भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

( ३० ) कुछ पाश्चात्यशिक्षाप्रेमी कहते हैं—"छठी या सातवीं शती ई० से महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे ।” इसके लिए उन्होंने दिखाया है कि "अवतारों की सूची में एकरूपता नहीं है।” किन्तु यह तर्क अकिञ्चित्कर है। यह आवश्यक नहीं कि सब बातें सभी जगह लिखी जायँ। कहा जा चुका है कि ऐसी अनेकरूपता वेदों और उपनिषदों के कर्मों एवं उपासनाओं में भी आती है और इसी लिए मीमांसा के अनुसार समन्वय करके ही सूत्रों के अनुसार पद्धतियां बनती हैं। फिर भी नारायणीय उपाख्यान में विष्णु के दस अवतारों की सूची मिलती है। उसके प्रक्षिप्तत्व की कल्पना निराधार है। श्रीमद्भागवत परम प्रामाणिक ग्रन्थ है। बोपदेव ने श्रीमद्भागवत के आधार पर ही मुक्ताफल नामक ग्रन्थ लिखा है और वे हेमाद्रि के समय के हैं। श्रीभागवत में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है। उसमें बुद्ध की भी गणना है। अतः बुद्ध को छठी शती ई० से अवतार माना जाने लगा, यह कल्पना सर्वथा अप्रमाण है। वस्तुतस्तु; भारतीय साहित्यों के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नहीं, किन्तु किसी दृष्टि से अनन्त अनन्त ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र राम के अंश से प्रकट होते हैं । "संभु विरंचि विष्णु भगवाना, उपजहि जासु अंस ते नाना” श्रीमद्भागवत के अनुसार ब्रह्माजी ने स्पष्ट कहा है कि 'तम, महान्, अहं, आकाश आदि अष्ट आवरणों से आवृत सप्त-वितस्तिकायवाला कहाँ मैं और कहाँ आप जिनके रोमकूपों में इसी प्रकार के अगणित ब्रह्माण्डपरमाणु निरन्तर परिभ्रमण करते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक ब्रह्म कारणब्रह्म हैं। ऐसी स्थिति में कार्यब्रह्म कारणब्रह्म के अंश ही ठहरते हैं, अतः विष्णुपुराण के विष्णु, शिवपुराण के शिव, रामायण के राम, श्रीभागवत के कृष्ण तथा शाक्तागमों की शक्ति एक ही कारणवस्तुरूप हैं। परन्तु विष्णु- पुराणोक्त विष्णु के अंशभूत अनन्त ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि कार्यब्रह्म ही हैं। इसी तरह शिवपुराणोक्त शिव के अंशभूत विष्ण्वादि भी कार्यब्रह्म ही हैं। इसी दृष्टि से रामायण एवं भागवत के राम और कृष्ण भी कारणब्रह्मरूप हैं। फलतः उनके रोमकूपों में कार्यब्रह्मरूप अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक और संहारक कार्यब्रह्मरूप ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि उनके अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तरमहत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है । "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्तिभावना भी उत्पन्न हुई ओर धीरे-धीरे विकसित होने लगी ।” ऐसा कहनेवाले की दृष्टि में अवतारवाद एक भावनामात्र है। 'राम के आदर्श चरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी। वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ रामभक्ति भी विकसित होने लगी।' यह कथन भी निराधार है। क्योंकि विष्णु, राम और कृष्ण अनादिकाल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्मरूप से ही प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है। श्रीराम की पितृभक्ति पिता की आज्ञा से श्रीरामचन्द्रजी के वनगमन के लिए प्रस्तुत होने पर माता कौशल्या ने कहा-वत्स ! तुम्हारे पिताजी ने वनगमन की आज्ञा प्रदान की है, परन्तु माता, पिता से हजार गुना अधिक गौरवमयी मानी गयी है अतः मैं तुम्हें वनगमन से रोकती हूँ, तुम वन मत जाओ। श्रीराम ने माता से कहा - माँ, पिता के वचन का उल्लङ्घन करने की मुझमें क्षमता नहीं है। मैं किसी प्रकार भी पिता के वचनों का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। मैं आपके चरणों में सिर से प्रणाम कर आपको प्रसन्न करता हूँ। मैं अवश्य वन जाना चाहता हूँ। सत्य ही लोक में ईश्वर है, सत्य में धर्म सदा आश्रित है। संसार की सभी वस्तुएँ सत्यमूलक हैं। सत्य से बढ़कर कोई पद नहीं। वेद भी सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, अतः सत्यपरायण होना चाहिये। अतएव मैं पिता के आदेश का पालन क्यों न करूँ !

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 35, कुल 1049 में से · BharatKosha