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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

१. प्रथम काण्ड: श्रीराम का परब्रह्मत्व, अवतार-रहस्य एवं बालकाण्ड मीमांसा

( ३१ ) मैं किसी भी लोभ से, मोह से तथा अज्ञान से पिता के सत्य-सेतु का कदापि भेदन नहीं कर सकता। पूज्य महाराज दशरथ मेरे पिता हैं, जन्मदाता हैं, उन्होंने मेरे लिए जो आज्ञा प्रदान की है, वह कदापि मेरे द्वारा मिथ्या न होगी । हमारे पूर्वज महाराज सगर के पुत्र पिता की आज्ञा मानकर भूमि का खनन करते हुए विनाश को प्राप्त हुए । परशुराम ने पूज्य पिता की आज्ञा से ही अपनी माता रेणुका का फरसे से गला काट दिया । इन लोगों ने तथा देवसदृश अन्यान्य लोगों ने भी पिता की आज्ञा का बिना किसी हिचकिचाहट के पालन किया, और 'वे स्मरणीय आदर्श पुत्र माने जाने लगे' । अतः मैं पिता का वचन-पालन अवश्य करूँगा । चन्द्रमा से उसकी शोभा भले पृथक् हो जाय, हिमवान् भले ही हिमविहीन हो जाय एवं सागर भले ही अपनी मर्यादा त्याग दे परन्तु मैं पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता । लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ श्रीराम ने कैकेयी और महाराज दशरथ के सम्मुख दृढ़तापूर्वक पिता के वचनों की रक्षा के लिये कहा था । पूज्यतम पिता के लिए जो भी प्रिय कार्य किया जा सकता है मैं प्राणों का परित्याग करके भी वह सब करने के लिए कृतसंकल्प हूँ । पितृचरणों की शुश्रूषा और उनके वचन के आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण है ही नहीं । पूज्य पिताजी न भी कहें तो भी आपकी आज्ञा से मैं निर्जन वन में १४ वर्ष निवास कर सकता हूँ । श्रीमद्भागवत में कहा है— धर्मिष्ठ श्रीराम पूज्य पितृचरणों की आज्ञा से विबुध-स्पृहणीय राज्यलक्ष्मी का त्याग, इस प्रकार करके मानों कोई व्यक्ति जीर्ण दुपट्टे का त्याग कर दे, वन को चले गये— त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम् । इत्यादि कौशल्या के जीवनवत् प्रिय राम को सब माताओं पर तुल्य भक्ति कौशल्या के तो राम जीवन ही थे । तभी तो वह कहती हैं— नहि तावद् गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम् । एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥ नहि मे जीविते किंचित्सामर्थ्यमिह कल्पते । अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्निस्तनूजशोकप्रभवो महाहितः । महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः ॥ एकपुत्रा मुझे सकल कल्याण गुणों से युक्त सर्वशास्त्रविशारद पुत्र के बिना जीने का उत्साह नहीं है । इस संसार में प्रिय पुत्र एवं महाबलिष्ठ लक्ष्मण को न देख रही मेरे लिए जीवन के निमित्त कुछ भी उत्साह नहीं है । पुत्र-वियोगजनित शोक से उत्पन्न महादुःखदायी यह अग्नि मुझे वैसे ही सन्तप्त कर रही है, जैसे ग्रीष्मकाल में प्रखर किरणों से अत्यधिक चमक रहे भगवान् सूर्य ज्वालावलीकल्प किरणों से भूमि को सन्तप्त करते हैं । कौशल्या के प्रति राम का जैसा सम्मान था कैकेयी के प्रति उससे भी अधिक था । कैकेयी स्वयं कहती हैं—

( ३२ ) कौशल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु । अन्य माताओं ने भी अनुभव किया था कि राम झूठा कलङ्क लगाने पर भी क्रोध नहीं करते और स्वयं भी क्रोध करानेवाली बातें नहीं करते, क्रुद्ध लोगों को भी प्रसन्न कर लेनेवाले तथा दूसरों के दुःख में समान दुःखवाले राम अब कहाँ चले जा रहे हैं । महातेजा राम जिस प्रकार माता कौशल्या में भक्ति रखते हैं वैसे ही हम सबमें भी भक्ति रखते हैं - न क्रुद्ध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् । क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क गच्छति । माता सुमित्रा कहती हैं—हे आर्ये, तुम्हारे पुत्र राम सद्गुणों से युक्त पुरुषोत्तम हैं। उन्हें कहीं भय और क्लेश नहीं। तुम क्यों विलाप करती हो। तुम्हारे महाबलवान् पुत्र अपने पिता को सत्यवादी सिद्धसङ्कल्प करते हुए राज्य का त्याग कर वन को गये हैं। श्रेष्ठ श्रीराम शिष्टपुरुषों द्वारा आचरित धर्म में स्थित हैं। उनके लिए शोक करना व्यर्थ है । पितृतुल्य उनकी शुश्रूषा करनेवाले लक्ष्मण उनके साथ हैं, उन्हें कदापि दुःख नहीं होगा, सुख ही होगा। अरण्यवास के दुःख को जानती हुई जानकी धर्मात्मा आपके पुत्र राम का अनुगमन कर रही हैं । वे त्रैलोक्य में अपनी कीर्तिपताका फहरा रहे हैं। श्रीराम के परमपवित्र एवं उत्तम माहात्म्य को जानकर सूर्य अपनी किरणों से उनके शरीर को कदापि क्लेश नहीं देगा । समशीतोष्णसुखस्पर्श वायु वनप्रान्त में श्रीराम की सेवा करेगा । राम देव- ताओं के देव, प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं। उनके वन में अथवा नगर में कौन से गुण या दोष हो सकते हैं। शीघ्र ही वसिष्ठादि महर्षि पृथिवी, जानकी तथा विजयलक्ष्मी के साथ उनका अभिषेक करेंगे । देवी, आप शोक और मोह का त्याग करें । लक्ष्मी के तुल्य सीता जिनके अनुगत है एवं महाधनुर्धारी लक्ष्मण जिनके आगे चल रहे हैं उनके लिए क्या दुर्लभ है । राम का भ्रातृस्नेह रावण-वध के अनन्तर राम के अयोध्या-गमन के लिए उद्यत होने पर विभीषण ने अति विनम्र भाव से प्रार्थना की—भगवान्, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, आप मेरे गुणों और सेवाओं का स्मरण करते हैं, मुझपर आपका सौहार्द है तो आपका सारा कार्य सम्पन्न हो गया, अब आप कुछ समय मेरे यहाँ निवास करें तथा ससैन्य एवं समुहृद्- गण मेरा सत्कार स्वीकार करें । मैं बड़े प्रणय, सम्मान एवं सौहार्द से आप से विनय करता हूँ । मैं आपका सेवक हूँ । आज्ञा नहीं, प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या को प्रस्थान करें। श्रीराम ने सब वानरों और राक्षसों के बीच में कहा—वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट मन्त्रणाओं से पूजित हो चुका हूँ । मैं तुम्हारी बात न मानूं, यह संभव नहीं। किन्तु राक्षसराज, अपने उस भ्राता भरत को देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर हो रहा है । जो मुझे लौटाने के लिए सपरिकर चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने की मुझसे प्रार्थना कर रहा था। फिर भी उसकी बात मैंने अङ्गीकार नहीं की। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी आदि माताओं एवं सुहृद् गुहराज तथा पुरवासियों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है । अतः मुझे शीघ्र ही जाने की अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसे- श्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं; शीघ्र ही विमान मँगाओ— न खल्वेतन्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर । तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥ तुलसीदासजी कहते हैं— भरत सदृश को राम सनेही । जग जपु राम राम जपु जेही ॥

