रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( २५ ) इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध आचरणवाले विश्वासपात्र दूतों को बुलाकर राम ने उनसे कहा "भगवान् वाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्ध आचरणवाली हैं, पापरहिता हैं, तो मुनि की अनुमति से अपनी आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें, यदि मुनि की इच्छा हो तथा सीता प्रत्यय-विश्वास देना चाहती हों तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ । कल प्रातःकाल जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें ।" उन दूतों ने जाकर अमितप्रभ महर्षि वाल्मीकि से राम का संदेश कहा । मुनि ने सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है, राम जैसा कहते हैं वैसा ही होगा । सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम देवता पति ही है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया । राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों एवं राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण) देखें । महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ । प्रभावशाली नृपतिगण तथा मुनि श्रेष्ठगण राघव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे । इसी काण्ड के ९६वें सर्ग के अनुसार रात बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, काबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि मुनिवरों को बुलवाया । महावीर्य राक्षस तथा महाबलो वानर तथा अन्य सभी लोग कौतूहल वश आये, सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण पतिव्रता का शपथ देखने के लिये आये । सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये । ऋषि के पीछे-पीछे राम का मन में ध्यान करती हुई अवाङ्मुखी, कृताञ्जलि, वाष्पकलायुक्त सीता आयी । ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे आती हुई सीता को देखकर जनसमूह में महान् साधुवाद हुआ । सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाली विशाल दुःखपरम्परा का चिन्तन कर सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे । कोई राम का एवं कोई सीता का साधुवाद करने लगे । कोई दर्शक दोनों का साधुवाद करने लगे । उस समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिये हुए वाल्मीकि ने कहा—'दाशरथे ! सीता सव्रता एवं धर्मचारिणी है। अपवादभय से आप के द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही । सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण प्रत्यय देगी । ये दोनों बालक कुश और लव जानकी से ही उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं । मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ । मैं कभी अनृत वाक्य का स्मरण नहीं करता । बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है। यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्विष नहीं हुआ । यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्त शुद्धआचरणवाली एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है । यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता आपके समक्ष प्रत्यय देगी । सर्ग ९८ में उल्लेख है, राम ने कहा—ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है । देवताओं के समक्ष जानकी ने पहले भी लङ्का में शपथ दिया है तो भी लोकापवाद-भय से, मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए भी उसका त्याग किया था । ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ । सीताशपथ के प्रसङ्ग में मेरा आशय जानकर ही सभी देवगण आये हैं । लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण तथा साध्य देव एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण ओर सिद्धगण भी आये हुए हैं । राघव ने सबको देख देखकर कहा—ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय है और संसार में परमपवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है । उस समय दिव्य शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा । सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया । काषायवासिनी सीता ने चतुर्दश-
( २६ ) भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी, अधोदृष्टि तथा प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा—हे अग्निदेव ! मैंने राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं किया है, यह सत्य है तो माधवी, धरित्री देवी, मुझे अवकाश प्रदान करें। इस तरह सीता शपथ कर ही रही थी कि एक अत्यन्त अद्भुत चमत्कार हुआ। भूतल से एक अत्यन्त उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमितविक्रमवाले दिव्यरत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा था। धारणी देवी ने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन करके अपनी बाहुओं में ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाया। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जयजयकार तथा साधुवाद के साथ अविच्छिन्नरूप से दिव्य पुष्पवृष्टि हुई। "सीते ! साधु, साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है" इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियाँ प्रकट हुईं। यज्ञवाट के सभी मुनि तथा नृपतिगण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष एवं भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर कोई प्रहृष्ट होकर 'जय-जय' एवं 'साधु-साधु' नाद करने लगे। कोई ध्यानपरायण हो गये और कोई राम एवं सीता को देखते हुए, निश्चेष्ट से हो गये। सीता के रसातल-प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए। श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए। ब्रह्माजी ने देवताओं के साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करते हुए श्रीराम को सान्त्वना प्रदान की। अवतारवाद के सम्बन्ध में पाश्चात्यों की भ्रान्तियों का उन्मूलन शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा—"मेरी रक्षा करो, मैं प्रजासहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।" मनु ने कहा—"कैसे तुम्हारी रक्षा हो ?" मत्स्य ने कहा—"जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य को निगल जाता है, अतः कुम्भ में रखकर मेरा पालन करो।" मनु ने कुम्भ में मत्स्य को रखा जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा—"बड़ा सरोवर बनाकर उसमें मुझे रखो।" मनुजी ने वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा—"अब मुझे समुद्र में डाल दो।" तब मनु ने उसे समुद्र में डाल दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा—"अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की रचना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।" मत्स्य के कथनानुसार महाघ आया। मनु ने पृथ्वा को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव बांध दी। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरिराज हिमालय में पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—"मैंने तुम्हें पार कर दिया। नाव को वृक्ष में बाँध दो।" यह मत्स्यावतार का वर्णन है।" कूर्मावतार का वर्णन—देवताओं की प्रार्थना से कूर्मराज ने अपने पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्र-मन्थन किया था। इसी प्रकार महाभारत में परशुराम, राम, बलराम आदि अवतारों का वर्णन है। “जन्माद्यस्य यतः” (ब्र० सू० १।१।२) इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये। इसी लिए "आकाशस्तल्लिङ्गात्” (ब्र० सू० १।१।२२) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति अभिन्न ही तत्त्व हैं। अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है। दक्षादि प्रजा- पति अवान्तर प्रजापति हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्म ही है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु है।
