रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १९१ होते । भारत में लाखों व्यक्ति वाल्मीकिरामायण विशेषतः 'सुन्दरकाण्ड' का पाठ कर अपनी-अपनी विविध कामनाओं को प्राप्त करते हैं । अथर्ववेद में ही नहीं राक्षस, असुर आदि का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि में भी है । “पिशाचेभ्यो विदलकारीं यातुधानेभ्यः कण्टकीकारीम् ।” ( यजुःसं० ३०।८ ) महीधरभाष्यम्— “विदलकारीं वंशविदारिणीं वंशपात्रकारिणीम् । कण्टकी कर्म तत्कारिणीम् ॥” यहाँ पिशाचों और यातुधानों के लिए पृथक् विधान है । ‘न तद्रक्षांसि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजमोजो ह्येतत् ।।’ ( यजुःसं० ३४।५१ ) महीधरभाष्यम्— “रक्षांसि पिशाचाश्च तत् हिरण्यं न तरन्ति न हिंसन्ति । हि यस्मादेतत् हिरण्यं देवानां प्रथममोजः । प्रथमोत्पन्नं देवानां तेज एवेदम् । राक्षस और पिशाच हिर
अर्थात्, वानरों को इस युद्ध में मनुष्यरूप नहीं धारण करना चाहिये । वानर-दल में हम लोगों का यही सङ्केत रहना चाहिये । इस उक्ति से यह सिद्ध नहीं होता कि राक्षस राक्षस न होकर मनुष्य ही थे, ऐसा कदापि नहीं हो सकता । इसके विपरीत, इस उक्ति के आधार पर ही, यह सिद्ध होता है कि रामायण के वानर और राक्षसों में कामरूप होने के कारण मनुष्यादिरूप धारण करने की क्षमता थी । वहीं यह भी उल्लेख है कि “मैं (राम); लक्ष्मण, और अपने चार मन्त्रियों सहित विभीषण, ये सात मनुष्यरूप में रहेंगे । इन सातों को छोड़कर किसी भी मनुष्याकार व्यक्ति का वध करना होगा ।” “अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा । आत्मना पञ्चमश्चार्यं सखा मम विभीषणः ॥” ( वा० रा० ६।३७।३५ ) राक्षस भी मनुष्यरूप धारण कर सकते थे । रावण मनुष्यरूप धारण कर संन्यासी का रूप धारण कर ही सीता-हरणार्थ गया था । कवि (वाल्मीकि) रावण आदि के वास्तविक नाम से अपरिचित थे यह कहना भी पाश्चात्य विद्वानों का दुःसाहसमात्र है । जो महर्षि राम-रावण के समकाल के हों वह रावणादि का नाम नहीं जानते हैं इस बात को कोई भी विज्ञ व्यक्ति क्योंकर मान सकता है । जब डा० बुल्के आदि को उनका वास्तविक नाम ज्ञात नहीं तो किस तर्क के आधार पर वे कह सकते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने जिन नामों का प्रयोग किया है वे अवास्तविक हैं ? किसी इतिहासकार के सम्बन्ध में यदि कोई कहे कि वह वर्णनीय ऐतिहासिक व्यक्तियों के वास्तविक नाम नहीं जानता था पर मैं भी नहीं जानता तो उसका ऐसा कहना उन्मत्त-प्रलाप ही समझा जाता है । आश्चर्य है कि जिनको रामायण के प्रामाण्य पर विश्वास नहीं है उन्हें अन्य विषयों में उसके प्रमाणों का उद्धरण करने का क्या अधिकार है ? अतएव वेदादि शास्त्रों तथा रामायण को प्रमाण माननेवाले लोगों के लिए डा० बुल्के की 'रामकथा' सर्वथा निरर्थक ही नहीं अपितु हानिकारक भी है । रावण को एक सिर था कहते हुए बुल्के ने उसके भी प्रमाण में ५।१०।२४ का ही सङ्केत दिया है । ( निष्क्रक्राम महामुखात् )— “काञ्चनाङ्गदसन्नद्धौ ददर्श स महात्मनः । विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ ॥” ( वा० रा० ५।१०।१५ ) “तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः । दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥” ( वा० रा० ५।४२।२३ ) हनुमान् ने रावण के काञ्चन अङ्गद से सन्नद्ध अलंकृत विक्षिप्त बाहुओं को देखा जो कि इन्द्रध्वज के तुल्य थे । क्रुद्ध रावण के दोनों नेत्रों से इस तरह अश्रुबिन्दु गिरे मानो जैसे दो प्रदीप्त दीपकों से अर्चियुक्त स्नेह (तैल) बिन्दु गिरते हों । सम्भवतः उपर्युक्त कथन के अन्तर्गत दो आँखें और दो भुजाओं के वर्णन के आधार पर रावण के एक सिर होने की बात कही गयी है, परन्तु उसी सर्ग में रावण को कामरूपी कहा गया है जिससे उसमें इच्छानुरूप रूप धारण करने की सामर्थ्य कही गयी है । “वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम् ।” ( वा० रा० ५।१०।९ ) कामरूपी रावण नाना आभरणों से आवृत होकर सुन्दर रूपवाला था । अतः वैसा होने पर भी अन्यत्र वर्णित उसकी दस ग्रीवाओं का भी अपलाप नहीं किया जा सकता । रावण का केवल दशग्रीव नाम ही नहीं किन्तु उसके दस मुख एवं बीस भुजाओं का वर्णन भी है और वही उसका निजी रूप था । दण्डकारण्य में वह सीता के सामने पहले भिक्षुरूप में गया । पश्चात् उसने अपने निजी रूप को दिखाया ।
अध्याय. उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ “दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः। स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥ प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः॥” (वा० रा० ३।४९।८,९) अर्थात् अपना छद्ममय परिव्राजक रूप त्याग कर दस मुख, बीस भुजावाले अपने वास्तविक रूप को प्राप्त हो गया। यह भी उल्लेख है कि जटायु ने रावण की दस बाहुओं को काट डाला, परन्तु वरदान के प्रभाव से पुनः अन्य दस-दस बाहु उत्पन्न हो गयीं— “जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः। वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिन्दमः॥ संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाऽभवन्। विषज्वालावलीमुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥” (वा० रा० ३।५१।३८,३९) ‘संछिन्नबाहोः कर्तितबाहोः टीका रामाभिरामी।’ रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ उपर्युक्त वचनों से प्रमाणसिद्ध हैं। उनका अलाप करना या उन्हें कल्पनामात्र या रूपकमात्र कहना परम दुःसाहस है। महर्षि को मिथ्यावादी मानना और उन्हीं के काव्य का विचार करना शुद्ध अज्ञता ही है। इतना ही नहीं, त्रिशिरा नाम का एक अन्य राक्षस भी लङ्का में था। उसके तीनों सिर तीन किरीटों से ऐसे लगते थे जैसे तीन काञ्चन पर्वतों से युक्त हिमवान् शोभित हो। “त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे। हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः॥ (वा० रा० ६।६९।२४) किसी ग्रन्थ के सम्बन्ध में मूलग्रन्थ की उपेक्षा कर अपनी दुष्कल्पनाओं से किसी अंश को प्रक्षिप्त, किसी अंश को रूपक और किसी अंश को अज्ञानमूलक कहना अत्यन्त अनुचित है। इस तरह तो बाइबिल और बुल्के की रामकथा में ऐसी दुष्ट कल्पनाएँ की जा सकती हैं। अनुच्छेद ११३ में भूगोल पर विचार करते हुए बुल्के लिखते हैं कि वाल्मीकि दक्षिण तथा मध्य भारत के भूगोल से अपरिचित थे। इसका प्रमाण रामायण को पढ़कर मिलता है।” तथापि वे अपने कथन के समर्थन में रामायण के किसी प्रसङ्ग को उद्धृत नहीं करते, अतः उक्त कथन निष्प्रमाण ही है। सिंहलद्वीप एवं लङ्का भिन्न-भिन्न हैं, यह भवभूति, मुरारी तथा राजशेखर के ग्रन्थों के एवं वराहमिहिर की बृहत्संहिता के अनुसार भी सिद्ध है। बौद्ध- साहित्य में सिंहलद्वीप को लङ्का कहा गया हो तो वह प्रमाणसिद्ध नहीं। बुल्के आगे लिखते हैं कि “अधिकांश आधुनिक लेखक रामायण की लङ्का और किष्किन्धा दोनों को मध्यभारत में रखते हैं।” यह कथन भी निराधार है। मध्यभारत स्थित किसी लङ्का में जाने के लिए हनुमान् को समुद्र पार नही करना पड़ता। यदि समुद्रोलङ्घन का वर्णन ही मिथ्या है तो पाश्चात्यों की रामायण के विरुद्ध दुरभिसन्धिपूर्ण कल्पनाएँ सुतरां मिथ्या ही हैं। सुतरां ऐसी कल्पनाओं से पूर्ण मिथ्या ग्रन्थ पर विचार कर समय का अपव्यय करना भी असङ्गत ही है।
उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन
अपनी पुस्तक रामकथा के आठवें अध्याय के ११४ अनुच्छेद में रामायण के क्षेपक अथवा प्रक्षिप्त अंश को दिखाते हुए बुल्के लिखते हैं, “रामायण के प्रायः समस्त आलोचक उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं और इसके लिए भिन्न भिन्न तर्क प्रस्तुत करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण इस प्रकार हैं— २५