भाइयों के प्रति राम का कथन—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथिवी का राज्य तुम भाइयों के लिए ही चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य चाहता हूँ, यह मैं आयुध-स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुदमन के जो भी मेरा सुख हो, अग्निदेव उसे जलाकर भस्म कर दें— धर्ममर्थञ्च कामञ्च पृथिवीञ्चापि लक्ष्मण । इच्छामि भवतामर्थे एतत्प्रतिशृणोमि ते ॥ भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थञ्चापि लक्ष्मण । राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नञ्चापि मानद । भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतांशिखी ॥ राम का परम सुहृत्स्नेह श्रीराम के वनवासार्थ गङ्गातट पर पहुँचने पर निषादराज ने राम का पूर्ण स्वागत सत्कार किया और कहा—नाथ ! मेरा सारा राज्य आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी, हम सब आपके सेवक हैं। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, खाद्य पदार्थ तथा ये शय्याएँ एवं घोड़ों के लिये घास, चारा आदि सामग्री भी उपस्थित है। परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज के दिये गये भोजन, पानी आदि को ग्रहण नही किया, तथापि अपने व्यवहार तथा स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। उन्होने कहा—सुहृद्वर, आप मेरे समीप पैदल ही चले आये, आपके इस परमोत्कृष्ट प्रेम से हम अत्यन्त प्रसन्न एवं अर्चित हो गये हैं। अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं से निषादराज का निर्भर आलिङ्गन करते हुए राम ने कहा—प्रियवर ! हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ तथा प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे हैं। आपके मित्रों, वनों एवं राष्ट्र में कुशल तो है ? आप जो मेरे लिए लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार है, किन्तु मैंने वनचारी तपस्वी का व्रत धारण कर रखा है। इन व्रत के दिनों में मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण करके कन्द, मूल, फल अशन करता हूँ, अतः आप अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें । केवल घोड़ों के लिए चारा दाना मात्र ही मुझे अपेक्षित है। ये मेरे पिताजी के अत्यन्त प्रिय हैं। इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा । राम का शरणागतरक्षण व्रत विभीषण की शरणागति प्रसिद्ध है। भगवान् राम के सचिव सुहृद् सुग्रीव आदि विभीषण को शरण देने के विरुद्ध थे। वे कहते थे कि यह रावण का अनुज रावण का प्रणिधि बनकर हमारा भेद लेने या हममें फूट डालने, यदि मौका मिलें तो हममें से किसी पर सांघातिक प्रहार करने आया है। यदि रावण का प्रणिधि न भी हो, उसका विरोधी ही हो तो भी वह ग्राह्य नहीं है, क्योंकि ऐसे विपत्तिकाल में जो अपने सहोदर भाई का त्याग कर सकता है, अपने सगे भाई का अपना नहीं हुआ तो किसका विश्वस्त या आत्मीय हो सकता है। तस्मात् सर्वथा अग्राह्य है। भगवान् ने कहा—यदि वह प्रणिधि भी हो, हमारा भेद लेने आया हो तो भी वह रजनीचर हमारा सूक्ष्मातिसूक्ष्म भी अहित नहीं कर सकता। पृथिवी भर में जितने पिशाच, दानव, यक्ष तथा राक्षस हैं उन सभी का यदि इच्छा करूँ तो एक अङ्गुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ— पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥ ( वा० रा० ६।१८।२३ )

( १४ ) रन्ध्र मिलने पर विभीषण प्रहार कर सकता है, इस भीति को दूर कर शरणागत की रक्षा करना परमं धर्म है। राम ने कहा—सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आये हुए शत्रु-रूप व्याध का यथान्याय अर्चन किया और अपना मांस भोजन करने की उससे प्रार्थना की । जब कि इस प्रकार शरणागत भार्याहर्ता की तिर्यक् प्राणी ने भी उपेक्षा नहीं की तो मेरे सदृश सकल धर्मों के रहस्य को जाननेवाला क्षत्रिय अपकार न करनेवाले शरणा- गत की उपेक्षा कैसे कर सकता है ? सत्यवादी महर्षि कण्डु ने शरणागत रक्षा सम्बन्धिनी गाथा गायी है— हाथ जोड़े हुए दीनता से शरण मांगते हुए शत्रु को भी आश्रितरक्षणरूप परम धर्म की सिद्धि के लिए नहीं मारना चाहिये । इतना ही नहीं आर्त हो अथवा दृप्त हो जो भी शत्रुओं के भय से शरणागत हुआ हो, भले वह शत्रु ही क्यों न हो कृतात्मा प्राणी को चाहिये कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उसकी रक्षा करे । शरण में आया हुआ व्यक्ति यदि रक्षक की दृष्टि के सामने विनष्ट होता है तो वह अरक्षित अरक्षक का सब पुण्य लेकर चला जाता है । इस प्रकार प्रपन्न के अरक्षण से महान् दोष होता है । वह अस्वर्ग्य, अयशस्य और बलवीर्य का विनाशक है । अतः मैं कण्डु के धर्मिष्ठ, यशस्य तथा फलोदयकाल में स्वर्ग्य वचन का अवश्य पालन करूँगा । इसके अतिरिक्त मुझ परमदयालु राम का तो सर्वभूतों के लिए अभय प्रदान करना एक व्रत ही है । सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ सब प्राणियों के लिए अथच सब भूतों से भयभीत सभी प्राणियों के लिए अभय-प्रदान करना मेरा नित्य सत्सहज धर्म है । कोटि बिप्रबध लागे जाही। आये सरन तजहुँ नहि ताही ॥ भगवान् राम का कथन सुनकर आश्चर्य एवं सौहार्द से परिपूर्ण होकर सुग्रीव ने कहा—धर्मज्ञ, लोकनाथ- शिखामणे, आप सत्त्ववान् एवं सत्पथ में स्थित हैं अतः आपका ऐसा कल्याण भाषण आश्चर्यजनक नहीं है । आपका पुण्य कथन सुनकर मेरा भी अन्तरात्मा विभीषण को ग्राह्य मानने लगा । उसे शरण में लेने के विषय में पहले सबसे प्रमुख विरोधी सुग्रीव द्वारा रामसंनिधि में आनीत विभीषण के साथ राम की वैसी ही मित्रता हुई जैसी गरुड़ से इन्द्र की मैत्री हुई है । विभीषण ने राम के निकट आते ही राम के चरणों में गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा—भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः । भगवन्, सब भूतों के शरण्यभूत परमपुरुष आपकी शरण में आया हूँ । राम की सत्य प्रतिज्ञा श्रीरामजी ने अभय प्राप्ति के लिए उनकी (श्रीरामजी की) पुण्यसंनिधि में समागत दण्डकारण्यवासी ऋषियों के अभिरक्षण के लिए युद्ध में राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की थी । परन्तु श्रीसीता को बिना वैर पर-प्राणों का अभिहिंसन रुचिकर नहीं हुआ । इसी लिए ऐहिक सुख और पारलौकिक निःश्रेयस के लिए शस्त्रास्त्रों को अपने निकट न रखने का निवेदन करते हुए उन्होंने एक प्राचीन इतिहास श्रीरामजी को सुनाया । श्रीरामजी ने सीता के कथन की सर्वथा अति प्रशंसा कर कहा— हे सीते, मैं अपने जीवन का त्याग कर सकता हूँ एवं लक्ष्मण सहित तुम्हारा भी त्याग कर सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता— अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् । न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ॥

