भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( २६ ) भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी, अधोदृष्टि तथा प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा—हे अग्निदेव ! मैंने राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं किया है, यह सत्य है तो माधवी, धरित्री देवी, मुझे अवकाश प्रदान करें। इस तरह सीता शपथ कर ही रही थी कि एक अत्यन्त अद्भुत चमत्कार हुआ। भूतल से एक अत्यन्त उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमितविक्रमवाले दिव्यरत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा था। धारणी देवी ने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन करके अपनी बाहुओं में ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाया। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जयजयकार तथा साधुवाद के साथ अविच्छिन्नरूप से दिव्य पुष्पवृष्टि हुई। "सीते ! साधु, साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है" इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियाँ प्रकट हुईं। यज्ञवाट के सभी मुनि तथा नृपतिगण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष एवं भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर कोई प्रहृष्ट होकर 'जय-जय' एवं 'साधु-साधु' नाद करने लगे। कोई ध्यानपरायण हो गये और कोई राम एवं सीता को देखते हुए, निश्चेष्ट से हो गये। सीता के रसातल-प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए। श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए। ब्रह्माजी ने देवताओं के साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करते हुए श्रीराम को सान्त्वना प्रदान की। अवतारवाद के सम्बन्ध में पाश्चात्यों की भ्रान्तियों का उन्मूलन शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा—"मेरी रक्षा करो, मैं प्रजासहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।" मनु ने कहा—"कैसे तुम्हारी रक्षा हो ?" मत्स्य ने कहा—"जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य को निगल जाता है, अतः कुम्भ में रखकर मेरा पालन करो।" मनु ने कुम्भ में मत्स्य को रखा जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा—"बड़ा सरोवर बनाकर उसमें मुझे रखो।" मनुजी ने वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा—"अब मुझे समुद्र में डाल दो।" तब मनु ने उसे समुद्र में डाल दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा—"अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की रचना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।" मत्स्य के कथनानुसार महाघ आया। मनु ने पृथ्वा को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव बांध दी। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरिराज हिमालय में पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—"मैंने तुम्हें पार कर दिया। नाव को वृक्ष में बाँध दो।" यह मत्स्यावतार का वर्णन है।" कूर्मावतार का वर्णन—देवताओं की प्रार्थना से कूर्मराज ने अपने पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्र-मन्थन किया था। इसी प्रकार महाभारत में परशुराम, राम, बलराम आदि अवतारों का वर्णन है। “जन्माद्यस्य यतः” (ब्र० सू० १।१।२) इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये। इसी लिए "आकाशस्तल्लिङ्गात्” (ब्र० सू० १।१।२२) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति अभिन्न ही तत्त्व हैं। अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है। दक्षादि प्रजा- पति अवान्तर प्रजापति हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्म ही है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु है।

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