१९४ रामायणमीमांसा षष्ठ “वाल्मीकिकृत रामायण के तीन प्रचलित पाठों की तुलना करने से स्पष्ट होता है कि उत्तरकाण्ड की रचना अन्य काण्डों के पश्चात् हुई थी ।” बुल्के के इस तर्क का खण्डन पिछले प्रकरणों में किया जा चुका है । वस्तुतः दाक्षिणात्य, गौड़, मैथिल आदि पाठ-भेद सप्तशती में भी हैं पर वे सभी पाठ प्रामाणिक माने जाते हैं । वेदों में भी शाखा-भेद से सभी पाठ- भेद प्रामाणिक ही हैं । अतः वाल्मीकि ने काल-भेद तथा शिष्यों के भेद से कुछ पाठ-भेदों का उपदेश किया हो तो वह असम्भव नहीं कहा जा सकता । अतः रामायण में भी दाक्षिणात्य, गौड़, काश्मीर पाठ-भेद सङ्गत हो सकते हैं । अन्य काण्डों के समान उत्तरकाण्ड में पाठ-भेद न होना यह सिद्ध नहीं करता कि वह पीछे का है और प्रक्षिप्त है । संस्कृत में एक कहावत प्रचलित है कि “सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः” आरोप होने पर निमित्त की कल्पना होती है, निमित्त से आरोप की कल्पना नहीं की जाती । कभी मन्दान्धकार होने पर रज्जु में सर्प का भ्रम नहीं होता, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मन्दान्धकार से सर्पभ्रम होना ही चाहिये । जहाँ पाठ-भेद हो वहाँ निमित्त ढूँढ़ा जा सकता है; परन्तु जहाँ पाठ-भेद ही न हो उसे प्रक्षिप्त माना जाय तो जिन सर्गों में पाठ-भेद है उनको भी प्रक्षिप्त मानना पड़ेगा । बुल्के का दूसरा तर्क है कि “युद्धकाण्ड के अन्त में जो फलश्रुति मिलती है उससे यह प्रमाणित होता है कि इसके रचनाकाल तक रामायण की परिसमाप्ति यही मानी जाती थी । “रामायणमिदं कृत्स्नम्” ( वा० रा० ६।१२८।११६ ) ।” उपर्युक्त तर्क भी निस्सार है । श्रीमद्भागवत आदि में कई प्रसङ्गों में फलश्रुति है, अतः बाद के अंश को क्षेपक नहीं माना जाता । उनका तीसरा तर्क है, “बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में एक अनुक्रमणिका मिलती है जिसमें केवल अयोध्या- काण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक के विषयों का उल्लेख किया है । बाद में इस अनुक्रमणिका की अपूर्णता का अनुभव हुआ और फलस्वरूप एक दूसरी अनुक्रमणिका की रचना की गयी जिसमें बालकाण्ड की सामग्री के साथ उत्तर- काण्ड का भी निर्देश मिलता है ।” उपर्युक्त कल्पना भी भ्रान्तिमूलक है । प्रथम सर्ग अनुक्रमणिका है ही नहीं । उसके मुख्य वक्ता भी नारदजी हैं और वह मूलरामायण के नाम से प्रसिद्ध है । तत्पश्चात् ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधि द्वारा मूलरामायण प्रोक्त विषयों का साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया गया; सम्भवतः बुल्के इसी को दूसरी अनुक्रमणिका कहते हैं । परन्तु यथार्थतः यही पहली अनुक्रमणिका है । इस अनुक्रमणिका में उत्तरकाण्ड का उल्लेख है । “स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम् । अनागतं च यत्किंचिद्रामस्य वसुधातले ॥ तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषिः ॥” ( वा० रा० १।३।३८, ३९ ) “प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥ कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम् ॥” ( वा० रा० १।४।१-३ ) उपर्युक्त श्लोकों का उद्धरण देते हुए बुल्के लिखते हैं¹ “इन दो उद्धरणों से स्पष्ट है कि बालकाण्ड की इस भूमिका के रचनाकाल में उत्तरकाण्ड की सृष्टि प्रारम्भ हो चुकी थी फिर भी सीता-त्याग को छोड़कर किसी १. रामकथा, पृष्ठ १२७ ।
अध्याय उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९५ अन्य विषय का उल्लेख न होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरकाण्ड उस समय अपना वर्तमान रूप और विस्तार नहीं प्राप्त कर पाया था। इस तर्क की पुष्टि इससे भी होती है कि बाद में वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में एक तीसरी अनुक्रमणिका जोड़ी गयी है, जिसमें सातों काण्डों की सामग्री का ध्यान रखा जाता है।" यह कथन सर्वथा असङ्गत है। किसी भी ग्रन्थ का रचनाकाल उसकी भूमिका के रचनाकाल से भिन्न नहीं होता। अस्तु उत्तरकाण्ड का और सीतात्याग से अन्य विषयों का उल्लेख भी प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारत, रामायण, पुराण इन सभी ग्रन्थों में प्रसक्तानुप्रसक्त वर्णन की शैली ही होती है। वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भी इसके अपवाद नहीं हैं। उनमें भी याग का वर्णन उसकी एक-एक विधियों की प्रशंसा में अर्थवाद के रूप में कई आख्यान उपस्थित किये जाते हैं। उदीच्य-पाठ में तीसरी अनुक्रमणिका का होना 'उत्तरकाण्ड' के क्षेपक होने में प्रमाण नहीं, किन्तु उसकी प्रामाणिकता और अप्रक्षिप्तता ही सिद्ध करता है। परम्परा प्राप्त उदीच्य-पाठ भी प्रामाणिक है। पुनः बुल्के कहते हैं, "उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य प्रामाणिक काण्डों की शैली से भिन्न है। प्रारम्भिक ३३ सर्गों में रावण तथा हनुमान् की कथाओं के बाद ही रामचरित का वर्णन आगे बढ़ा दिया गया है और तब भी असङ्गत अन्तरकथाओं के कारण कथानक में कोई प्रवाह नहीं है। (दे० नृग, निमि, ययाति, श्वेत, इन्द्र, इल आदि के वृत्तान्त)। शेष सामग्री जो आधे से भी कम है रामचरित से सम्बन्ध तो रखती है लेकिन इसमें भी एकता का अभाव खटकता है। सीता-त्याग, शत्रुघ्न-चरित, शम्बूक-वध, राम का अश्वमेध, सीता का तिरोधान आदि में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त उत्तरकाण्ड में अवतारवाद की व्यापकता भी काण्ड को बाद की रचना सिद्ध करती है।" बुल्के के उपर्युक्त कथन में तर्कसङ्गति का अभाव है। वस्तुतः शैली-भेद भी प्रक्षिप्तता का प्रयोजक नहीं हैं। एक ही लेखक के ग्रन्थ में अथवा वक्ता के प्रवचन में भी विषय-भेद से रचना, शैली एवं भाषा में भेद हो जाना स्वाभाविक ही है। सुन्दरकाण्ड के श्लोकों की शैली भी अन्य काण्डों की शैली से भिन्न है—क्या इस आधार पर उसको भी क्षेपक कहा जा सकता है ? ऋग्वेद से यजुर्वेद की शैली भिन्न है—क्या इस आधार पर यजुर्वेद को वेद ही न माना जाय ? अतः उत्तरकाण्ड में नृग, निमि, ययाति, श्वेत, इन्द्र, इल, शत्रुघ्नचरित्र, शम्बूक-वध, अश्वमेध, सीता-त्याग सभी सम्बद्ध एवं अप्रक्षिप्त हैं। केवल असङ्गत कह देने मात्र से कोई ग्रन्थ असङ्गत नहीं हो जाता। वस्तुतः ग्रन्थ के अनुसार ही ग्रन्थ के सम्बन्ध में धारणा बनाना उचित है। पहले से ही एक धारणा बना कर उसके आधार पर ग्रन्थ का परीक्षण और विश्लेषण करना असङ्गत है। एक धारणा बनाकर ही पाश्चात्य भारतीय ग्रन्थों की आलोचना करते हैं। बुल्के साहब सङ्गति क्या है और कितने प्रकार की सङ्गति होती है, यह नहीं समझते हैं। स्मृति का विषय हो और उपेक्षा का अनर्ह हो यही सङ्गति का लक्षण है। 'स्मृतिविषयत्वे सत्युपेक्षानर्हत्वम् ।" यह सङ्गति भी ६ प्रकार की होती है— "सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुताऽवसरस्तथा । निर्वाहकैक्यकार्यैक्ये षोढ़ा सङ्गतिरुच्यते ॥" प्रसङ्ग, उपोद्घात, हेतुता, अवसर, निर्वाहकैक्य और कार्यैक्य, यह छः प्रकार की सङ्गति है। जहाँ घटना का वर्णन है, वहाँ तो घटना के अनुसार वर्णन करना पड़ता है। राम का दर्शन करने अनेक ऋषिगण आये, उनसे वार्तालाप के विभिन्न प्रसङ्गों में वानरों एवं राक्षसों की चर्चा छिड़ गयी। राम प्रश्न करते हैं, ऋषिगण उत्तर देते हैं—वाल्मीकि ने उसको अक्षरशः उद्धृत कर दिया। इसमें असङ्गति की कल्पना ही असङ्गत है। ईशावास्य उप-
१९६ रामायणमीमांसा षष्ठ निषद्, शुक्लयजुःसंहिता का ४०वाँ अध्याय है। उसमें पहले मन्त्र में तत्त्व-ज्ञान की बात उठायी गयी है। दूसरे में कर्मकाण्ड की बात आ गयी । पुनः तत्त्व-ज्ञान की बात आ गयी । अकस्मात् विद्या-अविद्या के समुच्चय की और सम्भूति-असम्भूति से समुच्चय की चर्चा है। क्या पाश्चात्यों की धारणा के अनुसार कर्म-काण्ड के मन्त्रों को क्षेपक मान लिया जाय ? प्रामाण्यवादी तो ग्रन्थ के अनुसार उनका तात्पर्य समझ कर सङ्गति लगाते हैं। क्षेपक या असङ्गत समझ कर वेद पर पर्य्यनुयोग नहीं किया जा सकता । “अर्थमवबोद्धुं प्रभवामः न तु पर्य्यनुयोक्तुं शक्यामः ॥” पुनः बुल्के कहते हैं१ “उत्तरकाण्ड तथा अन्य काण्डों में पारस्परिक विरोधी बातें भी मिलती हैं। उदाहरणार्थ युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में सुग्रीव, विभीषण आदि के चले जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। फिर भी उत्तरकाण्ड में पुनः इनके प्रस्थान का वर्णन किया जाता है।” उपर्युक्त कथन भी अकिञ्चित्कर है, क्योंकि युद्धकाण्ड में किये गये संक्षिप्त वर्णन का ही उत्तरकाण्ड में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें पारस्परिक विरोध की गुञ्जाइश ही नहीं। भाष्यों में तो बहुधा सूत्रानुकारी वाक्यों के द्वारा प्रथम अपने मन्तव्य को संक्षिप्त रूप में कहकर बाद में उसका विस्तार किया जाता है। महाभारत में सञ्जय युद्ध की घटनाओं को पहले संक्षेप में धृतराष्ट्र को सुना देते हैं और तदनन्तर उसका विस्तार से वर्णन करते हैं। इसी तरह यह कहना