( ३५ ) सीता ने राम को परम धार्मिक, सत्यप्रतिज्ञ और पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले दृढ़व्रती कहा है । वह कहती हैं आप में धर्म और सत्य सब कुछ पुण्यताहेतु प्रतिष्ठित है । वाल्मीकिजी के द्वारा नारदजी से पूछे गये राम के गुणों में उन्हें धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ कहा गया है । राम के अपार चरित रामचरित का प्राचुर्य और उसकी पापराशिविनाशिता प्रसिद्ध है । इसी से कहा गया है— चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ रामचरित शतकोटि ( एक अरब ) श्लोकों में विस्तृत है, अर्थात् अपार है और उसके एक एक अक्षर में महापातकों के विनाश की क्षमता है । महाभारत, अष्टादशपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, देवीपुराण, भागवत, उपपुराण आदि की भी विशिष्ट फलश्रुतियाँ हैं किन्तु उनमें विष्णुचरित, शिवचरित, देवीचरित, गणेशचरित, सूर्यचरित का उत्कर्ष भी सोदाहरण दर्शाया गया है । रामचरित के प्रत्येक अक्षर में महापातकों को विनष्ट करने की अतुलशक्ति निहित है । रामनाम जितना जन-जन प्रख्यात है, उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण, वैकुण्ठ, माधव आदि देवताओं का नाम प्रख्यात न हो सका । पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वतीजी को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप विष्णु के हजार नामों के जप के बराबर होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने ! मैं अतिराम अर्थात् परशुराम का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ । राम रामेऽतिरामेऽतिरमे रामे मनोरमे । सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ “राम अनंत अनंतगुन अनंत कथा विस्तार” के अनुसार श्रीरामजी के अनन्त गुण हैं, उनका पार पाना संभव नहीं । कालिदास ने कहा है— महिमानं यदुत्कीर्यं तव संह्रियते वचः । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥ भगवन्, आपकी थोड़ी बहुत महिमा गाकर जो हम मौनावलम्बन करते हैं, उसका अर्थ यह नहीं है कि आपकी महिमा की इतिश्री हो गयी । उसका कारण हमारी थकावट अथवा अशक्ति है, गुणों की इयत्ता से हमारा मौनावलम्बन नहीं । पुष्पदन्ताचार्य कहते हैं— असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी । लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ भगवन् ! आपकी महिमा का लेखन यदि काले पहाड़ के समान मषी-स्याही हो और सिन्धुरूपी मषीपात्र में घोली जाय तथा कल्पवृक्ष की टहनी की कलम हो और सारी पृथिवी पत्र ( लेखाधार कागज का ताव ) हो एवं स्वयं शारदा ही सर्वदा रातदिन कल्पवृक्ष की शाखा लेकर आपके गुणों को लिखे तो भी आपके गुणों का, आपकी महिमा का पार नहीं पा सकती ।

( ३६ ) प्रस्तुत प्रस्तावना में जो कुछ लिखा गया है वह सब पूज्यपाद स्वामीजी द्वारा लिखित इस पुस्तक का प्रसाद है, जैसे गङ्गाजल के द्वारा ही भगवती गङ्गाजी की पूजा अर्चना होती है वैसे ही 'रामायण-मीमांसा' से संकलित कुछ अंशों को पाठकों के समक्ष प्रस्तावना के रूप में रखकर भगवान् राम के आदर्श से अनुप्राणित होनेवाले भक्तों के लिये पवित्र प्रयास किया गया है जिससे पाठक इस महान् ग्रन्थ की विषयवस्तु संक्षेप में अवगत कर सकें । इस ग्रन्थ के प्रकाशन में कुछ संस्थाओं एवं कुछ महानुभावों का जो योगदान हुआ है उसे हम भूल नहीं सकते । कलकत्ते की श्रीभक्तिसुधापरिषद् तथा आदरणीय श्री मोहनलालजी जालान का आर्थिक सहयोग विशेष उल्लेखनीय हैं । आदरणीय पं० श्री श्रीकृष्णपन्तजी शास्त्री साहित्याचार्य के अनवरत परिश्रम से ही ग्रन्थ का साङ्गोपाङ्ग सम्पादन भलीभांति सम्पन्न हो सका है । अतः ये सभी महानुभाव धन्यवाद के पात्र हैं । अन्त में रामायण-जगत् के माने जाने आधुनिक विद्वान् जो वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित सनातन सिद्धान्तों से विपरीत बातें जाने या अनजाने में अपनी लेखनी द्वारा भगवान् राम की कथा के प्रसङ्ग में प्रस्तुत करते हैं, उनके प्रति भी मैं अपना आभार प्रदर्शित किये बिना नहीं रह सकता जिनके कारण ही अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज द्वारा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम के चरित का विशद विवेचन 'रामायण-मीमांसा' के रूप में जनता- जनार्दन को प्राप्त हो सका है । रामायण के सम्बन्ध में अब तक जो भी शंकाएँ और समालोचनाएँ प्राप्त हो सकी हैं, उन सबका समाधान वेद-शास्त्रादि सिद्धान्तों के आधार पर आप इस ग्रन्थ से प्राप्त कर सकेंगे । अन्त में हम परमसुहृद अकारण दयालु भगवान् राम के चरणकमलों में नत-मस्तक होकर विनम्र प्रार्थना करते हैं कि कलिकाल में प्रसूत हम सभी प्राणियों को वे ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करें कि जिससे अपने युगल सीता-राम के चरणों में हमारी भक्ति और प्रीति दिनानुदिन बढ़ती रहे । श्याम सुन्दर धानुका

