रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह यद्यपि एक ही है तो भी कार्यभेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं । उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु एवं संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं । इस दृष्टि से प्रजापति, ईश्वर या महाविराट् त्रिमूति होता है । त्रिमूर्ति में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है । स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के साथ आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया । पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के समन्वित निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथब्राह्मण आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए । महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि महाभारत का प्रजापति वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही हैं। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि श्लोक का अर्थ यों है—'मैं सृष्टिकर्ता प्रजा- पति ब्रह्म हूँ मुझसे पर ( उत्कृष्ट ) कोई भी प्रमाण ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं की रक्षा की थी।' विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है । जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा' अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया । पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही गयी है । अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं । पाश्चात्य विज्ञ कहते हैं कि विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने से प्रजापति के अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे । पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है । किसी की इच्छा या भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है । विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण तथा महाभारत में विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी है । अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और सिद्ध करना असम्भव ही है । महा- भारत तथा हरिवंश में पाश्चात्य तथा तदनुयायियों ने भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना है । वस्तुतः हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध-स्मृतियों, पुराणों और आगमों का समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है, वैसे ही अवतारों और राम-कथाओं के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । जब महाभारत, हरिवंश तथा विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्य आदि अवतारों तथा राम और कृष्ण को विष्णु के अवतार कहा हो जा रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ? पाश्चात्य तथा तदनुयायी कहते हैं "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते हैं । वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण, तैत्तिरीयब्राह्मण एवं ऐतरेयब्राह्मण में हुआ है । यह अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता है और शतपथब्राह्मण, महाभारत के नारायणीयोपाख्यान तथा हरिवंशपुराण में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है । नृसिंहावतार की कथा पहले पहल तैत्तिरीय आरण्यक के परिशिष्ट में मिलती है । नारायणीयोपाख्यान तथा हरिवंशपुराण में इसका उल्लेख है । परशुराम विष्णु के अवतार का प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है । उदाहरणार्थ ( म० भा० ३।११५।११७ ) किन्तु नारायणीय उपाख्यान ( म० भा० १२।३२६।७७ ), हरिवंश ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।६।१४१ ) में उनको विष्णु का अवतार माना गया है ।" वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है । निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं होती । अतः पाश्चात्य विद्वानों का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान है, किन्तु उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का