भी निस्सार है कि उत्तरकाण्ड में प्राप्त वेदवती २ का वृत्तान्त यदि प्रक्षिप्त न होता तो इसका उल्लेख रामायण के अन्य काण्डों में जहाँ सीता के जन्म-प्रसङ्ग का वर्णन हुआ है वहाँ अवश्य किया जाता, क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि जो वर्णन किसी एक काण्ड में हो वह अन्य काण्डों में भी अवश्यम्भावी है। उदाहरणार्थ, वेदों में सम्भूति एवं असम्भूति का वर्णन केवल शुक्लयजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के अन्त में ही है अन्यत्र नहीं। क्या इस आधार पर वह क्षेपक माना जा सकता है ? वेद की एक शाखा में पञ्चाग्नि विद्या में ६ अग्नियों का उल्लेख है पर अन्य शाखा में ५ ही अग्नियों का उल्लेख है, अतः यह कहा जा सकता है कि यदि यह अंश प्रक्षिप्त न होता तो अन्य शाखा में जहाँ पञ्चाग्नि विद्या का वर्णन है वहाँ भी ६ अग्नियों का ही उल्लेख होना चाहिये था ? यह सब असङ्गत कथन है। ब्रह्मसूत्रों में ऐसी सब शाखाओं के पाठों का समन्वय कर ही उपासना के स्वरूप का निर्धारण किया गया है। इसी हेतु गुणोपसंहारानुपसंहार का विचार किया जाता है। यदि निश्चित हो जाय कि दोनों शाखाओं के कर्म या उपासना एक ही हैं तो एक शाखा में अनुक्त गुण का भी दूसरी शाखा में उक्त होने से, सङ्ग्रह कर लिया जाता है। भारत- प्रसिद्ध हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, व्यवहारमयूख आदि सभी निबन्ध ग्रन्थों में यत्र-तत्र स्थित वचनों का भी मीमांसा-दृष्टि से समन्वय कर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है। पुनः बुल्के कहते हैं- "वाल्मीकिकृत रामायण के इन अन्तरङ्ग प्रमाणों के अतिरिक्त एक बात और ध्यान देने योग्य है। महाभारत का रामोपाख्यान रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है। इसके प्रारम्भ में रावण- चरित की कुछ सामग्री अवश्य मिलती है, किन्तु वह आदिरामायण की तरह रामाभिषेक तथा रामराज्य की स्तुति पर समाप्त होता है। आदिरामायण तथा रामोपाख्यान के कारण एक परम्परा चल पड़ी और शताब्दियों तक चलती रही, जिसके अनुसार रामचरित का वर्णन उनके अभिषेक पर समाप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ-रावणवह, भट्टिकाव्य, कुमारदास-कृत जानकीहरण, अभिनन्दन-कृत रामचरित, भासकृत अभिषेकनाटक, मुरारि का अनर्घ-राघव, राजशेखर का बालरामायण, कम्बन्कृत प्राचीनतम तमिलरामायण, तेलगु द्विपदरामायण तथा जावा का रामायण ककविन । ३" १. रामकथा, पृष्ठ १२७ । २. वही पृष्ठ १२७ । ३. वही, पृ० १२८, अनु० (६) ।
अध्याय उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९७ उपर्युक्त कथन भी निःसार है । अधिकांशतः मङ्गलान्त या सुखान्त काव्यों को ही लोग अधिक पसन्द करते हैं । विशेषतः नाटकों में उसका बहुत ध्यान रखा जाता है। यही कारण है कि रामाभिषेक अथवा राम-राज्य- स्तुति जैसे महान् माङ्गलिक स्थलों पर ग्रन्थ की समाप्ति की गयी है । परन्तु महर्षि वाल्मीकि को तो अपने काव्य के नायक का साङ्गोपाङ्ग सम्पूर्ण जीवनचरित्र देना वाञ्छित था; उनका ग्रन्थ रामकथा का आदिकाव्य, मूल ग्रन्थ है । मूल ग्रन्थ में साङ्गोपाङ्ग सम्पूर्ण चरित्र का उल्लेख अनिवार्य है। अन्य ग्रन्थों में इसके आधार पर यथेष्ट सामग्री लेकर उसका उपयोग किया गया है। निश्चय ही बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों में से किसी एक के बिना सीता और राम का चरित्र-चित्रण अधूरा ही रह जाता । बुल्के के मतानुसार ये दोनों ही काण्ड अस्वाभाविक हैं। उनकी यह मान्यता केवल भ्रम ही है। वैसे, एक तरह से वह भी पूर्वकाण्ड की समाप्ति युद्धकाण्ड में ही करते हैं, परन्तु, चरित्र-पूर्ति के लिये उत्तरकाण्ड का निर्माण करना अनिवार्य ही था; इतर लोगों ने उनके पूर्वकाण्ड का ही अनुकरण किया था और दुःखान्त होने के कारण उत्तर- काण्ड की उपेक्षा की । प्रक्षिप्त सामग्री का उल्लेख करते हुए बुल्के लिखते हैं, "पुत्रेष्टियज्ञ (सर्ग १५-१८); इसमें विष्णु का अवतार लेना विस्तार से वर्णित है। ये सर्ग बालकाण्ड में प्रक्षिप्त माने जाने चाहिये ।'”१ "आठवें अध्याय में समस्त बालकाण्ड के प्रक्षिप्त माने जाने के कारण दिये गये हैं; अतः बहुत सम्भव है कि वाल्मीकिकृत रचना में अयोध्या, दशरथ तथा उनके पुत्रों के परिचय के बाद अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का वर्णन प्रारम्भ हुआ हो ।" २ परन्तु बुल्के को यह भी बताना चाहिये कि जब अयोध्याकाण्ड में अयोध्या तथा दशरथ और उनके पुत्रों के परिचय का उल्लेख नहीं है और जिस बालकाण्ड में उन विषयों का उल्लेख है उस समस्त बालकाण्ड को वे प्रक्षिप्त कहते हैं तब क्या अकस्मात् 'गच्छता मातुलकुलम्' अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग से रामायण का आरम्भ होना सङ्गत है ? क्या यह बुल्के की दृष्टि से ही उनके द्वारा समस्त बालकाण्ड को प्रक्षिप्त मान लेने को गलत सिद्ध नहीं करता ? बुल्के कहते हैं कि "महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के प्राचीन वृत्तान्तों में भी वनवास से ही लेकर रावण-वध तक की रामकथा का वर्णन किया गया है, "३ परन्तु महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि में भी कुछ न कुछ भूमिका के साथ ही वनवास का वर्णन है। और महाभारत के रामोपाख्यान में तो वाल्मीकि रामायण का अनुसरण है ही । आगे बुल्के पुनः लिखते हैं, "दो स्थलों को छोड़कर बालकाण्ड में और कहीं भी अवतारवाद की ओर निर्देश नहीं किया गया है। यही नहीं, वरन् उसकी शेष सामग्री से भी स्पष्ट है कि मूल बालकाण्ड के रचना-काल में राम विष्णु के अवतार नहीं माने जाते थे । अतः ये दोनों स्थल (अर्थात् दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ तथा राम, परशुराम भेंट का वर्णन) बालकाण्ड के अन्तिम विकास के समय जोड़ दिये गये होंगे । पुत्रेष्टियज्ञ के प्रक्षिप्त होने के स्पष्ट प्रमाण बालकाण्ड में मिलते हैं। सर्ग ८ में दशरथ सुतार्थ अश्वमेघ यज्ञ करवाने का सङ्कल्प करते हैं। सर्ग १३ और १४ में अश्वमेघ यज्ञ का वर्णन किया गया है। १४ वें सर्ग में ब्राह्मणों को दक्षिणा दिये जाने के उल्लेख के बाद ऋष्यशृङ्ग दशरथ को आश्वासन देते हैं कि उनके चार पुत्र उत्पन्न होंगे । “भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः ॥ ५९ ॥” ऋष्यशृङ्ग के इस आश्वासन के पश्चात् पुत्रेष्टि की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती है। फिर भी इसके १. रामकथा, पृ० १२९, अनु० ११८ । २. वही, पृ० २८९; अनु० ३३३ । ३. वही, अनु० ३३३ ।
१९८ रामायणमीमांसा षष्ठ अनन्तर पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन प्रारम्भ होता है। यह होते हुए भी १८ वें सर्ग के प्रारम्भ में अश्वमेध ही की समाप्ति पर— “निवृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे ।” देवताओं तथा राजाओं के प्रस्थान का उल्लेख किया गया है। जिसमें स्पष्ट है कि पहले १४ वें सर्ग के पश्चात् १८ वाँ सर्ग ही आता था ।१” वस्तुतः बुल्के का उपर्युक्त कथन या तो श्लोकों के अर्थ के अज्ञानमूलक है अथवा दुरभिसन्धिमूलक, क्योंकि यहाँ जानबूझकर प्रसङ्ग को छिपाने का प्रयास किया है, ऋष्यशृङ्ग ने ब्राह्मणों को दक्षिणा दिये जाने के बाद ही चार पुत्रों के होने का आश्वासन नहीं दिया, किन्तु दक्षिणा देने के अनन्तर राजा दशरथ ने ऋष्यशृङ्ग से पुनः प्रार्थना की कि कुलवर्धन (सन्तानोत्पत्ति) का जो उपायभूत कर्म है उसे कीजिये । तब ऋष्यशृङ्ग ने 'तथास्तु' कहते हुए कुल- वर्धन चार पुत्र होने का आश्वासन दिया। “ततोऽब्रवीदृष्यशृङ्गं राजा दशरथस्तदा । कुलस्य वर्धनं तत्तु कर्तुमर्हसि सुव्रत ॥ तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः । भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः ॥” (वा० रा० १।१४।