विषय-सूची प्रथम अध्याय परम ब्रह्मस्वरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य १-१४ श्रीसीताराम का अनुपम ऐश्वर्य १ श्रीसीता प्रेमसार-सर्वस्व श्रीराम की सौन्दर्यसार-सर्वस्व १ श्रीसीता श्रीराम की महाशक्ति एवं सर्वस्व १ सङ्गम और विरह में से विरह में ही प्रियतम की रोम-रोम में अनुभूति २ अभिन्नरूप श्रीसीता और श्रीराम की सेवाशिक्षाप्रदानार्थ भिन्नरूपता ३ सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य स्वीकार्य ४ अपौरुषेय वेद ही परमेश्वर का शाश्वत संविधान ४ वेदों का स्वतः प्रामाण्य ५ वेदावतार वाल्मीकिरामायण का अकुण्ठ प्रामाण्य ५ श्रीसीता-रामचरित की वेदमूलकता ६ वाल्मीकिरामायण में ही श्रीसीता-रामचरित का यथार्थ वर्णन ५ श्रीराम की महिमा के सम्बन्ध में महर्षि विश्वामित्र की उक्ति ८ महातेजा गौतम द्वारा अहल्या के साथ राम का पूजन ८ भगवान् परशुराम द्वारा त्रैलोक्यनाथ राम का स्तवन ८ महर्षि वसिष्ठ की सदुक्ति-लोक में ऐसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं जो राम के अनुव्रत न हो ९ पौरजनोक्ति—श्रीराम का अनुगमन कर रही सीता धन्या, कृतकृत्या ९ राम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि, प्रभु के प्रभु इत्यादि सुमित्रा के वचन ९ अगस्त्यजी द्वारा राम का पूजन और आतिथ्यसत्कार ९ महर्षियों, सिद्धों, देवताओं एवं गन्धर्वों की राम के प्रति शुभाशंसा ९ मारीच राक्षस द्वारा राम का मूर्तिमान धर्म, सत्यपराक्रम एवं सकललोकाधीश्वर के रूप में वर्णन १० अजेय श्रीराम के सम्बन्ध में रावण-प्रणिधि अकम्पन की ईश्वरोक्ति १० तारा की दृष्टि में राम साधुओं के निवास, आपदग्रस्तों के परम आश्रय, आर्तों के एकमात्र संश्रय एवं यश के महान् भाजन १० हनुमान् के अनुसार राम त्रिमूर्ति १० सूर्य से उसकी प्रभावत् सीता राम से अभिन्न १० रावण के गुप्तचर का राम की विष्णुरूपता कथन १२ यम, कुबेर, महेन्द्र, वरुण आदि द्वारा राम का विष्णुरूप में स्तवन १२

( २ ) द्वितीय अध्याय श्रीकामिल बुल्के की रामकथा १५-४८ वेद में राम के पूर्वजों का उल्लेख १५ वैदिक साहित्य में सीता १७ निर्विशेषण सीता और राम २९ स्यागरचर्चा २९ वेदों में सूत्रभूत वस्तुएँ ३० रामचन्द्रादि नामों की अनादिता ३० क्या देवता काल्पनिक हैं ? ३१ प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य की चर्चा ३२ शब्दार्थ-सम्बन्ध की अनादि परम्परा ३३ मीमांसकों का ज्ञानप्रामाण्य ३४ वेदमन्त्रों का स्वरूप निर्धारण ३४ मतभेद, असमन्वय और कालभेद ३५ सीता के नामों की गणना ३५ उत्तरोत्तर विकास का सिद्धान्त निस्सार ३५ रामायणीय राम और वैदिक राम ३६ पदार्थ-निर्णय में वाक्यशेषों का महत्त्व ३६ वैदिक साहित्य में रामकथा की सामग्री ३६ पाठसम्बन्धी विवेचना ४२ महाभारत प्रथम या रामायण प्रथम ४५ असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद ४५ उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता ४६ वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ ४६ तृतीय अध्याय पाठ-भेदादि समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ४९-८२ पाश्चात्यों का रोग—उनकी दृष्टि में ईसा के पूर्व सभ्यताविकास असम्भव ५० कुश और लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदयकालुष्यद्योतन ६१ वाल्मीकि ही भार्गव ६२ दस्यु वाल्मीकि ६३ पौर्वा-पर्यविरोध का समाधान ६७ महाभारत और रामायण ६७ भारत और महाभारत की कल्पना निर्मूल ६८ प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि ७१

( ३ ) आर्षज्ञानसम्पन्न वाल्मीकि की व्याकरणज्ञता अनुपपन्न नहीं ७४ वाल्मीकि के पूर्वजन्म की ( वल्मीक से उत्पत्ति के पूर्व की ) विभिन्न कथाओं का समन्वय ७४ वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिये पौराणिकों ने उनके सम्बन्ध में विविध कथाएँ गढ़ लीं, यह कथन निराधार ७७ यह कल्पना वेद, पुराण, महाभारत आदि के सर्वथा विरुद्ध ७८ अतीत घटनाओं के विषय में प्रामाणिक इतिवृत्त ही प्रमाण, अटकलबाजी विपरीत दिशा की प्रापक ७८ वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि महर्षियों के ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना निराधार ७८ महाभारत जिस विषय में मौन हो उसमें स्कन्दपुराणादि की बात स्वीकारने में कोई दोष नहीं कभी का दस्यु कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है ७९ वाल्मीकि वैदिक काल के राम के समकालिक होते तो उन्हें वैदिक भाषा में ही अपनी रचना करनी चाहिये थी, यह कथन निस्सार है, क्योंकि वैदिक काल कोई खास काल नहीं ८१ वैदिक काल में संस्कृत भाषा और उससे भिन्न मानुषी भाषा की सत्ता में प्रमाण ८१ चतुर्थ अध्याय वाल्मीकिरामायण और महाभारतरामोपाख्यान ८३-९८ महाभारत-रामोपाख्यान रामायण का स्रोत नहीं रामायण ही रामोपाख्यान का स्रोत ८४ महाभारत का रामोपाख्यान ८५ रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का वर्णन ८५ पुलस्त्य-वंश वर्णन ८५ रावण के उत्पात से त्रस्त देवताओं का ब्रह्मा से निवेदन ८६ ब्रह्मा की प्रार्थना से महाराज दशरथ के यहाँ भगवान् विष्णु का राम रूप में अवतार ८६ भगवान् राम के असाधारण सर्वलोकरञ्जक विशिष्ट गुण ८६ राज्याभिषेक की तैयारी करने पर रानी कैकेयी द्वारा विघ्न उपस्थित करने से राम का पिता की सत्यरक्षा के लिये वनगमन ८६ राम-वनगमन से प्रिय पुत्र के वियोग के कारण दुःखित राजा का देहान्त ८६ भरत द्वारा माता की भर्त्सना कर श्रीराम को लौटालाने के लिए सपरिकर राम के निकट वन गमन ८७ राम का प्रेमपूर्वक समझाबुझा कर भरत को लौटा देना ८७ श्रीराम का पुनः पौरों के आगमन की शङ्का से गोदावरी तट पर गमन ८७ शूर्पणखा के कारण खर से महान् वैर ८७ धर्मवत्सल राम द्वारा राक्षसों का वधकर दण्डकारण्य को धर्मारण्य बना देना ८७ विकृतानना शूर्पणखा का लङ्का जाकर भ्राता रावण के चरणों में मूच्छित हो गिर पड़ना ८७ क्रोधमूच्छित रावण का शुष्करुधिरानना शूर्पणखा से विकृतकारी के विषय में प्रश्न ८७ शूर्पणखा का रामविक्रम और खरदूषण सहित राक्षसों का पराभव बतलाना ८७ रावण का मारीच के निकट गमन, मारीच का रावण के आगमन का उद्देश्य जानकर उसे विरत करने का प्रयत्न ८७ रावण के हठ पर कनकमृग बनकर सीता के निकट जाना ८७

