रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५ ) इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध आचरणवाले विश्वासपात्र दूतों को बुलाकर राम ने उनसे कहा "भगवान् वाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्ध आचरणवाली हैं, पापरहिता हैं, तो मुनि की अनुमति से अपनी आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें, यदि मुनि की इच्छा हो तथा सीता प्रत्यय-विश्वास देना चाहती हों तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ । कल प्रातःकाल जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें ।" उन दूतों ने जाकर अमितप्रभ महर्षि वाल्मीकि से राम का संदेश कहा । मुनि ने सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है, राम जैसा कहते हैं वैसा ही होगा । सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम देवता पति ही है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया । राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों एवं राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण) देखें । महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ । प्रभावशाली नृपतिगण तथा मुनि श्रेष्ठगण राघव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे । इसी काण्ड के ९६वें सर्ग के अनुसार रात बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, काबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि मुनिवरों को बुलवाया । महावीर्य राक्षस तथा महाबलो वानर तथा अन्य सभी लोग कौतूहल वश आये, सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण पतिव्रता का शपथ देखने के लिये आये । सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये । ऋषि के पीछे-पीछे राम का मन में ध्यान करती हुई अवाङ्मुखी, कृताञ्जलि, वाष्पकलायुक्त सीता आयी । ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे आती हुई सीता को देखकर जनसमूह में महान् साधुवाद हुआ । सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाली विशाल दुःखपरम्परा का चिन्तन कर सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे । कोई राम का एवं कोई सीता का साधुवाद करने लगे । कोई दर्शक दोनों का साधुवाद करने लगे । उस समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिये हुए वाल्मीकि ने कहा—'दाशरथे ! सीता सव्रता एवं धर्मचारिणी है। अपवादभय से आप के द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही । सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण प्रत्यय देगी । ये दोनों बालक कुश और लव जानकी से ही उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं । मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ । मैं कभी अनृत वाक्य का स्मरण नहीं करता । बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है। यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्विष नहीं हुआ । यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्त शुद्धआचरणवाली एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है । यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता आपके समक्ष प्रत्यय देगी । सर्ग ९८ में उल्लेख है, राम ने कहा—ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है । देवताओं के समक्ष जानकी ने पहले भी लङ्का में शपथ दिया है तो भी लोकापवाद-भय से, मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए भी उसका त्याग किया था । ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ । सीताशपथ के प्रसङ्ग में मेरा आशय जानकर ही सभी देवगण आये हैं । लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण तथा साध्य देव एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण ओर सिद्धगण भी आये हुए हैं । राघव ने सबको देख देखकर कहा—ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय है और संसार में परमपवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है । उस समय दिव्य शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा । सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया । काषायवासिनी सीता ने चतुर्दश-