५८,६०) वहीं टीकाकार नागेशभट्ट कहते हैं, “यद्यपि पुत्रकामेष्ट्यैव पुत्रप्राप्तिः सम्भवति तथापि तपोरतस्य वैश्यस्य श्रवणस्य वधेन तद्वियोगातुरतपोरततन्मातृपितृमरणेन च ब्रह्मवधसमपापोत्पत्त्या तत्प्रायश्चित्तत्वेनाश्वमेधा- नुष्ठानं बोध्यम्” अर्थात् यद्यपि पुत्रप्राप्ति तो पुत्रेष्टि से ही संभव थी तथापि तपोनिष्ठ वैश्यजातीय श्रवण का वध होने पर उसके वियोग से सन्तप्त तपोनिष्ठ उसके माता-पिता के मरने से ब्रह्मवध के समान पाप उत्पन्न हो गया था उसके प्रायश्चित्तरूप से पहले अश्वमेध का अनुष्ठान किया गया । अतः यहाँ अश्वमेध परम्परा से हो पत्रोत्पत्ति का कारण बना पुत्रोत्पत्ति का वेदोक्त उपाय पुत्रेष्टि ही है। कुल-वर्धन कर्म करने की प्रार्थना को 'तथेति' (तथास्तु) शब्द से स्वीकार करके ऋष्यशृङ्ग ने उसके द्वारा ही चार पुत्र होने का आश्वासन दिया था। १५ और १६ वें सर्ग में पुत्रेष्टियज्ञ और विष्णु के अवतार ग्रहण का आश्वासन वर्णित है । १७वें सर्ग में विष्णु के सहायतार्थ देवताओं के भी अवतार की कथा कही गयी है और १८वें सर्ग में प्रधानावतार रामावतार की कथा कही है। “निवृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः । प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम् ,।” (वा० रा० १।१८।१) नागेश के अनुसार पुत्रेष्टियुते हयमेधे निर्वृत्ते इति शेषः अर्थात् पुत्रेष्टियुक्त हयमेध के समाप्त होने पर देवता लोग अपना भाग लेकर जैसे आये थे वैसे ही चले गये । इस तरह १८वें सर्ग की पूर्ण सङ्गति लग जाती है। वेदों में ही ब्रह्मवधादि के प्रायश्चित्त के लिए अश्वमेध विहित है, अतः पुत्र-प्राप्ति में प्रतिबन्धक पाप की निवृत्ति के लिए अश्वमेध किया गया । पुत्र-प्राप्ति के लिए वेदों में पुत्रेष्टि का अनुष्ठान विहित है, अतः दशरथ ने ऋष्यशृङ्ग से कुल-वर्धन कर्म करने की प्रार्थना की । यहाँ कुल-वर्धन कर्म का तात्पर्य पुत्रेष्टियज्ञ में ही है। मुनि ने 'तथेति' (तथास्तु) कहते हुए स्वीकार किया और चार पुत्र होने का आश्वासन दिया । यदि दशरथ द्वारा की गयी प्रार्थना के पूर्व ही ऋष्यशृङ्ग
१. रामकथा, पृ० २८९-२९०, अनु० ३३३ ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ द्वारा आश्वासन दिया गया होता तो निश्चय ही पुत्रेष्टियज्ञ की अपेक्षा न होती। पर बुल्के की तो केवल बातों को तोड़मरोड़कर धोखा देना ही आता है। राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन “अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् । न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति ॥ त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः ॥” (वा० रा० १।७६।१७,१९) श्रीराम से परशुराम ने कहा : “आप आदि और अन्त रहित अविनाशी मधुहन्ता (मधुसूदन) हैं, सुरेश्वर हैं, ऐसा मैं जानता हूँ। आप से पराजित होना मेरे लिए कोई लज्जा की बात नहीं है।” उक्त श्लोक यद्यपि तीनों ही पाठों में प्राप्त हैं तथापि बुल्के इन्हें प्रक्षिप्त ही मानते हैं। और कहते हैं कि बालकाण्ड के रचना-काल में राम अवतार नहीं माने जाते थे इसका बालकाण्ड में ही स्पष्ट प्रमाण है। इतने पर भी कोई प्रमाण उपस्थित करने में समर्थ नहीं हुए। उनके द्वारा उपस्थापित प्रमाण भी प्रमाणाभास ही हैं, जैसा कि पीछे स्पष्ट किया गया है। बुल्के लिखते हैं, राम का उत्कर्ष प्रथम सर्ग का वर्ण्य विषय है। फिर भी उसमें उनके अवतार होने का उल्लेख नहीं है; केवल विष्णु से उनकी तुलना की जाती है। (विष्णुना सदृशो वीर्ये’ श्लोक १८) और अन्त में कहा जाता है कि राम अपना राज्य भोगकर ब्रह्मलोक जायेंगे— “रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।” (वा० रा० १।१।९७) यदि कवि राम को विष्णु का अवतार मानता होता तो उनकी इहलीला समाप्त होने पर उनके ब्रह्मलोक जाने का उल्लेख नहीं करता। इस तर्क की सङ्गति इससे स्पष्ट है कि उदीच्य पाठ में ब्रह्मलोक के स्थान में ‘विष्णु- लोक’ रखा गया है।”१ बुल्के का यह तर्क भी उनका भारतीय-शास्त्रों के अज्ञान के ही कारण है। श्रीराम रावणवध के लिए नररूप में अवतीर्ण हुए, क्योंकि स्पष्ट विष्णुरूप से प्रकट होने पर ब्रह्मा के वरदान के अनुसार रावण को मार नहीं सकते थे, अतः श्रीराम विष्णु होते हुए भी व्यवहारतः विष्णु से भिन्न रूप में थे। इसलिए उन्हें विष्णु के तुल्य कहा गया है। बुल्के की ब्रह्मलोकसम्बन्धी शङ्का भी निर्मूल है; क्योंकि वहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द से चतुर्मुखी ब्रह्मा न होकर सगुण ‘ब्रह्म’ ही अर्थ है। सम्पूर्ण उपनिषदों में तथा ब्रह्मसूत्र में ब्रह्मलोक शब्द का वही अर्थ ग्राह्य है। यथातो ब्रह्मजिज्ञासा (ब्र० सू० १।१।२); ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः (ब्र० सू० ४।४।५); अतएव टीकाकार नागेश ने भी ब्रह्मलोकं मायिकवैकुण्ठादिलोकम् अर्थ किया है। बुल्के पुनः लिखते हैं विश्वामित्र ताड़का के वध करने का अनुरोध कर विष्णु द्वारा भृगु-पत्नी के वध का उदाहरण देते हैं— “विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता । अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता ॥” (वा० रा० १।२५।२१ तथा सिद्धाश्रम के विषय में कहते हैं कि विष्णु ने वहाँ तप किया— १. रामकथा, पृ० १३० ।
“इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः । वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च ॥ तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहत्तपाः ॥” (वा० रा० १।२९।२, ३) इससे स्पष्ट है कि विश्वामित्र राम के अवतार होने से अनभिज्ञ हैं। १ उक्त कथन भी असङ्गत है। व्यावहारिक भिन्नता ही विश्वामित्र के कथन का आधार है। जैसे नाटक में नट जब जिस रूप को धारण करता है तब उसी रूप से वह व्यवहार करता है। उसके वास्तविक रूप से व्यवहार प्रायेण नहीं होता। इसी तरह उस समय श्रीराम विश्वामित्र के शिष्यरूप से ही उनके साथ थे, विष्णुरूप से नहीं, अतः शिष्यवत् व्यवहार ही उचित था। गूढ़रूप से विश्वामित्र ने उसी प्रसङ्ग में श्रीराम को विष्णु सूचित किया ही है— “अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम् । तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम ॥” (वा० रा० १।२९।२४) हे राम ! हम लोग सिद्धाश्रम में जा रहे हैं; वह आश्रम जैसा मेरा है वैसा ही आप का भी है। क्योंकि आप विष्णुरूप हैं। “अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ॥” (वा० रा० १।१९।१४, १५) विश्वामित्र कहते हैं सत्यपराक्रम राम को मैं जानता हूँ; महातेजा वसिष्ठ तथा अन्य भी तपोनिष्ठ राम को जानते हैं। तात्पर्य यह कि राम साक्षात् परब्रह्म हैं। उन्हें वसिष्ठ और तपोनिष्ठ लोग जानते हैं। सर्व- साधारण नहीं। अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग के ७ वें श्लोक को भी बुल्के प्रक्षिप्त मानते हैं— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) दृप्त रावण के वधार्थी देवताओं की प्रार्थना से सनातन विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए। यद्यपि यह श्लोक भी तीनों ही पाठों में मिलता है। बुल्के के ऐसे कथन का कारण स्पष्ट है। वे लोग रामायण के आधार पर रामायणीय तत्त्वों का विचार नहीं करते। उन्होंने अपनी यह धारणा बना ली है कि राम परब्रह्म नहीं हैं, क्योंकि रामायण में ऐसा उल्लेख नहीं है। अतः रामायण में राम के अवतार होने के जो प्रमाण मिलते हैं उनको वे प्रक्षेप कहने लगते हैं। परन्तु यह तर्कविरुद्ध है। इस तरह से तो किसी भी ग्रन्थ की मुख्य से मुख्य बातों को भी प्रक्षेप कह कर झुठलाया जा सकता है। बुल्के आदि का कहना है कि “अयोध्याकाण्ड में अन्यत्र भी कहीं राम के अवतार होने का निर्देशमात्र भी नहीं है, अतः उपर्युक्त श्लोक प्रक्षिप्त है।” यहाँ प्रश्न होता है कि यदि अन्यत्र भी कहीं इस आशय के निर्देश मिलते तो क्या बुल्के उनको भी प्रक्षेप नहीं कह देते ? अरण्यकाण्ड में राम के पराक्रम का वर्णन करते हुए अकम्पन कहते हैं कि राम समस्त लोकों का नाश करके सबकी पुनः सृष्टि करने में समर्थ हैं— “संहृत्य वा पुनर्लोकान्विक्रमेण महायशाः । शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥” (वा० रा० ३।३१।२६) १. रामकथा, पृष्ठ १३० ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०१ बुल्के इस श्लोक को भी प्रक्षिप्त कहते हैं, परन्तु कोई स्पष्ट कारण नहीं दे पाते । सिर्फ पाठभेद की ही चर्चा करते हैं। इसी तरह निम्नाङ्कित श्लोकों को भी वे प्रक्षिप्त ही मानते हैं । “दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम् ।” ( वा० रा० ३।६६।१९ ) “दिव्यं त्वं मानुषं चास्त्रमात्मनश्च पराक्रमम् ।” ( गौ० रा० २।७१।१६ ) निम्नाङ्कित श्लोक गौडीय पाठ में नहीं मिलता अतः उसको भी प्रक्षेप मानते हैं। वस्तुतः इन श्लोकों से भी राम का अवतार होना सिद्ध होता है । “नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै । नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः ॥” ( वा० रा० ५।१३।