( ४ ) सीता के अनुरोध पर सीता की रक्षा में लक्ष्मण को नियुक्त कर राम का मृग पकड़ने जाना ८७ कनकमृग का कभी अन्तर्हित कभी प्रकट हो राम को बहुत दूर ले जाना ८७ राक्षस जान राम द्वारा अमोघ बाण मारने पर रामस्वर के तुल्य हा सीते, हा लक्ष्मण, चीखकर उसका धराशायी होना ८७ राम के अनिष्ट पर रोती हुई हतबुद्धि सीता का लक्ष्मण के प्रति शङ्का करना ८७ यतिवेष में प्रच्छन्न रावण का सीतापहरण ८८ जटायु के साथ रावण का युद्ध ८८ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार ८८ सीता की खोज में आगे बढ़ने पर कबन्ध से भेंट ८८ दोनों भ्राताओं द्वारा कबन्ध का वध ८८ शापमुक्त विश्वावसु गन्धर्व से सीतापहरणकर्ता का पता जान राम का पम्पातट पर गमन ८८ राम और लक्ष्मण का परिचय जानने के लिए सुग्रीव का हनुमान् को भेजनां ८९ हनुमान् से सुग्रीव का वृत्त जानकर राम का सुग्रीव के निकट गमन ८९ सुग्रीव और बाली का युद्ध ८९ राम द्वारा बाण से वाली का वध ८९ रावण का सीता को नन्दनोपम अशोक वाटिका में राक्षसियों के पहरे में रखना ८९ भीषण राक्षसियाँ सीता का तर्जन करतीं और कहतीं हम तुझे तिल-तिल कर खा जायेंगी । तू हमारे स्वामी की अवहेलना कर रही है ८९ सीता कहतीं—आर्याओ, मुझे खा जाओ नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन का मोह नहीं—त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना ८९ त्रिजटा का स्वप्न ९० भर्तृशोकाकुला दीना मलिनवसना पतिव्रता सीता को रावण ने देखा ९० पतिप्राणा सीता के सम्मुख रावण की दाल न गली ९० रावण का अपना अनुपम ऐश्वर्य बखान कर सीता के प्रलोभन का असफल प्रयास ९० शुभानना सीता ने मुख फेर कर और बीच में तृण रखकर कहा—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनी हैं। मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं सर्वथा अलभ्य हूँ, तुम मेरी ओर से मन हटा लो । ९० रावण का सीता की फटकार सुनकर चला जाना ९० माल्यवान् पर्वत पर वर्षाऋतु बिताकर-शरत्काल के आगमन पर श्रीराम की सीताविषयक स्मृति का उद्बोधित होना ९१ श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—वत्स, देखो तो सुग्रीव ग्राम्यधर्मों से प्रमत्त हो कृतघ्न तो नहीं हो गया ? ९१ सक्रोध लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचे, सुग्रीव ने कहा मैंने विनीत वानर सीतान्वेषणार्थ विभिन्न दिशाओं में भेज दिये हैं, उनके लौटने का समय सन्निहित है ९१ पवनात्मज आदि द्वारा मधुवन विध्वंस की खबर से सुग्रीव का कार्यसिद्धि का अनुमान ९१ सीतान्वेषणार्थ दक्षिण की ओर गये हुए ऋक्ष और वानरों से राम के पूछने पर हनुमान् ने कहा— मैंने आर्या सीता के दर्शन किये ९२

( ५ ) यात्रा की तथा लङ्का में सीता दर्शन की सब बातें संक्षेपतः कहीं— लङ्का दहन एवं कई राक्षसों के हनन की बात भी कही ९२ शुभ मुहूर्त में सेना का व्यूह बनाकर सबका लङ्का की ओर प्रस्थान ९२ समुद्रलङ्घन का प्रश्न आने पर समुद्र ने स्वप्न में राम से कहा—मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता। नल जिस पत्थर आदि को मुझपर रखेगा उसे मैं धारण करूँगा ९२ नल द्वारा सेना की सहायता से १० योजन चौड़े तथा १०० योजन लम्बे पुल का निर्माण ९२ शुक और सारण नाम के रावणचरों के तोह लेने आने पर उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया ९२ अङ्गद का दूत के रूप में रावण के दरबार में जाना और निर्भय होकर राम का सन्देश सुनाना ९३ वायुवेग वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार का तुड़वा देना ९३ वानरों का शिविर में प्रवेश करने पर राक्षसों द्वारा उनपर हमला करना ९३ सदलबल रावण का स्वयं युद्धभूमि में आना, श्रीराम के साथ घमासान युद्ध ९३ कुम्भकर्णवध ९३ इन्द्रजित् का रणक्षेत्र में आगमन, इन्द्रजित् का लक्ष्मण से घमासान युद्ध ९४ इन्द्रजित् द्वारा राम और लक्ष्मण को वरदान प्राप्त बाणों से चारों ओर से बाँध देना ९४ विशल्या ओषधि से दोनों क्षणभर में स्वस्थ और युद्धार्थ सन्नद्ध ९४ लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजित् का वध ९४ मातलि द्वारा आनीत रथ पर आरूढ़ होकर राम का रावण पर आक्रमण ९४ राम और रावण का अनुपम युद्ध, अन्त में राम ने रावण को धराशायी कर दिया ९५ रावण के मरने पर महर्षियों सहित देवताओं द्वारा राम पर पुष्पवृष्टि ९५ सीता के प्रति राम की शङ्का एवं वायु, अग्नि आदि देवताओं तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की विशुद्धि ९५ का वर्णन ९५ पञ्चम अध्याय बौद्धों तथा जैनों द्वारा विकृत रामचरित ९९-१७८ दशरथजातक की कथा ९९ अनामकजातक की कथा १०० दशरथकथानक की कथा १०१ राम की कहानी राम की जबानी १०२ छद्ममयी नीति से भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा राम का आधुनिक नास्तिक युवक के तुल्य चित्रण १०२ उक्त पुस्तक न राम की कहानी है और न राम द्वारा कही ही गयी है। वह मिथ्या वासुदेव निरी- श्वरवादी बौद्ध आनन्द कौसल्यायन के मस्तिष्क का फितूर है। उसमें छद्ममयी नीति का आश्रयण करते हुए वेदशास्त्रविरुद्ध, रामायणविरुद्ध अनेक अनर्गल कल्पनाएँ उल्लिखित हैं १०२ विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का-वध कर डाला, क्योंकि पिताजी की आज्ञा थी कि विश्वामित्र की हर बात का पालन करना, वाल्मीकि रामायण में कहीं ऐसा उल्लेख न होने पर कौसल्यायन का मिथ्या भाषण का यह एक नमूना १०५

( ६ ) परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा यह कैसा धर्मबन्धन था, यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था आदि अनार्य शब्द कहलाना कौसल्यायन का चरम अनौचित्य १११ इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही शायद कोई एक आध बात सत्य निकले प्रायः सब बातें मनगढ़न्त दुष्कल्पनापूर्ण हैं ११२ जैन-मत में रामकथा १२८ विमल सूरि आदि का काल १२९ पउमचरियं की विस्तृत रामकथा १२९ अनेक जैन लेखकों द्वारा लिखित विकृतिमय रामकथा १३० रावणचरित १३० रावण-बालि-संघर्ष १३० धर्मान्तरण १३७ जैन अग्नि परीक्षा पुस्तक का परिचय १४५ बिना अपवाद के भी अग्नि-परीक्षा सम्भव १४७ वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि १५५ वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६० राम पर बहुपत्नीत्वारोप सर्वथा निराधार १६१ बौद्ध जातक साहित्य की रामकथाओं पर विचार १६३ शाक्यों की उत्पत्ति १६८ कोलियों की उत्पत्ति १६८ जयद्दिसजातक की कथाएँ १७२ सामजातक रामायण की प्रतिच्छाया १७२ वेस्संन्तरजातक १७३ संबुलाजातक १७४ महासुतसोमजातक १७५ जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने सामग्री ली दिनेशचन्द्र सेन के इस मत की प्रमाणशून्यता १७५ जातकों में रामकथा से सम्बन्धित सामग्री १७६ रामायण का आधार गाथाओं में ढूँढना व्यर्थ, उसके आधार प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्य— बुल्के का मत १७६ वाल्मीकि रामायण के आधार के सम्बन्ध में दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान १७७ डॉ० ह्वीलर का मत १७७ राक्षस बौद्ध नहीं थे—बुल्के का मत १७७ दिनेशचन्द्र सेन तथा डॉ० ह्वीलर के मतों का बुल्के द्वारा खण्डन १७७ वेद-प्रामाण्यबाधक होने के ही कारण चोरतुल्य बौद्धादि नास्तिक दण्डनीय कहे गये हैं १७८ षष्ठ अध्याय रामायण के मूल स्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १७९–२२२ डॉ० बेबर का मत १७९ डॉ० याकोबी का मत १७९

