रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १९१ होते । भारत में लाखों व्यक्ति वाल्मीकिरामायण विशेषतः 'सुन्दरकाण्ड' का पाठ कर अपनी-अपनी विविध कामनाओं को प्राप्त करते हैं । अथर्ववेद में ही नहीं राक्षस, असुर आदि का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि में भी है । “पिशाचेभ्यो विदलकारीं यातुधानेभ्यः कण्टकीकारीम् ।” ( यजुःसं० ३०।८ ) महीधरभाष्यम्— “विदलकारीं वंशविदारिणीं वंशपात्रकारिणीम् । कण्टकी कर्म तत्कारिणीम् ॥” यहाँ पिशाचों और यातुधानों के लिए पृथक् विधान है । ‘न तद्रक्षांसि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजमोजो ह्येतत् ।।’ ( यजुःसं० ३४।५१ ) महीधरभाष्यम्— “रक्षांसि पिशाचाश्च तत् हिरण्यं न तरन्ति न हिंसन्ति । हि यस्मादेतत् हिरण्यं देवानां प्रथममोजः । प्रथमोत्पन्नं देवानां तेज एवेदम् । राक्षस और पिशाच हिर