वह यद्यपि एक ही है तो भी कार्यभेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं । उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु एवं संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं । इस दृष्टि से प्रजापति, ईश्वर या महाविराट् त्रिमूति होता है । त्रिमूर्ति में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है । स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के साथ आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया । पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के समन्वित निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथब्राह्मण आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए । महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि महाभारत का प्रजापति वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही हैं। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि श्लोक का अर्थ यों है—'मैं सृष्टिकर्ता प्रजा- पति ब्रह्म हूँ मुझसे पर ( उत्कृष्ट ) कोई भी प्रमाण ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं की रक्षा की थी।' विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है । जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा' अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया । पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही गयी है । अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं । पाश्चात्य विज्ञ कहते हैं कि विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने से प्रजापति के अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे । पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है । किसी की इच्छा या भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है । विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण तथा महाभारत में विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी है । अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और सिद्ध करना असम्भव ही है । महा- भारत तथा हरिवंश में पाश्चात्य तथा तदनुयायियों ने भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना है । वस्तुतः हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध-स्मृतियों, पुराणों और आगमों का समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है, वैसे ही अवतारों और राम-कथाओं के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । जब महाभारत, हरिवंश तथा विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्य आदि अवतारों तथा राम और कृष्ण को विष्णु के अवतार कहा हो जा रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ? पाश्चात्य तथा तदनुयायी कहते हैं "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते हैं । वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण, तैत्तिरीयब्राह्मण एवं ऐतरेयब्राह्मण में हुआ है । यह अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता है और शतपथब्राह्मण, महाभारत के नारायणीयोपाख्यान तथा हरिवंशपुराण में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है । नृसिंहावतार की कथा पहले पहल तैत्तिरीय आरण्यक के परिशिष्ट में मिलती है । नारायणीयोपाख्यान तथा हरिवंशपुराण में इसका उल्लेख है । परशुराम विष्णु के अवतार का प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है । उदाहरणार्थ ( म० भा० ३।११५।११७ ) किन्तु नारायणीय उपाख्यान ( म० भा० १२।३२६।७७ ), हरिवंश ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।६।१४१ ) में उनको विष्णु का अवतार माना गया है ।" वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है । निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं होती । अतः पाश्चात्य विद्वानों का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान है, किन्तु उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का
प्राधान्य ही था।" यह मन्तव्य सर्वथा असंगत है। प्रजापति तथा विष्णु का विभिन्न यज्ञों में देवताओं के रूप में उल्लेख है ही। कई स्थलों में इन्द्र और विष्णु का साथ-साथ देवतात्व है और कहीं विष्णु का ही प्राधान्य है। विष्णु पूजा की श्रेष्ठता से ही उनसे अभिन्न अवतारों और पूजा की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध होती है। वस्तुतः जैसे अग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम आदि कर्मों का ज्ञान और अनुष्ठान किसी एक ग्रन्थ पर आश्रित नहीं होता, वह तो मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र तीनों का समन्वय कर के ही समझा जा सकता है। केवल मन्त्र या केवल ब्राह्मण के आधार पर उनका अनुष्ठान नहीं हो सकता । इतना ही क्यों, तीनों के आधार पर बनी हुई परम्पराप्राप्त पद्धतियों के आधार पर ही ज्योतिष्टोमादि का प्रयोग हो सकता है। इसी तरह मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों तथा रामायण, भारत, पुराणों एवं आगमों के आधार पर बने पूजाविधानों के आधार पर ही राम, कृष्ण आदि की आराधनाएँ होती हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इनकी पूजा पहले नहीं होती थी, विकासक्रम से बाद में चल पड़ी । “अतएव कृष्णावतार के साथ-साथ अवतारवाद के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रारम्भ हुआ। उस समय से लेकर अवतारवाद भक्तिभाव से ओत-प्रोत होने लगा ।” पाश्चात्यशिक्षादीक्षितों का यह कथन निराधार है; क्योंकि महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से ही कृष्णावतार की सामग्री प्राप्त होती है और उन्हीं ग्रन्थों में विष्णु, राम आदि की भक्ति की भी चर्चा है । रामतापनीय, गोपालतापनीय आदि उपनिषदों में भी राम, कृष्ण आदि अवतारों की भक्ति एवं पूजा आदि का उल्लेख है । यह कहना भी सर्वथा निराधार है कि “वासुदेव कृष्ण भागवतों के इष्टदेव थे। प्रारम्भ में उनका विष्णु से कोई सम्बन्ध नहीं था ।” यह भी कहना गलत है कि “तीसरी शती ई० पू० वासुदेव और कृष्ण की अभिन्नता की भावना उत्पन्न हुई। बौद्ध-धर्म तथा भागवत-सम्प्रदाय का भक्तिमार्ग दोनों समानरूप से ब्राह्मणसाहित्य, कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न और विकसित हुए । इसके फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का एकाधिकार लुप्त हो गया था । बौद्ध धर्म का अधिकाधिक प्रसार देखकर ब्राह्मणों ने भागवतों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उनके इष्टदेव वासुदेव कृष्ण को विष्णु नारायण का अवतार मान लिया । इससे अवतारवाद को बहुत प्रोत्साहन मिला । साथ ही साथ विष्णु का भी महत्त्व बढ़ने लगा । इस तरह अवतारवाद की सारी भावना धीरे-धीरे विष्णु नारायण में केन्द्रित होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित हुए", क्योंकि उक्त कल्पना को सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है। बौद्ध-धर्म वैदिकधर्मका प्रतिक्रियारूप था। इसमें तो प्रमाण बौद्ध- ग्रन्थ ही हैं। बुद्ध तथा बौद्धों ने प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं। आगम प्रमाण नहीं माना । फलतः उनके मत में वेदों की मान्यता नहीं है। बौद्ध बुद्ध को ही सर्वज्ञ मानकर बुद्ध-वचन को ही धर्म में प्रमाण मानते हैं। सुतरां वे लोग वैदिक नित्यात्मवाद तथा यज्ञ, याग आदि विशेषतः पश्वादिसमवेत यज्ञ के विरोधी थे । वे जन्मना जाति नहीं मानते थे, इसलिए ब्राह्मण जाति का भी उनकी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था । परन्तु भागवत भी ऐसे