( ७ ) डॉ० हाप्किन्स का मत १८१ डॉ० वान नेगैलैन का मत १८१ डॉ० दिनेशचन्द्र का मत १८२ रामायण के मूल स्रोत वेद तथा उपनिषद् १८२ जैन साहित्य में उपलब्ध रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर आधारित १८३ बौद्ध लङ्कावतारसूत्र १८३ दीपवंश तथा महावंश सिंहल द्वीप के प्राचीनतम ऐतिहासिक काव्यों में रामकथा १८३ वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८८ वेदावतार वाल्मीकिरामायण में ईश्वर, देवता, राक्षस, असुर तथा ईश्वरावतार आदि का वर्णन वेदसंमत १९१ नाना अलङ्कारों से विभूषित कामरूपी रावण के सुन्दर रूप का वर्णन १९२ उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ महर्षि विश्वामित्र का राम को विष्णु का अवतार कहना २०० वलगर्वित रावण के वधार्थ देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में अवतार २०१ राम की अतुल सामर्थ्य का ऋषि, मुनि, देव, राक्षस, मानव आदि अनेकों द्वारा मुक्तकण्ठ से वर्णन २०२ राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, उनके लोकशिक्षार्थ मनुष्योचित कर्म युक्तियुक्त २०६ परब्रह्मरूप विष्णु इन्द्र की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठतम २१८ राज्यच्युत इन्द्र को पुनः राज्य में प्रतिष्ठित करने के लिए ही विष्णु का वामन (इन्द्रानुज) के रूप में अवतार २१९ तैत्तिरीयसंहिता की इन्द्रवृत्रविषयिणी आख्यायिका से विष्णु ही इन्द्र की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं और इन्द्र की सहायता करते हैं यह सिद्ध है २२१ विष्णु की परमेश्वरता एक नहीं बोसियों वैदिक मन्त्रों से सिद्ध २२२ सप्तम अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२३-२४८ वेद और वेदान्त के रहस्य से अनभिज्ञ पाश्चात्यों की नाराशंसी गाथा सम्बन्धी कल्पना अशुद्ध और निराधार २२३ नरों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी २२३ वेदमन्त्र नाराशंसी गाथाओं के गान में सूत का अधिकार नहीं २२३ पौराणिक गाथाओं के गान में सूत का भी अधिकार २२४ गाथाएँ वैदिक और लौकिक अनेक प्रकार की हैं २२४ रामायण प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्यों पर निर्भर—बुल्के २२७ बुल्के का उक्त कथन रामायणविरुद्ध २२८ बालकाण्ड के अनुसार नारदोपदिष्ट मूलरामायण तथा ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा रामायण के आधार २२८

( ८ ) हरिवंश की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास पुराण प्रसिद्ध गाथाओं से ही २२८ हरिवंश यदि मान्य है तो तदनुसार राम का विष्णुत्व मान्य होना चाहिये २२८ हरिवंश में राम का ईश्वर हरि के अवतारत्वेन वर्णन २२८ सीता का लक्ष्मी के अवतारत्वेन वर्णन २२८ इक्ष्वाकु-वंश में रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति—बुल्के २२९ ‘इक्ष्वाकूणामिदं तेषाम्’ श्लोक का अर्थ है—महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में रामायणरूप महान् आख्यान की उत्पत्ति हुई न कि बुल्के द्वारा उक्त अर्थ २२९ महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व का संक्षिप्त रामचरित आख्यान काव्य पर निर्भर प्रतीत होता है, बुल्के का यह कथन असङ्गत २२९ महाभारत के बहुत पहले आर्ष वाल्मीकिरामायण के रहते उसे भुलाकर अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक उपाख्यानों को आधार मानना तर्कविरुद्ध २२९ वैदिक काल के बाद चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठीं शती में रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी यह कथन निष्प्रमाण २२९ रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण २२९ रामायण का निर्माण आर्ष-विज्ञान के आधार पर न कि आख्यानों के आधार पर २२९ आदि रामायण नाम की कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं २३० उपलब्ध समग्र बालकाण्ड प्रामाणिक उसके बिना रामायण की अपूर्णता २३२ वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर उसके गाने का आदेश दिया, उनमें कुश और लव ( सीता-पुत्र ) मुख्य २३३ कुश और लव काव्योपजीवी नहीं, रामपुत्र एवं सीतापुत्र २३४ निर्वासित सीता के करुण क्रन्दन से करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोकरूप में परिणत २३५ सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापनार्थ समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से गुप्त और प्रकट निखिल वृत्त जानकर रामायण का निर्माण २३६ कुश और लव का चमत्कारपूर्ण रामायण-गान २३७ कुश और लव का स्व-पुत्ररूप में राम को परिचय २३८ देवता, ऋषि, महर्षि, राजा, प्रजा आदि की महती सभा में सीता का प्रत्यय प्रदान २३९ माधवी देवी का प्राकट्य, सीता को सादर सिंहासन पर बैठा कर रसातल प्रवेश २४० अपने अमर महाकाव्य के निर्माण द्वारा आदि कवि सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापन में पूर्ण सफल २४१ कुश और लव के रूपसौन्दर्य, स्वरमाधुर्य, सङ्गीतकौशल आदि अपूर्व गुण २४१ नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ के यथार्थ ज्ञाता राम २४२ मत्स्य, कूर्म, वराह तीनों अवतार आरम्भ में प्रजापति के माने जाते थे, विष्णु का महत्त्व बढ़ने से विष्णु के माने जाने लगे । बुल्के के ये विचार भारतीय ग्रन्थों की वास्तविकता न जानने के दुष्परिणाम २४६ भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता २४७ विकासवादियों के विकासवत् मनुष्यमात्र राम में ईश्वरत्व का विकास नहीं हुआ, अनन्त कल्याण गुणगणास्पद राम में ईश्वरत्व परब्रह्मत्व स्वाभाविक २४७

( ९ )

रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा मर्यादामयी लीलाओं के कारण २४७ अनन्तगुण राम के गुणों का वर्णन अपनी शक्ति के अनुसार ब्रह्मादि तथा साधारण जन करते हैं पर उनका अन्त कोई नहीं पाता २४८

