्रकार से अनिष्ट, अशुभ, हिंसा और पाप का प्रतीक बन गया था और बाद में रावण के क्रूर और हिंसात्मक अनुयायियों को भी यह नाम मिला। रामायण में राक्षसों का जो वर्णन किया जाता है, वह ऋग्वेद में अनार्य दस्युओं के वर्णन से बहुत कुछ मिलता है। उनके मनुष्य होने का रामायण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है (दे० वा० रा० ६।३७।३३)। कवि वास्तविक नामों से अपरिचित था। अतः जो नाम मिलते हैं वे सब वर्णनात्मक हैं....कुम्भकर्ण, मेघनाद, दशग्रीव, सुग्रीव, विभीषण, प्रहस्त (लम्बे हाथवाला) इत्यादि।”२ आगे अनुच्छेद ११२ में लिखते हैं—‘‘यह सब होते हुए भी रामायण में कवि ने अद्भुत रस तथा अतिशयोक्ति का बार-बार सहारा लिया है और इस कारण रामकथा को काल्पनिक ठहराने के लिए समालोचकों को आधार अवश्य मिलता है। रावण के दस सिर थे, हनुमान् समुद्र लाँघते हैं और आकाश में उड़कर औषधि पर्वत ले आते हैं, इस प्रकार के कथन बहुतायत से पाये जाते हैं। फिर भी रावण को केवल एक सिर था, ऐसा वर्णन भी रामायण के कई स्थलों पर मिलता है। दशग्रीव नाम पहले रूपक के रूप में प्रयुक्त हुआ होगा (दशग्रीव अर्थात जिसकी ग्रीवा दस अन्य साधारण ग्रीवाओं के समान बलवती हो) और बाद में वस्तुतः दशग्रीव धारण करनेवाले प्राणी के अर्थ में लिया जाने लगा।” अथर्ववेद में एक दशास्य (दशमुख) दशशीर्ष ब्राह्मण का उल्लेख है। इसका प्रभाव भी रावण के स्वरूप की कल्पना पर पड़ा हो, यह असम्भव नहीं कहा जा सकता है। ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः । स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम् ॥ ( अथ० सं० ४।६।१ ) हनुमान् के समुद्र लाँघने की कथा सम्भवतः किसी आश्चर्यजनक लङ्घन के आधार पर उत्पन्न हुई है। जब १. रामकथा, पृष्ठ १२२ । २. वही, पृष्ठ १२३ ।