५७ ) बुल्के द्वारा प्रस्तुत तर्क स्वयं ही अपना खण्डन करते हैं। कोई श्लोक गौडीय पश्चिमोत्तरीय पाठ में न होने के कारण क्षेपक है, परन्तु अन्य कुछ श्लोक जो अवतारबोधक हैं और तीनों पाठों में मिलते हैं, वे भी क्या क्षेपक ही हो सकते हैं । स्पष्ट ही उनके लिए किसी श्लोक का किसी पाठ में होने न होने का प्रश्न अकिञ्चित्कर ही है । इसी तरह उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप मानने का उन्होंने यह हेतु दिया है कि उसकी कथाओं का उल्लेख अन्य प्रामाणिक काण्डों में नहीं मिलता । तदनन्तर बालकाण्ड को प्रक्षिप्त कह कर पांच काण्डों को प्रामाणिक कहा, फिर उन काण्डों के श्लोकों को भी बिना किसी प्रमाण प्रक्षेप कहने लगे । “लङ्घनं च समुद्रस्य दर्शनं च हनूमतः । वधं च रक्षसां युद्धे कः कुर्यान्मानुषो युधि ॥” ( वा० रा० ६।३४।२२ ) “गरुडाधिष्ठितावेतावुभौ राघवक्ष्मणौ ॥” ( वा० रा० ६।५०।२२ ) वस्तुतः अयोध्याकाण्ड में भी बहुत से श्लोक ऐसे हैं जो राम को परब्रह्म ईश्वर सिद्ध करते हैं जैसे— “यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥” ( वा० रा० २।१७।१४ ) जो राम को नहीं देख पाता और राम जिसको नहीं देखते वह सब लोकों में निन्दित है । उसका आत्मा ( अन्तःकरण ) भी उसकी निन्दा करता है । यह श्लोक भी अवतार का सूचक है। ईश्वर ही के न जानने से प्राणी की अकृतार्थता और निन्द्यता सिद्ध होती है । “लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः । ( वा० रा० २।३७।३२ ) लोक में ऐसा कोई नहीं जो राम का अनुव्रत न हो, क्योंकि राम ही प्राण के प्राण और जीव के जीवन हैं, अतः प्राणिमात्र के परम प्रेमास्पद हैं । जाने बिना जाने राम के आस्तिक-नास्तिक सभी भक्त हैं । जब प्रत्येक प्राणी प्राण, सुख और जीवन का आदर करता है तो जो प्राण का प्राण, सुख का सुख तथा जीव का जीवन हैं उसमें अनुरक्ति होनी ही चाहिए । जैसे नित्य दाहकत्ववाले अग्नि के संसर्ग से ही लौह आदि में भी अनित्य दाहकत्व आदि होता है वैसे ही शब्दादि के नित्य प्रकाश सामर्थ्यवाले ब्रह्म के सम्बन्ध से ही प्राण, श्रोत्र, नेत्र, आदि में अपने-अपने विषय को प्रकाशित करने की क्षमता आती है। इसी दृष्टि से कहा गया है— “लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ।”
२०२ रामायणमीमांसा षष्ठ सुमित्रा भी कहती है—( अयोध्याकाण्ड में ही, जिसे बुल्के क्षेपक नहीं मानते । ) "सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभो प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा-क्षमा ॥ देवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः । तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे ॥ (वा० रा० २।४४।१५,१६) अर्थात् राम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि, श्री के भी श्री, कीर्ति के कीर्ति; क्षमा के क्षमा और देवताओं के देवता हैं । सभी भूतों में जो अबाधित सर्वोत्कृष्ट सत्ता है वही राम हैं । अस्तु, अयोध्याकाण्ड के ये श्लोक भी श्रीराम की परब्रह्मता के ही बोधक हैं। इनको क्षेपक कहने का साहस बुल्के भी न कर सके, अतः या तो उन्होंने जानबूझकर इनसे आँखें चुरा लीं, अथवा उनके तात्पर्य से अपरिचित रहे या इनपर उनका ध्यान गया ही नहीं । श्रीबुल्के लिखते हैं, "मन्दोदरी-विलाप तीनों पाठों में मिलता है। दाक्षिणात्य पाठ में इसका विस्तार १२५ श्लोकों में है, गौडीय पाठ में ८२ श्लोकों में तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में केवल ६३ श्लोकों में है। तीनों में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है । लेकिन दाक्षिणात्य पाठ के जिन श्लोकों में इसका उल्लेख हुआ है वे अन्य पाठों के अवतार-सम्बन्धी श्लोक दाक्षिणात्य पाठों में नहीं पाये जाते । उदाहरणार्थ— गौडीय पाठ "अथवा रामरूपेण विष्णुश्च स्वयमागतः । तव नाशाय मायाभिः प्रविश्यानुपलक्षितः ।" ( वा० रा० ६।१११।९ ) दाक्षिणात्य पाठ "अथवा रामरूपेण कृतान्तः स्वयमागतः । मायां तव विनाशाय विधायाप्रतर्किताम् ॥" ( वा० रा० ६।१११।९ ) इससे यह ध्वनि निकलती है कि स्वतन्त्र रूप से तीनों पाठों में अवतारवादी सामग्री बाद में आ गयी है ।" उपर्युक्त वचनों के क्षेपक होने में कोई हेतु नहीं दिया गया है। जब मन्दोदरी-विलाप को क्षेपक नहीं कहने का कारण उनका तीनों पाठों में प्राप्त होना है तब तीनों पाठों में प्राप्त अवतार-सामग्री ही बाद में स्वतन्तरूप से आ गयी यह कैसे कहा जा सकता है ? अतः बुल्के का यह कथन भी निराधार ही है। बुल्के लिखते हैं, अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं । इस सर्ग के प्रक्षेप होने में कोई सन्देह नहीं है इसमें सीता और लक्ष्मी की अभिन्नता का भी उल्लेख है । दाक्षिणात्य पाठ में दशरथ राम से कहते हैं कि वह पुरुषोत्तम ही हैं— "इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः । वधार्थं रावणस्येह पिहितं पुरुषोत्तमम् ॥ ( वा० रा० ६।११९।१७ गौडीय पाठ में इस श्लोक में अवतार का उल्लेख नहीं है । "इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः । वधाय रावणस्येह वनवासाय दीक्षितः । वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥” ( वा० रा० ६।११७।२८)
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०३ । इन सब के प्रक्षेप होने का कारण बतलाया गया है कि गौडीय पाठ में अवतार का उल्लेख नहीं है। उसमें ‘वनवासाय दीक्षितः’ शब्द है। परन्तु विचारणीय यह है कि कहीं गौडीय पाठ विरुद्ध होने से दाक्षिणात्य पाठ को ही अप्रामाणिक और कहीं दाक्षिणात्य पाठ विरुद्ध होने से गौडीय पाठ को ही अप्रामाणिक कहा जा रहा है तथापि उसका कोई स्पष्ट हेतु नहीं दिया जाता। इसके अतिरिक्त क्या बुल्के को यह मान्य है कि— (१) मरने के पश्चात् भी दशरथ राम से मिलने लङ्का आये ? (२) क्या दशरथ का यह कथन कि देवताओं के कारण ही राम को वनवास हुआ मान्य है ? (३) क्या ये सब बातें अस्वाभाविक नहीं हैं ? फिर जिस गौडीय पाठ में वे अवतार का उल्लेख नहीं है, ऐसा मानते हैं उसमें भी तो ‘प्रविष्टो मानुषीं तनुम्’ यह स्पष्ट अवतार वाद सिद्ध हो ही रहा है। वे पुनः लिखते हैं “इसके बाद दशरथ लक्ष्मण को भी सम्बोधित करके राम को पुरुषोत्तम, अक्षर ब्रह्म आदि मानते हैं यह अंश तीनों पाठों में मिलता है, लेकिन वह राम-दशरथसंवाद का अनुकरण प्रतीत होता है ।” बाह रे बुल्के, जब खण्डन का वश न चला तो अनुकरण मात्र कह चले । बुल्के के कथनानुसार उपर्युक्त अंश तीनों पाठों में मिलता है तथापि उसको भी ‘अनुकरणमात्र’ कहते हुए क्षेपकमात्र कह दिया गया है। स्पष्ट हैं कि उनके द्वारा उठायी गयी पाठ-विशेष की चर्चा व्यर्थ है, क्योंकि वे स्वयं किसी एक सिद्धान्त को आधार बना कर उसपर स्थिर नहीं रह पाये हैं । आधारभूत तर्कों द्वारा नहीं, अपितु येन केन प्रकारेण अवतारबोधक वचनों को प्रक्षिप्त सिद्ध करने का प्रयास किया गया है । अग्नि-परीक्षा के समय ब्रह्मा आदि देवता आकर राम की विष्णुरूप से स्तुति करते हैं। अन्य भी अनेक श्लोक अवतारवाद के बोधक हैं, जिनका बुल्के ने स्पर्श भी नहीं किया है । रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाभिव वासवः ॥” ( वा० रा० ३।३७।१३ ) “अप्रमेयं हि तत्तोजो यस्य सा जनकात्मजा । न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥” ( वा० रा० ३।३७।१८ ) “कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम् । अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण ॥” ( वा० रा० ३।६४।५४ ) “त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालकर्मणा ॥” ( वा० रा० ३।६४।६४ ) “नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकैः ॥” ( वा० रा० ३।६४।७१ ) “त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च । अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्षः ॥” ( वा० रा० ४।२४।३१ ) राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः । रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥” ( वा० रा० ४।५२।४ ) इत्यादि वचन भी राम की ईश्वरता का बोधन करते हैं । किष्किन्धाकाण्ड में भी उपर्युक्त श्लोकों द्वारा राम की अप्रमेयता और सर्वलोक-शासकत्वरूप ईश्वरत्व कहा गया है ।
२. द्वितीय काण्ड: अयोध्या एवं अरण्यकाण्ड: पितृ-आज्ञा, वनगमन व शूर्पणखा प्रसंग