अष्टम अध्याय

अवतार-सामग्री २४९-२८७ शतपथ ब्राह्मण के वचनों से मत्स्यावतार की सिद्धि २४९ महाभारत के वचनों द्वारा कूर्मावतार का वर्णन २४९ महाभारत के ही वचनों द्वारा परशुराम, राम, बलराम, कृष्ण तथा हंस, कूर्म, मत्स्य आदि अव- तारों का वर्णन २५० भगवान् विष्णु ही प्रजापति, ब्रह्मा आदि शब्दों से उक्त २५१ मत्स्य, कूर्म, वराह आदि विष्णु के ही अवतार २५१ शास्त्रों के आधार पर ही विष्णु का महत्त्व, वह किसी की इच्छा या भावना से घटता या बढ़ता नहीं २५१ महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक (अभिन्न) मानकर मत्स्यादि सब अवतार विष्णु के उक्त ही हैं फिर हठधर्मिता क्यों ? २५१ ब्राह्मण ग्रन्थों तथा प्राचीन साहित्य में अवतारवाद के विद्यमान होने पर भी उन ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो उनकी पूजा होती थी और न विष्णु का प्राधान्य ही था, यह कथन असंगत २५२ यज्ञ-यागों में देवताओं के रूप में प्रजापति तथा विष्णु का उल्लेख मौजूद कई स्थलों पर विष्णु और इन्द्र का साथ २ देवत्व एवं कई स्थलों पर विष्णु का प्राधान्य २५२ ब्राह्मणों द्वारा भागवतों के इष्टदेव कृष्ण को नारायणावतार मान लेने से अवतारवाद को प्रोत्साहन उससे विष्णु के महत्त्व की वृद्धि एवं अवतार की सारी भावना विष्णु पर केन्द्रित आदि कथन निष्प्रमाण २५२ नारायणीयोपाख्यान, भागवत तथा रामायण में वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का प्रभूत महत्त्व वर्णित होने से भागवतों के भक्तिसम्प्रदाय को बौद्धों के तुल्य वेद, यज्ञ और ब्राह्मण विरोधी समझना निरी भ्रान्ति २५३ विष्णुपुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मण सम्प्रदाय की स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं, किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थोपबृंहण या वेदभाष्यरूप में रचित २५३ पहली शती ई० पू० से रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी, रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत, वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों की तालिका में राम के नाम का अस्तित्व, यह कथन नितान्त भ्रम तथा दुरभिसन्धिपूर्ण, क्योंकि वेदों, उपनिषदों में अनादिकाल से रामावतार तथा उनकी उपासना वर्णित २५३ भारतीय साहित्य के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नहीं, किन्तु अनन्तानन्त ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रों की राम के अंश से उत्पत्ति २५४

( १० ) भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ, यह कथन सर्वथा असंगत, क्योंकि वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि २५५ श्रीराम ने सेतुबन्धन पर रामेश्वर शिवलिङ्ग की पूजा की, शिवपूजा की प्राचीनता का यह सर्वोत्कृष्ट प्रमाण २५७ श्रीराम का अतुलित सर्वोत्कृष्ट, यश, ऐश्वर्य और माहात्म्य २५८ श्रीरामनाम का अनुपम माहात्म्य २५८ रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध आपत्तियों से निस्तार पाता है एवं ऐश्वर्यवान् और पुत्रवान् होता है २५९ राम का स्तवन तथा दर्शन अमोघ एवं ऐहिक और पारलौकिक सुख का मूल २६० विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा अग्निपुराण अर्वाचीन नहीं वेद एवं पुराण अनादि, अपौरुषेय वेदों की अनुपूर्वी नहीं बदलती, किन्तु पौरुषेय पुराणों की अनुपूर्वी में विभिन्न कल्पों में परिवर्तन सम्भव २६० सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं २६३ अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थों का ही प्रामाण्य। अद्भुतरामायण द्वारा वर्णित उस घटना के अभाव में प्रमाणाभाव २६३ भारतीय भक्ति का इतिहास अतिप्राचीन काल से ही वेदों में वर्णित २६४ भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति २६४ उत्तररामचरित, जानकीहरण हनुमन्नाटक आदि में ही नहीं—वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकि रामायण में भक्तिभावना से ही रामचरित-वर्णन २६५ अध्यात्मरामायणवर्णित राम की बाललीला पर कृष्ण-बाललीला का प्रभाव नहीं २६५ रामायण के राम, भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही तत्त्व २६७ हरिवंश का काल ई० सन् ४०० के आसपास नहीं, महाभारत का काल ही उसका काल, क्योंकि वह महाभारत का खिल है २६७ भागवत का काल छठीं अथवा सातवीं शती नहीं। महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के अनन्तर भी जब व्यासजी का चित्त प्रसन्न नहीं हुआ तब नारदजी के परामर्श से उन्होंने भागवत की रचना की, अतः महाभारत के आसपास का काल ही उसका काल २६८ कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय, ७वीं ई० शती नहीं २६९ महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्त्तारूप से व्यास की प्रसिद्धि २७० लिङ्गपुराण को १०वीं शती ई० का मानना पूर्ववत् भ्रान्ति २७० वामनपुराण भी व्यास-कृति होने से अर्वाचीन नहीं २७१ प्रचलित नारदीय पुराण को १०वीं शती का कहना अनर्गल कल्पना २७१ पुराणों में प्रमुख स्कन्दपुराण प्रसिद्ध व्यासकृति ई० सन् से ३५०० वर्ष पूर्व रचित २७३ पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचना काल पृथक्-पृथक् कहना और उसके प्रचुररामकथासम्बन्धी सामग्रीवाले पातालखण्ड को १२वीं शती का कहना अटकलबाजी २७४ उपपुराण भी पुराणों के समसामयिक ही हैं उनका रचनाकाल, जो बुल्के ने निर्धारित किया है, अशुद्ध है २७५ पुराणों के लक्षण, नाम तथा श्लोक संख्या का विभिन्न पुराणों के अनुसार वर्णन २७८

( ११ ) काशीकेदारमाहात्म्य का कथन है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी अनादि एवं भगवान् के श्वासस्वरूप हैं, वे कभी मलिन और कभी विशद हो भगवान् की प्रपञ्चलीला का वर्णन करते हैं २८३ योगवासिष्ठ वाल्मीकिकृत होने से वाल्मीकिकालिक ही २८४ अध्यात्मरामायण व्यासकृत होने से ई० सन् से ३५०० वर्ष पूर्व का २८५ अद्भुतरामायण अति प्राचीन है, अर्वाचीन नहीं २८६ आनन्दरामायण की रचना का काल १५वीं शती कदापि नहीं, रामचरित वर्णन में पर्यवसित यह शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अङ्ग एवं प्रामाणिक है २८६ नवम अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव और महत्त्व का वर्णन २८८-३११ सम्राट् दिलीप की गोसेवा का वर्णन २९० नीति, प्रीति और परमार्थ के रहस्यज्ञ श्रीराम २९२ रावण गृहोषिता सीता के परिग्रह में कतिपय जनों की ही विप्रतिपत्ति २९२ सीतात्याग २९३ सीता के अनुपम उज्ज्वल चरित एवं पातिव्रत्य का प्रभाव २९६ राम द्वारा त्यागने पर भी पतिव्रता सीता की राम के प्रति अतीव उच्च धारणा २९७ रघुवंश के अनुसार रघुवंशी राजाओं की नीतिमत्ता २९९ तत्त्वसंग्रहरामायण आदि की प्राचीनता ३०३ कालनिर्णयरामायण की प्राचीनता ३०४ रामायण का वेदावतारत्व आदि महत्त्व ३०५ जैमिनिभारत की प्राचीनता ३०६ सत्योपाख्यान अर्वाचीन नहीं ३०७ धर्मखण्ड स्कन्दपुराण का अंश होने से व्यास कृति मानना ही उचित ३०८ हनुमत्संहिता की कथावस्तु शुद्ध वैदिक सिद्धान्तों पर आधारित ३०९ बृहत्कोशलखण्ड में वर्णित कथावस्तु को कृष्णलीला का अनुकरण कहना निराधार ३०९ हिन्दुत्व में वर्णित रामायणों में रामकथा ३१० दशम अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में वर्णित रामकथा ३१२-३२२ महाकाव्यों में निरूपित रामचरित ३१२ नाटकों में वर्णित रामकथाएँ ३१३ स्फुट काव्यों में वर्णित रामकथा ३२० कथासाहित्य में विस्तृत रामकथा के वर्णन का अभाव ३२१ चम्पूरामायण आदि चम्पूकाव्यों में रामकथा का वर्णन ३२२

