रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान से पिता के सत्य-सेतु का कदापि भेदन नहीं कर सकता। पूज्य महाराज दशरथ मेरे पिता हैं, जन्मदाता हैं, उन्होंने मेरे लिए जो आज्ञा प्रदान की है, वह कदापि मेरे द्वारा मिथ्या न होगी । हमारे पूर्वज महाराज सगर के पुत्र पिता की आज्ञा मानकर भूमि का खनन करते हुए विनाश को प्राप्त हुए । परशुराम ने पूज्य पिता की आज्ञा से ही अपनी माता रेणुका का फरसे से गला काट दिया । इन लोगों ने तथा देवसदृश अन्यान्य लोगों ने भी पिता की आज्ञा का बिना किसी हिचकिचाहट के पालन किया, और 'वे स्मरणीय आदर्श पुत्र माने जाने लगे' । अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा । चन्द्रमा से उसकी शोभा भले पृथक् हो जाय, हिमवान् भले ही हिमविहीन हो जाय एवं सागर भले ही अपनी मर्यादा त्याग दे परन्तु मैं पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता । लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ श्रीराम ने कैकेयी और महाराज दशरथ के सम्मुख दृढ़तापूर्वक पिता के वचनों की रक्षा के लिये कहा था । पूज्यतम पिता के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है मैं प्राणों का परित्याग करके भी वह सब करने के लिए कृतसंकल्प हूँ । पितृचरणों की शुश्रूषा और उनके वचन के आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं । पूज्य पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं निर्जन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ । श्रीमद्भागवत में कहा है— धर्मिष्ठ श्रीराम पूज्य पितृचरणों की आज्ञा से विबुध-स्पृहणीय राज्यलक्ष्मी का त्याग, इस प्रकार करके मानों कोई व्यक्ति जीर्ण दुपट्टे का त्याग कर दे, वन को चले गये— त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम् । इत्यादि कौशल्या के जीवनवत् प्रिय राम को सब माताओं पर तुल्य भक्ति कौशल्या के तो राम जीवन ही थे । तभी तो वह कहती हैं— नहि तावद् गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम् । एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥ नहि मे जीविते किंचित्सामर्थ्यमिह कल्पते । अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्निस्तनूजशोकप्रभवो महाहितः । महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः ॥ एकपुत्रा मुझे सकल कल्याण गुणों से युक्त सर्वशास्त्रविशारद पुत्र के बिना जीने का उत्साह नहीं है । इस संसार में प्रिय पुत्र एवं महाबलिष्ठ लक्ष्मण को न देख रही मेरे लिए जीवन के निमित्त कुछ भी उत्साह नहीं है । पुत्र-वियोगजनित शोक से उत्पन्न महादुःखदायी यह अग्नि मुझे वैसे ही सन्तप्त कर रही है, जैसे ग्रीष्मकाल में प्रखर किरणों से अत्यधिक चमक रहे भगवान् सूर्य ज्वालावलीकल्प किरणों से भूमि को सन्तप्त करते हैं । कौशल्या के प्रति राम का जैसा सम्मान था कैकेयी के प्रति उससे भी अधिक था । कैकेयी स्वयं कहती हैं—