२०४ रामायणमीमांसा षष्ठ ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ (वा० रा० ५।५१।१०४) क्या किसी मनुष्य में इतनी शक्ति है कि उसके सामने युद्ध में ब्रह्मा; इन्द्र तथा रुद्र भी खड़े नहीं रह सकते हों ? राम स्वयं कहते हैं कि यदि इच्छा करूँ तो अंगुली के अग्रभाग से ही पृथ्वी के सम्पूर्ण पिशाच, दानव तथा राक्षसों को मार सकता हूँ। क्या किसी जीव में ऐसी शक्ति हो सकती है ? “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ (वा० रा० ५।१८।३३ ) अर्थात् जो एक बार भी मेरी शरणागति स्वीकार करता है और मैं तुम्हारा हूँ ऐसी प्रार्थना करता है उसे मैं सभी भूतों से अभय प्रदान करता हूँ । क्या सर्वभूतों से अभय प्रदान करने की शक्ति ईश्वर से अतिरिक्त किसी जीव में भी सम्भव हो सकती है ? “विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं देहमास्थितम् ।” ( वा० रा० ६।३५।३६ ) उक्त वचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना कहा जा सकता है । अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।” ( वा० रा० ६।५०।४६ ) राम से गरुड़ कहते हैं, मैं तुम्हारा प्राणतुल्य सखा हूँ। इससे भी राम विष्णु हैं यह सिद्ध होता है । “विष्णोरमीभांस्यभागमात्मानं प्रत्यनुस्मरन् ।” ( वा० रा० ६।५९।११० ) लक्ष्मण ने अपना विष्णु के अंशरूप से स्मरण किया । मन्दोदरी विलाप करती हुई अनेक श्लोकों से राम का अमानव तथा परमेश्वर होना कहती है । “यदैव वानरैर्घोरैर्बद्धः सेतुर्महार्णवे । तदैव हृदयेनाहं शङ्के रामो न मानुषः ॥” अर्थात् जब घोर वानरों ने महार्णव में सेतु बाँध लिया तभी मेरे दिल में शङ्का हो गयी थी कि राम मनुष्य नहीं हैं । वह यह भी कहती हैं कि राम सनातन परमात्मा हैं, अनादि, अनन्त, महान् से भी महान् हैं । तम से परे, शङ्ख-चक्रधारी, श्रीवत्सवक्षा शाश्वत विष्णु हैं— “व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् ॥ तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः । श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः ॥ मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः । सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ॥ सर्वलोकेश्वरः श्रीमाँल्लोकानां हितकाम्यया ॥” ( वा० रा० ६।१११।११-१४ ) ऐसे अनेक उदाहरण रामायण के राम-प्रकरण में पाये जाते हैं । इतना ही नहीं, मन्दोदरी सीता को भी वसुधा की वसुधा और श्री की भी श्री कहती है ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०५ "सीतां धर्षयता मान्यां त्वया ह्यसदृशं कृतम्। वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भर्तृवत्सलाम् ॥" (वा० रा० ६।११३।२१) तदनन्तर इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण आदि देवताओं के साथ साक्षात् लोकपिता ब्रह्मा ने स्पष्टरूप से राम को परमात्मा, अक्षर, नारायण, पुरुषोत्तम, कर्ता आदि सम्बोधनों से सम्बोधित किया है। यह भी सभी रामायणों के राम-प्रकरण में विस्तार से प्राप्त होता है । बुल्के उपर्युक्त सभी श्लोकों को प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। वे अनुच्छेद १२३ के ( ५ ) में लिखते हैं; "अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं।¹ इस सर्ग के प्रक्षेप होने में कोई सन्देह नहीं है। (दे० आगे अनु० ५६५) इसमें सीता और लक्ष्मी की अभिन्नता का भी उल्लेख है।" परन्तु उनका यह कथन निःसार है, कारण वाल्मीकिरामायण के सभी पाठ प्रामाणिक हैं। पाठ-भेद या समानान्तर में किसी श्लोक का न होना प्रक्षिप्त होने में कारण नहीं कहा जा सकता, ऐसे विभिन्न पाठों के श्लोक समानान्तर में न होने पर भी प्रक्षिप्त नहीं हैं। आश्चर्य तो यह है कि बुल्के पहले युद्धकाण्ड को प्रामाणिक मानते हैं, किन्तु उसमें भी राम के परमात्मा होने के सर्ग और श्लोक मिलते हैं तो वे इन सर्गों और श्लोकों को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं । वाल्मीकिरामायण से श्लोक उद्धृत कर मैंने भी यह बताया ही है कि मन्दोदरी ने सीता को श्री की भी श्री कहा है । पुनः बुल्के लिखते हैं, "सीता की अग्निपरीक्षा के प्रक्षिप्त होने में कम सन्देह है। इस प्रसङ्ग में सीता के प्रति राम के प्रेम में जो सहसा परिवर्तन दिखाया गया है, वह अप्रत्याशित ही नहीं सर्वथा अस्वाभाविक भी है। सीताहरण के बाद राम के विरह का बहुत से सर्गों में वर्णन किया गया है। युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम स्वयं कहते हैं कि मेरा विरहजनित शोक दिनों-दिन बढ़ता जाता है— "शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति । मम चापश्यतः कान्तामह्न्यहनि वर्धते ॥" लङ्कावरोध के बाद भी सीता के लिए राम की अभिलाषा का उल्लेख किया गया है "जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा ।” (वा० रा० ५।४२।७ ) इन्द्रजित् द्वारा माया सीता के वध का समाचार सुनकर राम मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े— "तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूर्च्छितः । निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥” (वा० रा० ५।८३।१०) इससे स्पष्ट है कि सीता के प्रति राम का प्रेम अपरिवर्तित बना हुआ था, किन्तु यह सब होते हुए भी रावणवध के पश्चात् राम सीता को देख कर उनसे कहते हैं कि मैं अपने शत्रु के अपमान का प्रतीकार कर चुका हूँ। मुझे तुम्हारे प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, अथवा विभीषण किसी को भी पति के रूप में चुन सकती हो। मुझे तुम्हारे चरित्र पर सन्देह है। अग्निपरीक्षा के बाद राम अवश्य स्वीकार करते हैं कि मैंने तो तुम पर सन्देह नहीं किया, किन्तु जनता की दृष्टि से तुम्हारे इस शुद्धिकरण की आवश्यकता थी। इस प्रकार का दिखावा समस्त मूल वाल्मीकिरामायण की भावधारा के विरुद्ध है और अवतारवाद स्वीकार होने के पश्चात् ही ऐसा सम्भव था। परवर्ती साहित्य में इसपर बारम्बार बल दिया जाता है कि राम को वास्तविक दुःख नहीं है। वह केवल मनुष्य-चरित्र करते हैं। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि इस प्रसङ्ग में राम तथा सीता दोनों के अवतार १. दे० वा० रा० सर्ग ११७ तथा अन्य पाठों के समानान्तर स्थल ।
२०६ रामायणमीमांसा षष्ठ होने का उल्लेख है। ब्रह्मा आदि देवता प्रकट होकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं तथा सीता को लक्ष्मी से अभिन्न मानते हैं (वा० रा० ६।११९।२७) । यह वाल्मीकिरामायण का एकमात्र स्थल है जहाँ सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। उपर्युक्त तर्क के अतिरिक्त भी यह ध्यान देने योग्य बात है कि युद्धकाण्ड के बाद दो बार समस्त रामकथा का सिंहावलोकन प्रस्तुत किया गया है (सर्ग १२४ और १२६), किन्तु इसमें अग्निपरीक्षा का उल्लेख नहीं होता। बालकाण्ड के प्रारम्भ की दोनों अनुक्रमणिकाओं (सर्ग १ और सर्ग ३) का प्रामाणिक संस्करण अग्निपरीक्षा के विषय में कुछ नहीं कहता। दो स्थलों पर राम सीता की निर्दोषता के प्रमाण का उल्लेख करते हैं। प्रथम बार सीता- त्याग के समय वह केवल देवताओं के साक्ष्य की चर्चा करते हैं। दूसरी बार वे वाल्मीकि से कहते हैं मैंने लङ्कानिवास के बाद सीता को तभी ग्रहण किया जब उन्होंने अपने सतीत्व की शपथ की थी। यदि उस सर्ग के रचनाकाल में अग्निपरीक्षा का वृत्तान्त प्रचलित होता तो यहाँ पर राम द्वारा अवश्य ही सीता के सतीत्व के सब से महत्त्वपूर्ण प्रमाण का उल्लेख हुआ होता। अतः यह मानना पड़ेगा कि उत्तरकाण्ड की आधिकारिक कथावस्तु के लिपिबद्ध होने के पश्चात् ही अग्निपरीक्षा विषयक प्रक्षेप युद्धकाण्ड का अंश बन गया है। महाभारत के रामोपाख्यान से भी हमारे निर्णय की पुष्टि होती है। रामायण के इस प्राचीनतम संक्षेप में भी कहीं भी अग्निपरीक्षा का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। अग्निपरीक्षा के बाद दो सर्ग (११९ और १२०) भी अनावश्यक हैं और प्रायः प्रक्षिप्त माने जाते हैं। इनमें शिव राम की स्तुति करते हैं, दशरथ दिखायी देते हैं तथा इन्द्र राम का निवेदन स्वीकार कर मृत वानर सैनिकों को जीवित कर देते हैं।