थे, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भगवान् वासुदेव ने महाभारत तथा गीता में वेद का, आत्मा का तथा वैदिक धर्मों का महत्त्व वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में कृष्णभक्त वेद, यज्ञ आदि के विरोधी कैसे हो सकते थे ? श्रीनारायणीयोपाख्यान, श्रीमद्भागवत तथा सर्वोपरि रामायण में वेद, यज्ञों और ब्राह्मणों का महत्त्व विशद रूप में वर्णित है, अतः भागवतों के भक्ति-सम्प्रदाय को बौद्धों के समान वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का विरोधी समझना निरी भ्रान्ति ही है । साथ ही भागवतों के उक्त ग्रन्थों में ही जब वासुदेव कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है तब तो कृष्ण और वासुदेव की भिन्नता की कल्पना को कोई स्थान ही नहीं मिलता । ब्राह्मणों ने भागवतों को आकर्षित करने के लिए ही वासुदेव को विष्णु का अवतार मान लिया, इस कल्पना का भी कोई आधार नहीं है । उल्टे “विष्णुर्गोपा अदाभ्य” इत्यादि रूप से वेदों में ही विष्णु को गोप (कृष्ण) कहा गया है। “गोपवेषस्य विष्णोः” मेघदूत में कालिदास ने भी विष्णु को गोपवेषधारी कहा है। वस्तुतः ‘विष्णुपुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मणसम्प्रदाय की
( २९ )
स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं,' किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण या वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं— “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्” । वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया है । फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है तब तो भिन्नता का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिये । विष्णु का महत्त्व भी अनादि ही है । वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी निर्मूल है । पाश्चात्यशिक्षादीक्षितों का यह भी कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी उधर कई शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था । रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था । उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी । रावण पाप और दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्यवान् और सदाचारी थे, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे । राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब उत्पन्न हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है । फिर भी अवतारवाद वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड में इतना व्याप्त है कि इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिये । अतः बहुत संभव है कि पहली शती ई० पू० से ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी । रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत तथा वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों को तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया है ।” सरासर धोखा देना है । वस्तुतः यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धि पूर्ण है, कारण, वेदों तथा उपनिषदों में अनादिकाल से ही राम के अवतार का तथा उनकी उपासना का वर्णन है । जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों में परमात्मा का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है ? पाश्चात्य वातावरण में पले हुओं का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है । हेतु के बिना अनुमान अकिञ्चित्कर ही होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्यकारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है, तभी धूम से वह्नि का अनुमान होता है । इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं, इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं है। विष्णु और राम दोनों ही पाश्चात्यों एवं उनके अनुयायियों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है । अप्रत्यक्ष साध्य के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? जिन ग्रन्थों के आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व सिद्ध होता है, उन्हीं से ही उनका अभेद सिद्ध होता है । अतएव जब प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण, महाभारत इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों की निराधार कल्पना का कोई महत्त्व हो ही नहीं सकता । प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता । सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है । अतएव कृष्ण से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है । इसी लिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है । भारत में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक नास्तिक सभी की जिह्वा पर राम का नाम प्रख्यात है । कृष्ण की कथाओं में भी आता है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा सुना रही थीं, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते कृष्ण बोल पड़े “सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्धनुरिति ।” वस्तुतः जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण से अवतारवाद सिद्ध है, तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है ? यदि वेद आदि प्रमाण नहीं तो पाश्चात्य कल्पक जैसे लोगों के नगण्य वचनों का ही क्या प्रामाण्य हो सकता है ? कुछ व्यक्तियों की तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्, महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है ।
( ३० ) कुछ पाश्चात्यशिक्षाप्रेमी कहते हैं—"छठी या सातवीं शती ई० से महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे ।” इसके लिए उन्होंने दिखाया है कि "अवतारों की सूची में एकरूपता नहीं है।” किन्तु यह तर्क अकिञ्चित्कर है। यह आवश्यक नहीं कि सब बातें सभी जगह लिखी जायँ। कहा जा चुका है कि ऐसी अनेकरूपता वेदों और उपनिषदों के कर्मों एवं उपासनाओं में भी आती है और इसी लिए मीमांसा के अनुसार समन्वय करके ही सूत्रों के अनुसार पद्धतियां बनती हैं। फिर भी नारायणीय उपाख्यान में विष्णु के दस अवतारों की सूची मिलती है। उसके प्रक्षिप्तत्व की कल्पना निराधार है। श्रीमद्भागवत परम प्रामाणिक ग्रन्थ है। बोपदेव ने श्रीमद्भागवत के आधार पर ही मुक्ताफल नामक ग्रन्थ लिखा है और वे हेमाद्रि के समय के हैं। श्रीभागवत में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है। उसमें बुद्ध की भी गणना है। अतः बुद्ध को छठी शती ई० से अवतार माना जाने लगा, यह कल्पना सर्वथा अप्रमाण है। वस्तुतस्तु; भारतीय साहित्यों के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नहीं, किन्तु किसी दृष्टि से अनन्त अनन्त ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र राम के अंश से प्रकट होते हैं । "संभु विरंचि विष्णु भगवाना, उपजहि जासु अंस ते नाना” श्रीमद्भागवत के अनुसार ब्रह्माजी ने स्पष्ट कहा है कि 'तम, महान्, अहं, आकाश आदि अष्ट आवरणों से आवृत सप्त-वितस्तिकायवाला कहाँ मैं और कहाँ आप जिनके रोमकूपों में इसी प्रकार के अगणित ब्रह्माण्डपरमाणु निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्म कारणब्रह्म हैं। ऐसी स्थिति में कार्यब्रह्म कारणब्रह्म के अंश ही ठहरते हैं, अतः विष्णुपुराण के विष्णु, शिवपुराण के शिव, रामायण के राम, श्रीभागवत के कृष्ण तथा शाक्तागमों की शक्ति एक ही कारणवस्तुरूप हैं। परन्तु विष्णु- पुराणोक्त विष्णु के अंशभूत अनन्त ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि कार्यब्रह्म ही हैं। इसी तरह शिवपुराणोक्त शिव के अंशभूत विष्ण्वादि भी कार्यब्रह्म ही हैं। इसी दृष्टि से रामायण एवं भागवत के राम और कृष्ण भी कारणब्रह्मरूप हैं। फलतः उनके रोमकूपों में कार्यब्रह्मरूप अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक कार्यब्रह्मरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि उनके अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तरमहत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है । "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्तिभावना भी उत्पन्न हुई ओर धीरे-धीरे विकसित होने लगी ।” ऐसा कहनेवाले की दृष्टि में अवतारवाद एक भावनामात्र है। 