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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 267

१९० रामायणमीमांसा षष्ठ स्पेन की सेना को मेक्सिको से हटना पड़ा तब अलवाराडो नामक सिपाही एक अत्यन्त चौड़ा नाला लांघने में समर्थ हुआ था। यह देख कर मेक्सिकोनिवासी बोल उठे "यह सचमुच सूर्य-पुत्र है।" इसी तरह हनुमान् की कथा भी¹ उत्पन्न हुई होगी, यह सी० वी० वैद्य का अनुमान है। बुल्के आदि के उपर्युक्त विचार, जिन्हें वे वैदिक साहित्य तथा वाल्मीकिरामायण से उद्धरण देकर सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, वैदिक साहित्य तथा वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध हैं। उनके विचार अटकलबाजियों पर ही आश्रित हैं। लाखों वर्ष की अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष तथा अनुमान की प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। केवल प्रमाणभूत आप्तों के वचनों एवं लेखों के आधार पर ही अतीत वस्तुओं और घटनाओं को जाना जा सकता है। जहाँ वह सब न हो, वहाँ किंवदन्तियों तथा कुछ आख्यानों के आधार पर कल्पना की जा सकती है। मिस्र के रैमसेस, या स्पेन के अलवाराडो नामक सिपाही के किसी चौड़े नाले को लांघने की बात भी तो इतिहास से ही जानी जाती है। यदि अन्य इतिहास ग्रन्थों का प्रामाण्य मान्य है तो सर्वप्राचीन वेद, उपनिषद् और उनपर आधारित समाधिजा प्रज्ञा से अनुभूत महर्षि वाल्मीकि द्वारा प्रोक्त रामायण का प्रामाण्य अमान्य क्योंकर हो सकता है ? यदि समुद्र का लङ्घन असम्भव है तो क्या चौड़े नाले का लङ्घन असम्भव नहीं हैं ? जो ईश्वर, देवता एवं उनकी विशिष्ट शक्तियों पर विश्वास नहीं करते उनके लिए तो वेद, रामायण, महाभारत, पुराण सब अविश्वसनीय ही होंगे। ऐसी स्थिति में बाइबिल एवं कुरान की चमत्कारपूर्ण बातों को भी असत्य कल्पना ही मानना पड़ेगा। वस्तुतः आज की अपनी शक्ति के अनुसार ही लाखों वर्ष पूर्व के विशिष्ट व्यक्तियों की शक्ति का अनुमान नहीं किया जा सकता। महाराणा प्रताप का डेढ़ मन का लौह-कवच आज के बड़े-बड़े पहलवान भी उठाने में समर्थ नही। क्या इसी से समझ लिया जाय कि यह ऐतिहासिक तथ्य केवल मिथ्या कल्पना है ? गुड़गाँव जिले में किसी ग्राम में किसी खुदाई में १३ गज का मनुष्य अस्थिपञ्जर मिला है। कहा जाता है कि उसके ऊपर के दाँतों में एक-एक दाँत साढ़े चार सेर का था। क्या इससे यह बात सिद्ध नहीं होती है कि पूर्व काल के लोगों की शक्तियाँ बहुत बड़ी थीं। आज कोई अखण्ड भूमण्डल का सम्राट् नहीं है तो क्या वैसा कभी कोई नहीं था, यही समझना चाहिये ? पहले लोग रामायण में वर्णित पुष्पक विमान को भी असम्भव समझते थे, परन्तु अब वैसा नहीं समझा जाता। आज भी कई बार अनेक सिरवाले लड़के उत्पन्न होते हैं और मर जाते हैं। ऐसे समाचार आये दिन समाचार- पत्रों में छपते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से तो प्रत्यक्ष और अनुमानों के समान ही आगम एक स्वतन्त्र प्रमाण है; अतः जैसे नेत्र प्रमाण से सिद्ध रूप को पुनः सिद्ध करने के लिए अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार वेदादि शास्त्रों से सिद्ध वस्तु यदि प्रत्यक्षादि से सिद्ध न हो तो भी वेदादि प्रमाण से सिद्ध होने के कारण निस्सन्देह मान्य है। अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मों से स्वर्गादि की प्राप्ति होती है यह प्रत्यक्षादि-सिद्ध नहीं है तो भी मान्य है। पिता- पुत्री, भाई-बहन की शादी से पाप होता है यह भी शास्त्र से ही सिद्ध है, इसमें अन्य प्रमाण नहीं, तब भी यह सर्वमान्य है। इसी प्रकार अनादि, अपौरुषेय वेदों द्वारा वर्णित धर्म, ईश्वर, देवता मान्य होते हैं। अतः बुल्के आदि की दृष्टि में दस सिरवाले किसी मनुष्य का होना यद्यपि असम्भव है तो भी अथर्ववेद में दस सिर, दस मुखवाले ब्राह्मण का वर्णन है ही। इस वर्णन को ही रावण का वर्णन क्यों न माना जाय ? रावण भी ब्राह्मण ही था। वेदों में तीन सिर वाले विरूपाक्ष का भी वर्णन है। केवल पाश्चात्यों की अटकल के आधार पर वेदशास्त्रों की उक्तियों को झुठलाया नहीं जा सकता। वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् का समुद्र-लङ्घन कोरी कल्पना नहीं है, सुन्दरकाण्ड के लम्बे सर्ग में इसका विशद वर्णन है। जिस पर्वत से वे उछले और जहाँ वे उतरे तथा मार्ग में सुरसा, छायाग्राहिणी, मैनाक आदि के मिलने का वर्णन कोरी कल्पना नहीं। पाश्चात्यों के समान ऋषि-महर्षि मिथ्या कल्पना नहीं करते थे, न वे मिथ्या भाषण ही करते थे। मिथ्या कल्पना को पाण्डित्यपूर्ण सैकड़ों श्लोकों में लिखने में वे अवश्य ही सङ्कुचित १. रामकथा, पृ० १२३-१२४ ।

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