१” बुल्के के उक्त शब्दाडम्बर का सार इतना ही है कि राम का सीता में बहुत प्रेम था। अकस्मात् उसमें परिवर्तन कैसे हो सकता था ? युद्धकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा बालकाण्ड के संक्षिप्त वृत्तान्तों में अग्निपरीक्षा की चर्चा नहीं है, अतः अग्निपरीक्षा प्रक्षिप्त है। किन्तु बुल्के भारतीय परम्पराओं एवं संस्कारों से अपरिचित हैं। अतः उनके लिए यह असम्भव प्रतीत होता है कि राम और सीता, विष्णु और लक्ष्मी थे। वे देवताओं का कार्य करने आये थे। यह सर्वथा प्रमाणसिद्ध उन प्रमाणों को बुल्के धूलि-प्रक्षेपमात्र से झुठलाना चाहते हैं। भारतीय धर्म-शास्त्रों की दृष्टि से स्त्री-रक्षा एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पहलू है। स्त्री-रक्षा से ही कुल, गोत्र आदि की रक्षा होती है; इसलिए धर्मशास्त्र कहते हैं— “स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च। स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥” (मनु० ९।७ ) तथा पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥” (मनु० ९।३ ) अर्थात् बाल्यकाल में पिता, यौवनकाल में पति, वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में स्त्री को रहना चाहिये; वह कदापि पूर्ण स्वतन्त्र होकर न रहे। स्त्री की पवित्रता पर ही कुल और गोत्र की पवित्रता निर्भर होती है। माता के सदाचारिणी होने पर ही व्यक्ति निश्चयपूर्वक अपने कुल-गोत्र का परिचय दे सकता है। माता का आचरण सन्दिग्ध होने पर उसकी सन्तान का कुल-गोत्र भी सन्दिग्ध ही होगा। इस दृष्टि से, भारतीय सभ्यता के अनुसार, स्त्री पिता, पति एवं पुत्र आदि संरक्षकों के बिना स्वतन्त्ररूप से नहीं रह सकती। पाश्चात्य देशों में ऐसी परम्परा १. रामकथा, पृष्ठ ५३३, ५३४ (अनु० ५६५) ।
नहीं है । कोई स्त्री किसी के साथ हाथ मिला सकती है, किसी के साथ नाच सकती है अथवा घूमने जा सकती है । भारतीय सभ्यता इसके विपरीत है । तदनुसार यह सब निन्द्य एवं त्याज्य है । इसी दृष्टि से उत्तरकाण्ड में कुछ पौरों ने भी सीता के सम्बन्ध में शङ्काएँ उठायीं थीं । राम यद्यपि सीता के प्रति अत्यन्त प्रेम रखते थे, तो भी उनका प्रेम अन्धप्रेम नहीं था । वे मर्यादापुरुषोत्तम थे, अतः प्रेम में मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं कर सकते थे । आधुनिक इङ्गलैण्ड की राजकुमारी मार्गरेट ने भी अपने बाइबिल तथा कुल की मर्यादा की रक्षा हेतु प्रेम ठुकराया था । परम प्रिय सीता के हरण पर उनका शोक, विलाप, मूर्च्छा आदि सब उचित ही था । सीता के अन्वेषण और प्राप्ति के लिए समुद्र में सेतु-बन्धन, सैन्य-सङ्ग्रह तथा भीषण युद्ध आदि भी पूर्णतः उचित ही था; परन्तु इन सब के सम्पूर्ण होने पर जब सीता उपस्थित हुईं तो मर्यादा का भी प्रश्न स्वतः उत्थित हुआ । जो प्रश्न अयोध्या के पौरों के सामने था वही प्रश्न राम के सामने भी उठना अत्यन्त स्वाभाविक था । फिर भी राम को सीता के सतीत्व के प्रति पूर्ण विश्वास था और साथ ही यह भी विश्वास था कि सीता शपथ और प्रत्यय देकर अपने सतीत्व को प्रमाणित करेगी । इसी लिए प्रेम रहने पर भी परिस्थिति और लोकमर्यादा को ध्यान में रखते हुए राम ने प्रत्यय देने की दृष्टि से ही सीता के प्रति परुष (कठोर) भाषण किया । उस समय अपने मन में उठते भावों को राम ने इस तरह व्यक्त किया है। भद्रे ! मैंने पौरुष से रणाङ्गण में शत्रु को जीतकर, शत्रु के हाथ से तुम्हें जीतकर लौटा लिया । पौरुष यत्न से जो करना चाहिये वह किया । इस तरह अमर्ष का अन्त कर अपने अभिभव का मार्जन किया है । अवमान और शत्रु दोनों को युगपत् नष्ट कर दिया है । आज मेरे पौरुष को लोगों ने देख लिया । मेरा श्रम सफल हो गया । रावण-वध की प्रतिज्ञा को पूर्ण कर अब मैं उससे मुक्त हो गया । दुष्ट-चित्त रावण ने मेरे न रहने पर तुम्हारा हरण किया था, यह दैवकृत दोष था । मैंने मनुष्य-साध्य प्रयत्न से उसे मिटा दिया । जो इस तरह प्राप्त अवमान का अपने तेज से मार्जन नहीं करता उस अल्पचेता के महान् पौरुष से भी क्या अर्थ ? समुद्र-लङ्घन, लङ्का-मर्दन आदि हनुमान् का श्लाघ्य कर्म भी आज सफल हुआ । युद्ध में विक्रम और मेरे हित की मन्त्रणा करनेवाले सैन्य सहित सुग्रीव का भी परिश्रम आज सफल हो गया; जो अपने दुष्ट भ्राता रावण को त्याग कर मेरे पास आये, उन विभीषण का भी परिश्रम सफल हो गया । राम के ऐसे वचनों को सुन कर सीता उनके दर्शन से प्रसन्न होकर मृगी के तुल्य उत्फुल्लनयन हुईं और परुष वचन सुन कर अश्रुपरिप्लुत हो खिन्न हुईं । वानरों और राक्षसों के बीच में राम ने पुनः कहा—"धर्षणा का मार्जन करते हुए मनुष्य को जो करना चाहिये, मान की आकाङ्क्षा से रावण को मारकर मैंने वह किया । तप से भावितात्मा अगस्त्य ने जैसे इल्वल, वातापी आदि राक्षसों के भय से जीवलोक के लिए दुराधर्ष दक्षिणा दिक् को जीत लिया, वैसा ही, रावण के भय से जीवमात्र के लिए दुराधर्ष तुम (सीता) को मैंने प्रत्याहृत किया । तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि सुहृदों के पराक्रम से जैसे मैंने यह श्रम किया है वह तुम्हारे लिए नहीं, किन्तु सर्वतः प्रख्यात अपने वंश के वृत्त की रक्षा और अपवाद तथा न्यग्भाव कलङ्क का मार्जन करने के लिए किया । तुम्हारे चरित्र में सन्देह प्राप्त है । तुम हमारे सम्मुख स्थित होकर नेत्ररोगी को दीपशिखा के समान प्रतिकूल प्रतीत हो रही हो । मैं तुम्हें अनुज्ञा देता हूँ, ये दशों दिशाएँ तुम्हारे लिए पड़ी हैं । जहाँ चाहो जाओ । मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं । भला कौन कुलीन तेजस्वी पुमान् सुहृद् के लोभ से युक्त चित्त से परगृहोषित स्त्री को ग्रहण कर सकता है ? रावण के अङ्ग से परिक्लिष्ट और उसकी दुष्ट दृष्टि से दृष्ट होने के कारण अपने महान् कुल का ध्यान रखते हुए मैं तुम्हें पुनः कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? जिसके लिए मैंने रावण को मारकर तुम्हारा प्रत्याहरण किया वह सब सम्पन्न हो गया । तुम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव या विभीषण किसी भी मेरे सम्बन्धी के पास रह सकती हो, अथवा जहाँ भी तुम्हें सुख हो, अपने माता-पिता के पास रह सकती हो । यहाँ बुल्के ने “पतिरूप से चुन सकती हो” जैसे शब्द लिखकर अपनी कलुषित भावनाओं का ही परिचय दिया है, क्योंकि इस अर्थ के द्योतक कोई शब्द उक्त प्रसङ्ग में कहीं प्राप्त नहीं होते ।
मनोरमा तथा दिव्य रूपवाली विशेषतः अपने गृह में पर्यवस्थित तुम्हें देखकर रावण अधिक काल तक सहन नहीं कर सकता था। कालान्तर में अवध के कुछ पौरों ने भी लगभग राम के कथन के सदृश शब्दों में ही वैसी शङ्का उप- स्थित की थी । यह सब भारतीय धर्म तथा संस्कृति के अनुसार स्वाभाविक ही था। श्रीसीता ने अग्नि-प्रवेशरूप दिव्य प्रत्यय देकर इन सभी आरोपों एवं अपवादों का समूल उन्मूलन कर अपने अखण्ड अनन्त दिव्य पातिव्रत्य तेज को प्रकट कर दिया। यही भारतीय नारी का आदर्श है। साक्षात् अग्नि ने तथा सब देवताओं ने सीता की शुद्धता का साक्ष्य दिया। तब राम ने सीता को ग्रहण किया। भारतीय प्रेम और मर्यादा के समन्वय का यही सुन्दर आदर्श है। पाश्चात्य संस्कारों के कारण बुल्के के लिए यह सब अस्वाभाविक एवं असम्भव प्रतीत होता है। यथार्थतः यह सब दिखावा नहीं अपितु वस्तुस्थिति थी। राम को सीता के सतीत्व पर पूर्ण विश्वास होने से ही राम ने उन राक्षसों और वानरों के सम्मुख ही सीता से यह सब कहा । इस कथन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि जनता में कोई लोकापवाद न हो । सीता के चरित्र पर कहीं किसी को कोई शङ्का न हो। “मनसा, वाचा, कर्मणा, बुद्ध्या, चक्षुषा किसी तरह भी सीता ने तुम्हारा अतिक्रमण नहीं किया यह अत्यन्त निष्पापा और विशुद्धभावा है।” लोकसाक्षी पावक के यह कहने पर राम ने कहा यद्यपि सीता पवित्र है फिर भी लोक में इसकी पवित्रता व्यक्त होनी चाहिये, क्योंकि वह दीर्घकाल तक रावण की लङ्का में रही है। यदि मैं बिना विशुद्धि किये उसको ग्रहण करता तो लोक यही कहता कि दशरथात्मज राम बालिश एवं कामात्मा थे, इसलिए परगृहोषिता सीता की विशुद्धि किये बिना ही उसको ग्रहण कर लिया (सर्ग ११५-११८) अतः सीता शुद्धि नितरां अपेक्षित थी। मूलरामायण में जिसको बुल्के पहली अनुक्रमणिका कहते हैं, अग्निपरीक्षा का स्पष्ट वर्णन है। “तेन गत्वा पुरीं • लङ्कां हत्वा रावणमाहवे । रामः सीतामनुप्राप्य परा व्रीडामुपागमत् ॥ तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि । अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥ ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् । कर्मणा तेन महता त्रैलोक्ये सचराचरम् ॥ सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः । बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः ॥” ( वा० रा० १।