( १२ ) एकादश अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा ३२३-३३२ द्रविड़ भाषाओं के साहित्य में रामकथा ३२३ तमिलरामायण में रामकथा ३२३ तेलुगुरामायण में रामकथा ३२३ मलयालम में रामचरितसाहित्य ३२४ कन्नड़रामायण में रामकथासाहित्य ३२४ आदिवासियों में प्रचलित रामकथाएँ ३२४ नेपालीसाहित्य में रामकथा ३२५ सिंहलीरामकथा ३२५ काश्मीरीरामायण में रामकथाविस्तार ३२६ असमीयासाहित्य में रामकथा ३२६ बङ्गालीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ उड़ियासाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२८ गोस्वामी तुलसीदास वर्णित हिन्दीसाहित्य में रामकथा ३२८ तुलसीभिन्न हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२९ मराठीसाहित्य में रामकथा ३३० सीतास्वयंवर ३३१ गुजरातीसाहित्य में रामकथा ३३१ उर्दू तथा फारसीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३३२ द्वादश अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३३३-३७२ तिब्बती रामायण ३३३ खोतानी रामायण ३३३ हिन्देशिया की प्राचीनतम रामकथा ३३४ हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा ३३४ मलयन की अर्वाचीन रामकथा ३३४ जावा की अर्वाचीन रामकथा ३३६ हिकायत सेरीराम में वर्णित रामकथा ३३६ पातानी रामायण ३३७ जावा के सेरतकाण्ड की रामकथा ३३७ हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश की रामकथा ३३८ हिन्दचीन के रूमेरसाहित्य की सर्वाधिक कलात्मक रचना रामकेर्ति में रामकथा ३३९

( १३ ) श्यामदेश के रामकियेन की विस्तृत रामकथा ३३९ ब्रह्मदेश का रामकथासाहित्य ३६९ पाश्चात्य वृत्तान्त— ३६९ पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा ३६९ रसियन भाषा में रामकथा ३७२ त्रयोदश अध्याय बालकाण्ड ३७३-४५५ देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना ३७३ दशरथ-वंशावली ३७४ दशरथ के पूर्वजन्म की चर्चा ३७५ दशरथ-विवाह ३७५ दशरथ की सन्तति ३७८ शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री, रोमपाद की दत्ता पुत्री ३७९ अहल्योद्धार ३८३ अहल्या की स्थिति ३९२ गौतम द्वारा इन्द्र को प्रदत्त शाप के कई रूप ३९३ अहल्या की क्षमा प्रार्थना ३९९ गौतम का अहल्या को शाप देना तथा अहल्या की प्रार्थना पर शाप के अन्त का विधान ३९९ राम-परशुराम-संवाद ४०४ वैष्णव तेज, का परशुराम-देह से निकलकर राममुख में प्रवेश ४०७ अवतारवाद ४०८ अवतारवाद का विकास ४१० प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था—बुल्के का विभ्रम ४२८ राम का बालचरित ४२९ भुशुण्डि-चरित ४३२ राम के प्रारम्भिक कृत्य ४३३ राम-सीताविवाह ४३७ विवाहोत्सव ४४१ विवाहकालिक राम की अवस्था ४४१ सीता का पूर्वराग ४४२ अयोनिजा सीता ४४४ पद्मजा सीता ४५२ रक्तजा सीता ४५३

( १४ ) चतुर्दश अध्याय अयोध्या काण्ड ४५६-४७१ उदीर्ण रावण के वधार्थी देववृन्द की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में प्राकट्य ४५६ राम के विविध उत्तम गुणगण ४५६ मेदिनी की राम को पतिरूप में वरण करने की इच्छा ४५७ अयोध्याकाण्ड के प्रथमसर्ग को प्रक्षिप्त कहना निराधार ४५८ बालकाण्ड की प्रक्षिप्तता का खण्डन ४५८ राम का अयोध्या न लौटने का दृढ़ निश्चय ४६० पादुकाओं का वृत्तान्त ४६६ काकवृत्तान्त ४६७ राम का वनगमन ४६७ रामवनगमन के कारणों के विषय में अनेक रामायणों के अनेक मत ४६७ कौशल्या का रामबिछोहजनित दुःखावेश में अपने पूर्वजन्म के अनेक पापों की कल्पना करना ४६७ कैकेयी को वर-प्राप्ति का वृत्तान्त ४६९ कैकेयी का दोष निवारण ४७० मन्थरा के सम्बन्ध में विविध कथाएँ ४७१ पञ्चदश अध्याय अरण्यकाण्ड ४७२-५०३ अयोमुखीवृत्तान्त का दाक्षिणात्य पाठ में ही अस्तित्व ४७२ इन्द्र का सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त दाक्षिणात्य पाठ में प्रक्षिप्त तथा अन्य पाठों में अप्रक्षिप्त ४७२ याकोबी के आदिरामायण में चित्रकूटप्रस्थान के बाद अरण्यकाण्ड के आरम्भ का वर्णन, तदनन्तर पञ्चवटी आगमन का वर्णन ४७२ राम को जटायु का परिचय पहले न था पूर्वपक्ष का खण्डन ४७२ परम आस्तिक राम का ऋषियों से मिलन अत्यावश्यक ४७३ अनसूया-सीता-संवाद प्रक्षिप्त नहीं ४७३ प्रिय अतिथि राम के दर्शन किये बिना शरभङ्ग ऋषि की ब्रह्मलोकगमन की अनिच्छा ४७३ महर्षि अगस्त्य के समीप पहुँचकर राम का उन्हें प्रणाम करना उचित ४७३ लक्ष्मण का संयम ४७३ विश्वामित्र की वला और अतिबला विद्याओं के कारण क्षुधा और पिपासा की बाधा की निवृत्ति ४७४ बला और अतिबला राम के साथ लक्ष्मण को भी प्राप्त ४७४ लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता पिता मानते थे ४७५ भारतीय संस्कृति और संस्कृत से अपरिचित बुल्के का अनेक स्थलों पर अर्थावगति में प्रमाद ४७५ लक्ष्मण की सेवापरायणता ४७५