'राम के आदर्श चरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी। वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ रामभक्ति भी विकसित होने लगी।' यह कथन भी निराधार है। क्योंकि विष्णु, राम और कृष्ण अनादिकाल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्मरूप से ही प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है। श्रीराम की पितृभक्ति पिता की आज्ञा से श्रीरामचन्द्रजी के वनगमन के लिए प्रस्तुत होने पर माता कौशल्या ने कहा-वत्स ! तुम्हारे पिताजी ने वनगमन की आज्ञा प्रदान की है, परन्तु माता, पिता से हजार गुना अधिक गौरवमयी मानी गयी है अतः मैं तुम्हें वनगमन से रोकती हूँ, तुम वन मत जाओ। श्रीराम ने माता से कहा - माँ, पिता के वचन का उल्लङ्घन करने की मुझमें क्षमता नहीं है। मैं किसी प्रकार भी पिता के वचनों का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। मैं आपके चरणों में सिर से प्रणाम कर आपको प्रसन्न करता हूँ। मैं अवश्य वन जाना चाहता हूँ। सत्य ही लोक में ईश्वर है, सत्य में धर्म सदा आश्रित है। संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक हैं। सत्य से बढ़कर कोई पद नहीं। वेद भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना चाहिये। अतएव मैं पिता के आदेश का पालन क्यों न करूँ !
१. प्रथम काण्ड: श्रीराम का परब्रह्मत्व, अवतार-रहस्य एवं बालकाण्ड मीमांसा
( ३१ ) मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान से पिता के सत्य-सेतु का कदापि भेदन नहीं कर सकता। पूज्य महाराज दशरथ मेरे पिता हैं, जन्मदाता हैं, उन्होंने मेरे लिए जो आज्ञा प्रदान की है, वह कदापि मेरे द्वारा मिथ्या न होगी । हमारे पूर्वज महाराज सगर के पुत्र पिता की आज्ञा मानकर भूमि का खनन करते हुए विनाश को प्राप्त हुए । परशुराम ने पूज्य पिता की आज्ञा से ही अपनी माता रेणुका का फरसे से गला काट दिया । इन लोगों ने तथा देवसदृश अन्यान्य लोगों ने भी पिता की आज्ञा का बिना किसी हिचकिचाहट के पालन किया, और 'वे स्मरणीय आदर्श पुत्र माने जाने लगे' । अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा । चन्द्रमा से उसकी शोभा भले पृथक् हो जाय, हिमवान् भले ही हिमविहीन हो जाय एवं सागर भले ही अपनी मर्यादा त्याग दे परन्तु मैं पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता । लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ श्रीराम ने कैकेयी और महाराज दशरथ के सम्मुख दृढ़तापूर्वक पिता के वचनों की रक्षा के लिये कहा था । पूज्यतम पिता के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है मैं प्राणों का परित्याग करके भी वह सब करने के लिए कृतसंकल्प हूँ । पितृचरणों की शुश्रूषा और उनके वचन के आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं । पूज्य पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं निर्जन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ । श्रीमद्भागवत में कहा है— धर्मिष्ठ श्रीराम पूज्य पितृचरणों की आज्ञा से विबुध-स्पृहणीय राज्यलक्ष्मी का त्याग, इस प्रकार करके मानों कोई व्यक्ति जीर्ण दुपट्टे का त्याग कर दे, वन को चले गये— त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम् । इत्यादि कौशल्या के जीवनवत् प्रिय राम को सब माताओं पर तुल्य भक्ति कौशल्या के तो राम जीवन ही थे । तभी तो वह कहती हैं— नहि तावद् गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम् । एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥ नहि मे जीविते किंचित्सामर्थ्यमिह कल्पते । अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्निस्तनूजशोकप्रभवो महाहितः । महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः ॥ एकपुत्रा मुझे सकल कल्याण गुणों से युक्त सर्वशास्त्रविशारद पुत्र के बिना जीने का उत्साह नहीं है । इस संसार में प्रिय पुत्र एवं महाबलिष्ठ लक्ष्मण को न देख रही मेरे लिए जीवन के निमित्त कुछ भी उत्साह नहीं है । पुत्र-वियोगजनित शोक से उत्पन्न महादुःखदायी यह अग्नि मुझे वैसे ही सन्तप्त कर रही है, जैसे ग्रीष्मकाल में प्रखर किरणों से अत्यधिक चमक रहे भगवान् सूर्य ज्वालावलीकल्प किरणों से भूमि को सन्तप्त करते हैं । कौशल्या के प्रति राम का जैसा सम्मान था कैकेयी के प्रति उससे भी अधिक था । कैकेयी स्वयं कहती हैं—
( ३२ ) कौशल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु । अन्य माताओं ने भी अनुभव किया था कि राम झूठा कलङ्क लगाने पर भी क्रोध नहीं करते और स्वयं भी क्रोध करानेवाली बातें नहीं करते, क्रुद्ध लोगों को भी प्रसन्न कर लेनेवाले तथा दूसरों के दुःख में समान दुःखवाले राम अब कहाँ चले जा रहे हैं । महातेजा राम जिस प्रकार माता कौशल्या में भक्ति रखते हैं वैसे ही हम सबमें भी भक्ति रखते हैं - न क्रुद्ध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् । क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क गच्छति । माता सुमित्रा कहती हैं—हे आर्ये, तुम्हारे पुत्र राम सद्गुणों से युक्त पुरुषोत्तम हैं। उन्हें कहीं भय और क्लेश नहीं। तुम क्यों विलाप करती हो। तुम्हारे महाबलवान् पुत्र अपने पिता को सत्यवादी सिद्धसङ्कल्प करते हुए राज्य का त्याग कर वन को गये हैं। श्रेष्ठ श्रीराम शिष्टपुरुषों द्वारा आचरित धर्म में स्थित हैं। उनके लिए शोक करना व्यर्थ है । पितृतुल्य उनकी शुश्रूषा करनेवाले लक्ष्मण उनके साथ हैं, उन्हें कदापि दुःख नहीं होगा, सुख ही होगा। अरण्यवास के दुःख को जानती हुई जानकी धर्मात्मा आपके पुत्र राम का अनुगमन कर रही हैं । वे त्रैलोक्य में अपनी कीर्तिपताका फहरा रहे हैं। श्रीराम के परमपवित्र एवं उत्तम माहात्म्य को जानकर सूर्य अपनी किरणों से उनके शरीर को कदापि क्लेश नहीं देगा । समशीतोष्णसुखस्पर्श वायु वनप्रान्त में श्रीराम की सेवा करेगा । राम देव- ताओं के देव, प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं। उनके वन में अथवा नगर में कौन से गुण या दोष हो सकते हैं। शीघ्र ही वसिष्ठादि महर्षि पृथिवी, जानकी तथा विजयलक्ष्मी के साथ उनका अभिषेक करेंगे । देवी, आप शोक और मोह का त्याग करें । लक्ष्मी के तुल्य सीता जिनके अनुगत है एवं महाधनुर्धारी लक्ष्मण जिनके आगे चल रहे हैं उनके लिए क्या दुर्लभ है । राम का भ्रातृस्नेह रावण-वध के अनन्तर राम के अयोध्या-गमन के लिए उद्यत होने पर विभीषण ने अति विनम्र भाव से प्रार्थना की—भगवान्, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, आप मेरे गुणों और सेवाओं का स्मरण करते हैं, मुझपर आपका सौहार्द है तो आपका सारा कार्य सम्पन्न हो गया, अब आप कुछ समय मेरे यहाँ निवास करें तथा ससैन्य एवं समुहृद्- गण मेरा सत्कार स्वीकार करें । मैं बड़े प्रणय, सम्मान एवं सौहार्द से आप से विनय करता हूँ । मैं आपका सेवक हूँ । आज्ञा नहीं, प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या को प्रस्थान करें। श्रीराम ने सब वानरों और राक्षसों के बीच में कहा—वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट मन्त्रणाओं से पूजित हो चुका हूँ । मैं तुम्हारी बात न मानूं, यह संभव नहीं। किन्तु राक्षसराज, अपने उस भ्राता भरत को देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर हो रहा है । जो मुझे लौटाने के लिए सपरिकर चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने की मुझसे प्रार्थना कर रहा था। फिर भी उसकी बात मैंने अङ्गीकार नहीं की। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी आदि माताओं एवं सुहृद् गुहराज तथा पुरवासियों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है । अतः मुझे शीघ्र ही जाने की अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसे- श्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं; शीघ्र ही विमान मँगाओ— न खल्वेतन्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर । तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥ तुलसीदासजी कहते हैं— भरत सदृश को राम सनेही । जग जपु राम राम जपु जेही ॥