१।८१-८४ ) अर्थात् सेतु के द्वारा लङ्का जाकर, रावण को मारकर एवं सीता को प्राप्त कर सीता के रावणगृह-निवास के कारण राम व्रीड़ा ( लज्जा ) को प्राप्त हुए और जन-संसद् में ही सीता के प्रति परुष वचन बोले । उन्हें अमृष्य- माणा ( सहन न कर ) सीता ने अग्नि में प्रवेश किया। पुनश्च अग्नि-वचन से सीता को विगतकल्मषा जान कर राम संप्रहृष्ट हुए। उस अग्नि-प्रवेश से देवर्षिगण सहित सचराचर त्रैलोक्य राम पर परितुष्ट हुआ। सब देवताओं से पूजित राम सम्यक् प्रसन्न हुए। प्रस्तुत संस्करण को प्रामाणिक न मानना भी निराधार है। १८५२ शक, १९३० ई० में यह निर्णय सागर में प्रकाशित हुआ है। इसपर अत्यन्त प्रामाणिक रामाभिरामी टीका है। प्रसिद्ध शब्देन्दुशेखरकार नागेशभट्ट ने अपने शिष्य राम के नाम से इस टीका का निर्माण किया है। संक्षिप्त वर्णन में कितनी ही बातें छूट जाती हैं। अतः कहा नहीं कहा जा सकता कि किसी एक वर्णन में सभी कथाएँ अनिवार्य अपेक्षित हैं। फिर भी अग्नि परीक्षा का तो स्पष्ट उल्लेख है ही जिससे बुल्के कितना झूठ बोलते हैं यह भी साफ हो जाता है।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०९ महाभारत में यद्यपि सीता का अग्नि-प्रवेश नहीं कहा गया है, परन्तु सीता के चरित्र पर राम का सन्देह करना वाल्मीकिरामायण के समान ही कहा गया है। सीता का दुःखित होकर मूर्च्छित होना कहा गया है। वायु, अग्नि, वरुण आदि देवताओं तथा ब्रह्मा का स्वयं आकर सीता को शुद्ध बताना कहा गया है। तब जाकर राम द्वारा सीता को स्वीकार किया जाना आदि कथाएँ दी गयी हैं। नागोजीभट्ट ने रामाभिरामी टीका में कहा है कि शास्त्रों के समन्वय की दृष्टि से महाभारत में अनुक्त होने पर भी सीता का अग्नि-प्रवेश मध्य में समझ लेना चाहिये, क्योंकि ‘रामचरित्र’ में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है। इतर शास्त्रीय वचनों को उसी के अनुसार ही लगाना चाहिये । अतएव पद्मपुराण में भी कहा गया है— ‘सा तेन गर्हिता साध्वी विविशे ज्वलनं सती ।’ राम के द्वारा गर्हित होने से सीता अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। उत्तरकाण्ड इस सम्बन्ध में मौन है बुल्के का ऐसा कहना भी अशुद्ध है। उत्तरकाण्ड के (४५वें सर्ग) में कहा गया है— ‘‘जानासि त्वं यथा सौम्य दण्डके विजने वने । रावणेन हृता सीता स च विध्वंसितो मया ॥ तत्र मे बुद्धिरुत्पन्ना जनकस्य सुतां प्रति । अशोषितामिमां सीतामानयेयं कथं पुरीम् ॥ प्रत्ययार्थं ततः सीता विवेश ज्वलनं तदा । प्रत्यक्षं तव सौमित्रे देवानां हव्यवाहनः ॥ अपापां मैथिलीमाह वायुश्चाकाशगोचरः । चन्द्रादित्यौ च शंसेते सुराणां संनिधौ पुरा ॥ ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् । एवं शुद्धसमाचारा देवगन्धर्वसंनिधौ ॥ लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता । अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् ॥’’ (वा० रा ७।४५।५-१०) अर्थात् राम ने लक्ष्मण से कहा, सौमित्रे ! तुम जानते ही हो जिस तरह विजन वन में रावण ने जानकी का हरण किया और मैंने रावण का वध किया। वहाँ जनकजा के प्रति मेरे मन में बुद्धि उत्पन्न हुई कि लङ्का में दीर्घकाल पर्यन्त रहने के कारण मैं सीता को अयोध्या कैसे ले जा सकता हूँ। तब सीता ने प्रत्ययार्थ देवताओं के सन्निधान में अग्नि में प्रवेश किया। तुम्हारे समक्ष ही अग्नि ने सीता को पवित्र कहा, आकाशगोचर वायु तथा चन्द्र, आदित्य आदि ने देवताओं एवं ऋषियों के समक्ष सीता को निष्पाप कहा। वाल्मीकि के समक्ष भी राम ने कहा था— ‘‘प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसंनिधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥’’ ( वा० रा० ७।९७।३ ) अर्थात् देवताओं के सन्निधान में पहले भी जानकी ने प्रत्यय दिया था और शपथ किया था तभी महलों में सीता लायी गयी थीं। बुल्के भी सीता द्वारा शपथ लिये जाने का उल्लेख करते हैं। वस्तुतः यह शपथ भी बुल्के द्वारा उद्धृत “सच्चकिरियम्” (सच्चक्रिया, ८६ अनु०) के समान थी जो कि अग्निप्रवेशरूप ही थी। महाभारत में रामोपाख्यान संक्षिप्त रूप से प्राप्त है, अतः उसमें अग्निपरीक्षा ही नहीं अन्य भी अनेक चरित्रों का अभाव हो सकता २७
२१० रामायणमीमांसा षष्ठ है। यदि रामायण की सारी बातों का उल्लेख हो तो फिर संक्षिप्तता ही कैसे हो ? इसी तरह अग्निपरीक्षा के बाद के सर्गों को प्रक्षिप्त कहना भी निस्सार है। फिर भी उसमें अग्नि द्वारा सीता का पवित्र होना कहा ही गया है। उसे बुल्के अग्निपरीक्षा का उपलक्षण क्यों नहीं मानते ? श्रीराम का विष्णु का अवतार होना बुल्के को मान्य नहीं। उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड से भिन्न बीच के पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक कहते हैं। उनके द्वारा प्रामाणिक मान्य ‘युद्धकाण्ड’ में विस्तार से राम के परब्रह्म, अक्षरब्रह्म होने का प्रमाण मिलता है। तब उनके पास सिवा प्रक्षिप्त कहने के कोई चारा नहीं रह गया। वस्तुतस्तु कोई भी घटना एवं तद्विषयक इतिहास किसी की बुद्धि या इच्छा पर निर्भर नहीं। घटनासम्बन्धी इतिहास के आधार पर घटना का निर्णय करना उचित है। घटना औचित्य-अनौचित्य का भी अनुसरण नहीं करती। अन्याय तथा अत्याचार सम्बन्धी घटना अनुचित होने पर भी घटती ही है। अतः बुल्के या अन्य सभी को प्रामाणिक आर्ष इतिहास रामायण के आधार पर ही रामकथासम्बन्धी घटनाओं को मानना चाहिये। उन्हें अपनी बुद्धि के अनुसार घटनाओं के भाव तथा अभाव कहने का कोई अधिकार नहीं है। राम का सीता में प्रेम है, इसी लिए राम सीता के प्रति शङ्का नहीं कर सकते एवं परुष वचन नहीं बोल सकते, यह कल्पना सर्वथा गलत है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार नारी का परगृह-निवास विशेष मर्यादातिक्रमण अत्यन्त शङ्कनीय तथा लोकापवाद का कारण होता है। इस दृष्टि से राम का सीता में अत्यन्त प्रेम होने पर भी सीता की शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है। इसी दृष्टि से राम का परुष वचनों का प्रयोग और सीता का अग्निप्रवेश अत्यन्त स्वाभाविक है। कल्पनाएँ तो अनेक प्रकार की हो सकती हैं। परन्तु वस्तुस्थिति इतिहास के अनुसार ही जानी जाती है। कल्पनाओं के आधार पर घटना का ज्ञान असम्भव है। अध्यात्मरामायण, पद्मपुराण तथा रघुवंश आदि ग्रन्थों में सीता की अग्निपरीक्षा का विशद वर्णन है। 'नागपाश' का वृत्तान्त भी क्षेपक नहीं है; हाँ पाठों में कुछ भेद हो सकता है। कुम्भकर्ण ने नारदवर्णित विष्णु के अवतार द्वारा रावणवध का रहस्य बतलाया है, यह ठीक ही है। प्रामाणिक पाठ-भेद उपेक्ष्य नहीं है। उनकी उपपत्ति हो सकती है; यह अन्यत्र वर्णित है। उत्तरकाण्ड में ८-१७ आदि अनेक सर्गों में राम का अवतार होने का उल्लेख भी ठीक ही है। बुल्के कहते हैं—"प्रामाणिक काण्डों के अवतारवाद की सामग्री जो तीनों पाठों में मिलती है नही के बराबर है और जो सामग्री तीनों पाठों में मिलती है वह एक ऐसे अंश में पायी जाती है जो स्पष्टतया प्रक्षिप्त है।" बुल्के के उक्त विचारों का पूर्व में पूर्णतया खण्डन किया जा चुका है। अपनी भावना के अनुसार प्रक्षेप का वर्णन करना अत्यन्त असङ्गत है। बुल्के ने बारम्बार कई लोगों के समक्ष अपने को गोस्वामी तुलसीदास का अनन्य भक्त कहा है। तुलसीदास ने राम को परब्रह्म का अवतार माना है। अग्नि-परीक्षा का भी उल्लेख किया है। क्या गोस्वामी तुलसीदास के परम भक्त बुल्के के लिए तुलसीदास की उक्ति के विरुद्ध ऐसा अनर्गल प्रलाप उचित हो सकता था ? अनु० १२३ में वे लिखते हैं, "रामायण के प्रधान पात्र राम के अवतार होने से परिचित नहीं हैं। इस तर्क के विरुद्ध सम्भवतः कहा जा सकता है कि यह आवश्यक नहीं कि वे राम को अवतार समझें। फिर भी उत्तर- कालीन रामकाव्य में प्रायः सब पात्र राम को अवतार मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि इस तर्क में कुछ तत्त्व है।"१ बुल्के का उपर्युक्त तर्क तर्क न होकर तर्काभास ही है। करुण-रस-प्रधान वाल्मीकि के आदिकाव्य में ऐश्वर्य- प्रधान कथाओं का विस्तार अभीष्ट नहीं था। रावण-वध के पूर्व ही राम के देवेश्वरत्व एवं वानर तथा भालुओं के देवत्व की प्रख्याति रावण-वध में बाधक हो सकती थी, क्योंकि ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव से देव या देवेश्वर द्वारा १. रामकथा, पृष्ठ १३५।१ ।