भाइयों के प्रति राम का कथन—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथिवी का राज्य तुम भाइयों के लिए ही चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य चाहता हूँ, यह मैं आयुध-स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुदमन के जो भी मेरा सुख हो, अग्निदेव उसे जलाकर भस्म कर दें— धर्ममर्थञ्च कामञ्च पृथिवीञ्चापि लक्ष्मण । इच्छामि भवतामर्थे एतत्प्रतिशृणोमि ते ॥ भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थञ्चापि लक्ष्मण । राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नञ्चापि मानद । भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतांशिखी ॥ राम का परम सुहृत्स्नेह श्रीराम के वनवासार्थ गङ्गातट पर पहुँचने पर निषादराज ने राम का पूर्ण स्वागत सत्कार किया और कहा—नाथ ! मेरा सारा राज्य आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी, हम सब आपके सेवक हैं। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, खाद्य पदार्थ तथा ये शय्याएँ एवं घोड़ों के लिये घास, चारा आदि सामग्री भी उपस्थित है। परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज के दिये गये भोजन, पानी आदि को ग्रहण नही किया, तथापि अपने व्यवहार तथा स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। उन्होने कहा—सुहृद्वर, आप मेरे समीप पैदल ही चले आये, आपके इस परमोत्कृष्ट प्रेम से हम अत्यन्त प्रसन्न एवं अर्चित हो गये हैं। अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं से निषादराज का निर्भर आलिङ्गन करते हुए राम ने कहा—प्रियवर ! हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ तथा प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे हैं। आपके मित्रों, वनों एवं राष्ट्र में कुशल तो है ? आप जो मेरे लिए लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार है, किन्तु मैंने वनचारी तपस्वी का व्रत धारण कर रखा है। इन व्रत के दिनों में मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण करके कन्द, मूल, फल अशन करता हूँ, अतः आप अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें । केवल घोड़ों के लिए चारा दाना मात्र ही मुझे अपेक्षित है। ये मेरे पिताजी के अत्यन्त प्रिय हैं। इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा । राम का शरणागतरक्षण व्रत विभीषण की शरणागति प्रसिद्ध है। भगवान् राम के सचिव सुहृद् सुग्रीव आदि विभीषण को शरण देने के विरुद्ध थे। वे कहते थे कि यह रावण का अनुज रावण का प्रणिधि बनकर हमारा भेद लेने या हममें फूट डालने, यदि मौका मिलें तो हममें से किसी पर सांघातिक प्रहार करने आया है। यदि रावण का प्रणिधि न भी हो, उसका विरोधी ही हो तो भी वह ग्राह्य नहीं है, क्योंकि ऐसे विपत्तिकाल में जो अपने सहोदर भाई का त्याग कर सकता है, अपने सगे भाई का अपना नहीं हुआ तो किसका विश्वस्त या आत्मीय हो सकता है। तस्मात् सर्वथा अग्राह्य है। भगवान् ने कहा—यदि वह प्रणिधि भी हो, हमारा भेद लेने आया हो तो भी वह रजनीचर हमारा सूक्ष्मातिसूक्ष्म भी अहित नहीं कर सकता। पृथिवी भर में जितने पिशाच, दानव, यक्ष तथा राक्षस हैं उन सभी का यदि इच्छा करूँ तो एक अङ्गुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ— पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥ ( वा० रा० ६।१८।२३ )
( १४ ) रन्ध्र मिलने पर विभीषण प्रहार कर सकता है, इस भीति को दूर कर शरणागत की रक्षा करना परमं धर्म है। राम ने कहा—सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आये हुए शत्रु-रूप व्याध का यथान्याय अर्चन किया और अपना मांस भोजन करने की उससे प्रार्थना की । जब कि इस प्रकार शरणागत भार्याहर्ता की तिर्यक् प्राणी ने भी उपेक्षा नहीं की तो मेरे सदृश सकल धर्मों के रहस्य को जाननेवाला क्षत्रिय अपकार न करनेवाले शरणा- गत की उपेक्षा कैसे कर सकता है ? सत्यवादी महर्षि कण्डु ने शरणागत रक्षा सम्बन्धिनी गाथा गायी है— हाथ जोड़े हुए दीनता से शरण मांगते हुए शत्रु को भी आश्रितरक्षणरूप परम धर्म की सिद्धि के लिए नहीं मारना चाहिये । इतना ही नहीं आर्त हो अथवा दृप्त हो जो भी शत्रुओं के भय से शरणागत हुआ हो, भले वह शत्रु ही क्यों न हो कृतात्मा प्राणी को चाहिये कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उसकी रक्षा करे । शरण में आया हुआ व्यक्ति यदि रक्षक की दृष्टि के सामने विनष्ट होता है तो वह अरक्षित अरक्षक का सब पुण्य लेकर चला जाता है । इस प्रकार प्रपन्न के अरक्षण से महान् दोष होता है । वह अस्वर्ग्य, अयशस्य और बलवीर्य का विनाशक है । अतः मैं कण्डु के धर्मिष्ठ, यशस्य तथा फलोदयकाल में स्वर्ग्य वचन का अवश्य पालन करूँगा । इसके अतिरिक्त मुझ परमदयालु राम का तो सर्वभूतों के लिए अभय प्रदान करना एक व्रत ही है । सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ सब प्राणियों के लिए अथच सब भूतों से भयभीत सभी प्राणियों के लिए अभय-प्रदान करना मेरा नित्य सत्सहज धर्म है । कोटि बिप्रबध लागे जाही। आये सरन तजहुँ नहि ताही ॥ भगवान् राम का कथन सुनकर आश्चर्य एवं सौहार्द से परिपूर्ण होकर सुग्रीव ने कहा—धर्मज्ञ, लोकनाथ- शिखामणे, आप सत्त्ववान् एवं सत्पथ में स्थित हैं अतः आपका ऐसा कल्याण भाषण आश्चर्यजनक नहीं है । आपका पुण्य कथन सुनकर मेरा भी अन्तरात्मा विभीषण को ग्राह्य मानने लगा । उसे शरण में लेने के विषय में पहले सबसे प्रमुख विरोधी सुग्रीव द्वारा रामसंनिधि में आनीत विभीषण के साथ राम की वैसी ही मित्रता हुई जैसी गरुड़ से इन्द्र की मैत्री हुई है । विभीषण ने राम के निकट आते ही राम के चरणों में गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा—भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः । भगवन्, सब भूतों के शरण्यभूत परमपुरुष आपकी शरण में आया हूँ । राम की सत्य प्रतिज्ञा श्रीरामजी ने अभय प्राप्ति के लिए उनकी (श्रीरामजी की) पुण्यसंनिधि में समागत दण्डकारण्यवासी ऋषियों के अभिरक्षण के लिए युद्ध में राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की थी । परन्तु श्रीसीता को बिना वैर पर-प्राणों का अभिहिंसन रुचिकर नहीं हुआ । इसी लिए ऐहिक सुख और पारलौकिक निःश्रेयस के लिए शस्त्रास्त्रों को अपने निकट न रखने का निवेदन करते हुए उन्होंने एक प्राचीन इतिहास श्रीरामजी को सुनाया । श्रीरामजी ने सीता के कथन की सर्वथा अति प्रशंसा कर कहा— हे सीते, मैं अपने जीवन का त्याग कर सकता हूँ एवं लक्ष्मण सहित तुम्हारा भी त्याग कर सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता— अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् । न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ॥
( ३५ ) सीता ने राम को परम धार्मिक, सत्यप्रतिज्ञ और पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले दृढ़व्रती कहा है । वह कहती हैं आप में धर्म और सत्य सब कुछ पुण्यताहेतु प्रतिष्ठित है । वाल्मीकिजी के द्वारा नारदजी से पूछे गये राम के गुणों में उन्हें धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ कहा गया है । राम के अपार चरित रामचरित का प्राचुर्य और उसकी पापराशिविनाशिता प्रसिद्ध है । इसी से कहा गया है— चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ रामचरित शतकोटि ( एक अरब ) श्लोकों में विस्तृत है, अर्थात् अपार है और उसके एक एक अक्षर में महापातकों के विनाश की क्षमता है । महाभारत, अष्टादशपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, देवीपुराण, भागवत, उपपुराण आदि की भी विशिष्ट फलश्रुतियाँ हैं किन्तु उनमें विष्णुचरित, शिवचरित, देवीचरित, गणेशचरित, सूर्यचरित का उत्कर्ष भी सोदाहरण दर्शाया गया है । रामचरित के प्रत्येक अक्षर में महापातकों को विनष्ट करने की अतुलशक्ति निहित है । रामनाम जितना जन-जन प्रख्यात है, उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण, वैकुण्ठ, माधव आदि देवताओं का नाम प्रख्यात न हो सका । पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वतीजी को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप विष्णु के हजार नामों के जप के बराबर होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने ! मैं अतिराम अर्थात् परशुराम का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ । राम रामेऽतिरामेऽतिरमे रामे मनोरमे । सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ “राम अनंत अनंतगुन अनंत कथा विस्तार” के अनुसार श्रीरामजी के अनन्त गुण हैं, उनका पार पाना संभव नहीं । कालिदास ने कहा है— महिमानं यदुत्कीर्यं तव संह्रियते वचः । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥ भगवन्, आपकी थोड़ी बहुत महिमा गाकर जो हम मौनावलम्बन करते हैं, उसका अर्थ यह नहीं है कि आपकी महिमा की इतिश्री हो गयी । उसका कारण हमारी थकावट अथवा अशक्ति है, गुणों की इयत्ता से हमारा मौनावलम्बन नहीं । पुष्पदन्ताचार्य कहते हैं— असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी । लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ भगवन् ! आपकी महिमा का लेखन यदि काले पहाड़ के समान मषी-स्याही हो और सिन्धुरूपी मषीपात्र में घोली जाय तथा कल्पवृक्ष की टहनी की कलम हो और सारी पृथिवी पत्र ( लेखाधार कागज का ताव ) हो एवं स्वयं शारदा ही सर्वदा रातदिन कल्पवृक्ष की शाखा लेकर आपके गुणों को लिखे तो भी आपके गुणों का, आपकी महिमा का पार नहीं पा सकती ।
( ३६ ) प्रस्तुत प्रस्तावना में जो कुछ लिखा गया है वह सब पूज्यपाद स्वामीजी द्वारा लिखित इस पुस्तक का प्रसाद है, जैसे गङ्गाजल के द्वारा ही भगवती गङ्गाजी की पूजा अर्चना होती है वैसे ही 'रामायण-मीमांसा' से संकलित कुछ अंशों को पाठकों के समक्ष प्रस्तावना के रूप में रखकर भगवान् राम के आदर्श से अनुप्राणित होनेवाले भक्तों के लिये पवित्र प्रयास किया गया है जिससे पाठक इस महान् ग्रन्थ की विषयवस्तु संक्षेप में अवगत कर सकें । इस ग्रन्थ के प्रकाशन में कुछ संस्थाओं एवं कुछ महानुभावों का जो योगदान हुआ है उसे हम भूल नहीं सकते । कलकत्ते की श्रीभक्तिसुधापरिषद् तथा आदरणीय श्री मोहनलालजी जालान का आर्थिक सहयोग विशेष उल्लेखनीय हैं । आदरणीय पं० श्री श्रीकृष्णपन्तजी शास्त्री साहित्याचार्य के अनवरत परिश्रम से ही ग्रन्थ का साङ्गोपाङ्ग सम्पादन भलीभांति सम्पन्न हो सका है । अतः ये सभी महानुभाव धन्यवाद के पात्र हैं । अन्त में रामायण-जगत् के माने जाने आधुनिक विद्वान् जो वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित सनातन सिद्धान्तों से विपरीत बातें जाने या अनजाने में अपनी लेखनी द्वारा भगवान् राम की कथा के प्रसङ्ग में प्रस्तुत करते हैं, उनके प्रति भी मैं अपना आभार प्रदर्शित किये बिना नहीं रह सकता जिनके कारण ही अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज द्वारा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम के चरित का विशद विवेचन 'रामायण-मीमांसा' के रूप में जनता- जनार्दन को प्राप्त हो सका है । रामायण के सम्बन्ध में अब तक जो भी शंकाएँ और समालोचनाएँ प्राप्त हो सकी हैं, उन सबका समाधान वेद-शास्त्रादि सिद्धान्तों के आधार पर आप इस ग्रन्थ से प्राप्त कर सकेंगे । अन्त में हम परमसुहृद अकारण दयालु भगवान् राम के चरणकमलों में नत-मस्तक होकर विनम्र प्रार्थना करते हैं कि कलिकाल में प्रसूत हम सभी प्राणियों को वे ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करें कि जिससे अपने युगल सीता-राम के चरणों में हमारी भक्ति और प्रीति दिनानुदिन बढ़ती रहे । श्याम सुन्दर धानुका
विषय-सूची प्रथम अध्याय परम ब्रह्मस्वरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य १-१४ श्रीसीताराम का अनुपम ऐश्वर्य १ श्रीसीता प्रेमसार-सर्वस्व श्रीराम की सौन्दर्यसार-सर्वस्व १ श्रीसीता श्रीराम की महाशक्ति एवं सर्वस्व १ सङ्गम और विरह में से विरह में ही प्रियतम की रोम-रोम में अनुभूति २ अभिन्नरूप श्रीसीता और श्रीराम की सेवाशिक्षाप्रदानार्थ भिन्नरूपता ३ सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य स्वीकार्य ४ अपौरुषेय वेद ही परमेश्वर का शाश्वत संविधान ४ वेदों का स्वतः प्रामाण्य ५ वेदावतार वाल्मीकिरामायण का अकुण्ठ प्रामाण्य ५ श्रीसीता-रामचरित की वेदमूलकता ६ वाल्मीकिरामायण में ही श्रीसीता-रामचरित का यथार्थ वर्णन ५ श्रीराम की महिमा के सम्बन्ध में महर्षि विश्वामित्र की उक्ति ८ महातेजा गौतम द्वारा अहल्या के साथ राम का पूजन ८ भगवान् परशुराम द्वारा त्रैलोक्यनाथ राम का स्तवन ८ महर्षि वसिष्ठ की सदुक्ति-लोक में ऐसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं जो राम के अनुव्रत न हो ९ पौरजनोक्ति—श्रीराम का अनुगमन कर रही सीता धन्या, कृतकृत्या ९ राम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि, प्रभु के प्रभु इत्यादि सुमित्रा के वचन ९ अगस्त्यजी द्वारा राम का पूजन और आतिथ्यसत्कार ९ महर्षियों, सिद्धों, देवताओं एवं गन्धर्वों की राम के प्रति शुभाशंसा ९ मारीच राक्षस द्वारा राम का मूर्तिमान धर्म, सत्यपराक्रम एवं सकललोकाधीश्वर के रूप में वर्णन १० अजेय श्रीराम के सम्बन्ध में रावण-प्रणिधि अकम्पन की ईश्वरोक्ति १० तारा की दृष्टि में राम साधुओं के निवास, आपदग्रस्तों के परम आश्रय, आर्तों के एकमात्र संश्रय एवं यश के महान् भाजन १० हनुमान् के अनुसार राम त्रिमूर्ति १० सूर्य से उसकी प्रभावत् सीता राम से अभिन्न १० रावण के गुप्तचर का राम की विष्णुरूपता कथन १२ यम, कुबेर, महेन्द्र, वरुण आदि द्वारा राम का विष्णुरूप में स्तवन १२
( २ ) द्वितीय अध्याय श्रीकामिल बुल्के की रामकथा १५-४८ वेद में राम के पूर्वजों का उल्लेख १५ वैदिक साहित्य में सीता १७ निर्विशेषण सीता और राम २९ स्यागरचर्चा २९ वेदों में सूत्रभूत वस्तुएँ ३० रामचन्द्रादि नामों की अनादिता ३० क्या देवता काल्पनिक हैं ? ३१ प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य की चर्चा ३२ शब्दार्थ-सम्बन्ध की अनादि परम्परा ३३ मीमांसकों का ज्ञानप्रामाण्य ३४ वेदमन्त्रों का स्वरूप निर्धारण ३४ मतभेद, असमन्वय और कालभेद ३५ सीता के नामों की गणना ३५ उत्तरोत्तर विकास का सिद्धान्त निस्सार ३५ रामायणीय राम और वैदिक राम ३६ पदार्थ-निर्णय में वाक्यशेषों का महत्त्व ३६ वैदिक साहित्य में रामकथा की सामग्री ३६ पाठसम्बन्धी विवेचना ४२ महाभारत प्रथम या रामायण प्रथम ४५ असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद ४५ उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता ४६ वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ ४६ तृतीय अध्याय पाठ-भेदादि समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ४९-८२ पाश्चात्यों का रोग—उनकी दृष्टि में ईसा के पूर्व सभ्यताविकास असम्भव ५० कुश और लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदयकालुष्यद्योतन ६१ वाल्मीकि ही भार्गव ६२ दस्यु वाल्मीकि ६३ पौर्वा-पर्यविरोध का समाधान ६७ महाभारत और रामायण ६७ भारत और महाभारत की कल्पना निर्मूल ६८ प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि ७१
( ३ ) आर्षज्ञानसम्पन्न वाल्मीकि की व्याकरणज्ञता अनुपपन्न नहीं ७४ वाल्मीकि के पूर्वजन्म की ( वल्मीक से उत्पत्ति के पूर्व की ) विभिन्न कथाओं का समन्वय ७४ वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिये पौराणिकों ने उनके सम्बन्ध में विविध कथाएँ गढ़ लीं, यह कथन निराधार ७७ यह कल्पना वेद, पुराण, महाभारत आदि के सर्वथा विरुद्ध ७८ अतीत घटनाओं के विषय में प्रामाणिक इतिवृत्त ही प्रमाण, अटकलबाजी विपरीत दिशा की प्रापक ७८ वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि महर्षियों के ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना निराधार ७८ महाभारत जिस विषय में मौन हो उसमें स्कन्दपुराणादि की बात स्वीकारने में कोई दोष नहीं कभी का दस्यु कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है ७९ वाल्मीकि वैदिक काल के राम के समकालिक होते तो उन्हें वैदिक भाषा में ही अपनी रचना करनी चाहिये थी, यह कथन निस्सार है, क्योंकि वैदिक काल कोई खास काल नहीं ८१ वैदिक काल में संस्कृत भाषा और उससे भिन्न मानुषी भाषा की सत्ता में प्रमाण ८१ चतुर्थ अध्याय वाल्मीकिरामायण और महाभारतरामोपाख्यान ८३-९८ महाभारत-रामोपाख्यान रामायण का स्रोत नहीं रामायण ही रामोपाख्यान का स्रोत ८४ महाभारत का रामोपाख्यान ८५ रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का वर्णन ८५ पुलस्त्य-वंश वर्णन ८५ रावण के उत्पात से त्रस्त देवताओं का ब्रह्मा से निवेदन ८६ ब्रह्मा की प्रार्थना से महाराज दशरथ के यहाँ भगवान् विष्णु का राम रूप में अवतार ८६ भगवान् राम के असाधारण सर्वलोकरञ्जक विशिष्ट गुण ८६ राज्याभिषेक की तैयारी करने पर रानी कैकेयी द्वारा विघ्न उपस्थित करने से राम का पिता की सत्यरक्षा के लिये वनगमन ८६ राम-वनगमन से प्रिय पुत्र के वियोग के कारण दुःखित राजा का देहान्त ८६ भरत द्वारा माता की भर्त्सना कर श्रीराम को लौटालाने के लिए सपरिकर राम के निकट वन गमन ८७ राम का प्रेमपूर्वक समझाबुझा कर भरत को लौटा देना ८७ श्रीराम का पुनः पौरों के आगमन की शङ्का से गोदावरी तट पर गमन ८७ शूर्पणखा के कारण खर से महान् वैर ८७ धर्मवत्सल राम द्वारा राक्षसों का वधकर दण्डकारण्य को धर्मारण्य बना देना ८७ विकृतानना शूर्पणखा का लङ्का जाकर भ्राता रावण के चरणों में मूच्छित हो गिर पड़ना ८७ क्रोधमूच्छित रावण का शुष्करुधिरानना शूर्पणखा से विकृतकारी के विषय में प्रश्न ८७ शूर्पणखा का रामविक्रम और खरदूषण सहित राक्षसों का पराभव बतलाना ८७ रावण का मारीच के निकट गमन, मारीच का रावण के आगमन का उद्देश्य जानकर उसे विरत करने का प्रयत्न ८७ रावण के हठ पर कनकमृग बनकर सीता के निकट जाना ८७
( ४ ) सीता के अनुरोध पर सीता की रक्षा में लक्ष्मण को नियुक्त कर राम का मृग पकड़ने जाना ८७ कनकमृग का कभी अन्तर्हित कभी प्रकट हो राम को बहुत दूर ले जाना ८७ राक्षस जान राम द्वारा अमोघ बाण मारने पर रामस्वर के तुल्य हा सीते, हा लक्ष्मण, चीखकर उसका धराशायी होना ८७ राम के अनिष्ट पर रोती हुई हतबुद्धि सीता का लक्ष्मण के प्रति शङ्का करना ८७ यतिवेष में प्रच्छन्न रावण का सीतापहरण ८८ जटायु के साथ रावण का युद्ध ८८ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार ८८ सीता की खोज में आगे बढ़ने पर कबन्ध से भेंट ८८ दोनों भ्राताओं द्वारा कबन्ध का वध ८८ शापमुक्त विश्वावसु गन्धर्व से सीतापहरणकर्ता का पता जान राम का पम्पातट पर गमन ८८ राम और लक्ष्मण का परिचय जानने के लिए सुग्रीव का हनुमान् को भेजनां ८९ हनुमान् से सुग्रीव का वृत्त जानकर राम का सुग्रीव के निकट गमन ८९ सुग्रीव और बाली का युद्ध ८९ राम द्वारा बाण से वाली का वध ८९ रावण का सीता को नन्दनोपम अशोक वाटिका में राक्षसियों के पहरे में रखना ८९ भीषण राक्षसियाँ सीता का तर्जन करतीं और कहतीं हम तुझे तिल-तिल कर खा जायेंगी । तू हमारे स्वामी की अवहेलना कर रही है ८९ सीता कहतीं—आर्याओ, मुझे खा जाओ नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन का मोह नहीं—त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना ८९ त्रिजटा का स्वप्न ९० भर्तृशोकाकुला दीना मलिनवसना पतिव्रता सीता को रावण ने देखा ९० पतिप्राणा सीता के सम्मुख रावण की दाल न गली ९० रावण का अपना अनुपम ऐश्वर्य बखान कर सीता के प्रलोभन का असफल प्रयास ९० शुभानना सीता ने मुख फेर कर और बीच में तृण रखकर कहा—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनी हैं। मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं सर्वथा अलभ्य हूँ, तुम मेरी ओर से मन हटा लो । ९० रावण का सीता की फटकार सुनकर चला जाना ९० माल्यवान् पर्वत पर वर्षाऋतु बिताकर-शरत्काल के आगमन पर श्रीराम की सीताविषयक स्मृति का उद्बोधित होना ९१ श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—वत्स, देखो तो सुग्रीव ग्राम्यधर्मों से प्रमत्त हो कृतघ्न तो नहीं हो गया ? ९१ सक्रोध लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचे, सुग्रीव ने कहा मैंने विनीत वानर सीतान्वेषणार्थ विभिन्न दिशाओं में भेज दिये हैं, उनके लौटने का समय सन्निहित है ९१ पवनात्मज आदि द्वारा मधुवन विध्वंस की खबर से सुग्रीव का कार्यसिद्धि का अनुमान ९१ सीतान्वेषणार्थ दक्षिण की ओर गये हुए ऋक्ष और वानरों से राम के पूछने पर हनुमान् ने कहा— मैंने आर्या सीता के दर्शन किये ९२
( ५ ) यात्रा की तथा लङ्का में सीता दर्शन की सब बातें संक्षेपतः कहीं— लङ्का दहन एवं कई राक्षसों के हनन की बात भी कही ९२ शुभ मुहूर्त में सेना का व्यूह बनाकर सबका लङ्का की ओर प्रस्थान ९२ समुद्रलङ्घन का प्रश्न आने पर समुद्र ने स्वप्न में राम से कहा—मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता। नल जिस पत्थर आदि को मुझपर रखेगा उसे मैं धारण करूँगा ९२ नल द्वारा सेना की सहायता से १० योजन चौड़े तथा १०० योजन लम्बे पुल का निर्माण ९२ शुक और सारण नाम के रावणचरों के तोह लेने आने पर उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया ९२ अङ्गद का दूत के रूप में रावण के दरबार में जाना और निर्भय होकर राम का सन्देश सुनाना ९३ वायुवेग वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार का तुड़वा देना ९३ वानरों का शिविर में प्रवेश करने पर राक्षसों द्वारा उनपर हमला करना ९३ सदलबल रावण का स्वयं युद्धभूमि में आना, श्रीराम के साथ घमासान युद्ध ९३ कुम्भकर्णवध ९३ इन्द्रजित् का रणक्षेत्र में आगमन, इन्द्रजित् का लक्ष्मण से घमासान युद्ध ९४ इन्द्रजित् द्वारा राम और लक्ष्मण को वरदान प्राप्त बाणों से चारों ओर से बाँध देना ९४ विशल्या ओषधि से दोनों क्षणभर में स्वस्थ और युद्धार्थ सन्नद्ध ९४ लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजित् का वध ९४ मातलि द्वारा आनीत रथ पर आरूढ़ होकर राम का रावण पर आक्रमण ९४ राम और रावण का अनुपम युद्ध, अन्त में राम ने रावण को धराशायी कर दिया ९५ रावण के मरने पर महर्षियों सहित देवताओं द्वारा राम पर पुष्पवृष्टि ९५ सीता के प्रति राम की शङ्का एवं वायु, अग्नि आदि देवताओं तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की विशुद्धि ९५ का वर्णन ९५ पञ्चम अध्याय बौद्धों तथा जैनों द्वारा विकृत रामचरित ९९-१७८ दशरथजातक की कथा ९९ अनामकजातक की कथा १०० दशरथकथानक की कथा १०१ राम की कहानी राम की जबानी १०२ छद्ममयी नीति से भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा राम का आधुनिक नास्तिक युवक के तुल्य चित्रण १०२ उक्त पुस्तक न राम की कहानी है और न राम द्वारा कही ही गयी है। वह मिथ्या वासुदेव निरी- श्वरवादी बौद्ध आनन्द कौसल्यायन के मस्तिष्क का फितूर है। उसमें छद्ममयी नीति का आश्रयण करते हुए वेदशास्त्रविरुद्ध, रामायणविरुद्ध अनेक अनर्गल कल्पनाएँ उल्लिखित हैं १०२ विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का-वध कर डाला, क्योंकि पिताजी की आज्ञा थी कि विश्वामित्र की हर बात का पालन करना, वाल्मीकि रामायण में कहीं ऐसा उल्लेख न होने पर कौसल्यायन का मिथ्या भाषण का यह एक नमूना १०५
( ६ ) परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा यह कैसा धर्मबन्धन था, यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था आदि अनार्य शब्द कहलाना कौसल्यायन का चरम अनौचित्य १११ इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही शायद कोई एक आध बात सत्य निकले प्रायः सब बातें मनगढ़न्त दुष्कल्पनापूर्ण हैं ११२ जैन-मत में रामकथा १२८ विमल सूरि आदि का काल १२९ पउमचरियं की विस्तृत रामकथा १२९ अनेक जैन लेखकों द्वारा लिखित विकृतिमय रामकथा १३० रावणचरित १३० रावण-बालि-संघर्ष १३० धर्मान्तरण १३७ जैन अग्नि परीक्षा पुस्तक का परिचय १४५ बिना अपवाद के भी अग्नि-परीक्षा सम्भव १४७ वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि १५५ वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६० राम पर बहुपत्नीत्वारोप सर्वथा निराधार १६१ बौद्ध जातक साहित्य की रामकथाओं पर विचार १६३ शाक्यों की उत्पत्ति १६८ कोलियों की उत्पत्ति १६८ जयद्दिसजातक की कथाएँ १७२ सामजातक रामायण की प्रतिच्छाया १७२ वेस्संन्तरजातक १७३ संबुलाजातक १७४ महासुतसोमजातक १७५ जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने सामग्री ली दिनेशचन्द्र सेन के इस मत की प्रमाणशून्यता १७५ जातकों में रामकथा से सम्बन्धित सामग्री १७६ रामायण का आधार गाथाओं में ढूँढना व्यर्थ, उसके आधार प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्य— बुल्के का मत १७६ वाल्मीकि रामायण के आधार के सम्बन्ध में दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान १७७ डॉ० ह्वीलर का मत १७७ राक्षस बौद्ध नहीं थे—बुल्के का मत १७७ दिनेशचन्द्र सेन तथा डॉ० ह्वीलर के मतों का बुल्के द्वारा खण्डन १७७ वेद-प्रामाण्यबाधक होने के ही कारण चोरतुल्य बौद्धादि नास्तिक दण्डनीय कहे गये हैं १७८ षष्ठ अध्याय रामायण के मूल स्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १७९–२२२ डॉ० बेबर का मत १७९ डॉ० याकोबी का मत १७९
( ७ ) डॉ० हाप्किन्स का मत १८१ डॉ० वान नेगैलैन का मत १८१ डॉ० दिनेशचन्द्र का मत १८२ रामायण के मूल स्रोत वेद तथा उपनिषद् १८२ जैन साहित्य में उपलब्ध रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर आधारित १८३ बौद्ध लङ्कावतारसूत्र १८३ दीपवंश तथा महावंश सिंहल द्वीप के प्राचीनतम ऐतिहासिक काव्यों में रामकथा १८३ वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८८ वेदावतार वाल्मीकिरामायण में ईश्वर, देवता, राक्षस, असुर तथा ईश्वरावतार आदि का वर्णन वेदसंमत १९१ नाना अलङ्कारों से विभूषित कामरूपी रावण के सुन्दर रूप का वर्णन १९२ उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ महर्षि विश्वामित्र का राम को विष्णु का अवतार कहना २०० वलगर्वित रावण के वधार्थ देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में अवतार २०१ राम की अतुल सामर्थ्य का ऋषि, मुनि, देव, राक्षस, मानव आदि अनेकों द्वारा मुक्तकण्ठ से वर्णन २०२ राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, उनके लोकशिक्षार्थ मनुष्योचित कर्म युक्तियुक्त २०६ परब्रह्मरूप विष्णु इन्द्र की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठतम २१८ राज्यच्युत इन्द्र को पुनः राज्य में प्रतिष्ठित करने के लिए ही विष्णु का वामन (इन्द्रानुज) के रूप में अवतार २१९ तैत्तिरीयसंहिता की इन्द्रवृत्रविषयिणी आख्यायिका से विष्णु ही इन्द्र की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं और इन्द्र की सहायता करते हैं यह सिद्ध है २२१ विष्णु की परमेश्वरता एक नहीं बोसियों वैदिक मन्त्रों से सिद्ध २२२ सप्तम अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२३-२४८ वेद और वेदान्त के रहस्य से अनभिज्ञ पाश्चात्यों की नाराशंसी गाथा सम्बन्धी कल्पना अशुद्ध और निराधार २२३ नरों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी २२३ वेदमन्त्र नाराशंसी गाथाओं के गान में सूत का अधिकार नहीं २२३ पौराणिक गाथाओं के गान में सूत का भी अधिकार २२४ गाथाएँ वैदिक और लौकिक अनेक प्रकार की हैं २२४ रामायण प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्यों पर निर्भर—बुल्के २२७ बुल्के का उक्त कथन रामायणविरुद्ध २२८ बालकाण्ड के अनुसार नारदोपदिष्ट मूलरामायण तथा ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा रामायण के आधार २२८
( ८ ) हरिवंश की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास पुराण प्रसिद्ध गाथाओं से ही २२८ हरिवंश यदि मान्य है तो तदनुसार राम का विष्णुत्व मान्य होना चाहिये २२८ हरिवंश में राम का ईश्वर हरि के अवतारत्वेन वर्णन २२८ सीता का लक्ष्मी के अवतारत्वेन वर्णन २२८ इक्ष्वाकु-वंश में रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति—बुल्के २२९ ‘इक्ष्वाकूणामिदं तेषाम्’ श्लोक का अर्थ है—महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में रामायणरूप महान् आख्यान की उत्पत्ति हुई न कि बुल्के द्वारा उक्त अर्थ २२९ महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व का संक्षिप्त रामचरित आख्यान काव्य पर निर्भर प्रतीत होता है, बुल्के का यह कथन असङ्गत २२९ महाभारत के बहुत पहले आर्ष वाल्मीकिरामायण के रहते उसे भुलाकर अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक उपाख्यानों को आधार मानना तर्कविरुद्ध २२९ वैदिक काल के बाद चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठीं शती में रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी यह कथन निष्प्रमाण २२९ रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण २२९ रामायण का निर्माण आर्ष-विज्ञान के आधार पर न कि आख्यानों के आधार पर २२९ आदि रामायण नाम की कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं २३० उपलब्ध समग्र बालकाण्ड प्रामाणिक उसके बिना रामायण की अपूर्णता २३२ वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर उसके गाने का आदेश दिया, उनमें कुश और लव ( सीता-पुत्र ) मुख्य २३३ कुश और लव काव्योपजीवी नहीं, रामपुत्र एवं सीतापुत्र २३४ निर्वासित सीता के करुण क्रन्दन से करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोकरूप में परिणत २३५ सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापनार्थ समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से गुप्त और प्रकट निखिल वृत्त जानकर रामायण का निर्माण २३६ कुश और लव का चमत्कारपूर्ण रामायण-गान २३७ कुश और लव का स्व-पुत्ररूप में राम को परिचय २३८ देवता, ऋषि, महर्षि, राजा, प्रजा आदि की महती सभा में सीता का प्रत्यय प्रदान २३९ माधवी देवी का प्राकट्य, सीता को सादर सिंहासन पर बैठा कर रसातल प्रवेश २४० अपने अमर महाकाव्य के निर्माण द्वारा आदि कवि सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापन में पूर्ण सफल २४१ कुश और लव के रूपसौन्दर्य, स्वरमाधुर्य, सङ्गीतकौशल आदि अपूर्व गुण २४१ नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ के यथार्थ ज्ञाता राम २४२ मत्स्य, कूर्म, वराह तीनों अवतार आरम्भ में प्रजापति के माने जाते थे, विष्णु का महत्त्व बढ़ने से विष्णु के माने जाने लगे । बुल्के के ये विचार भारतीय ग्रन्थों की वास्तविकता न जानने के दुष्परिणाम २४६ भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता २४७ विकासवादियों के विकासवत् मनुष्यमात्र राम में ईश्वरत्व का विकास नहीं हुआ, अनन्त कल्याण गुणगणास्पद राम में ईश्वरत्व परब्रह्मत्व स्वाभाविक २४७