रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) डॉ० हाप्किन्स का मत १८१ डॉ० वान नेगैलैन का मत १८१ डॉ० दिनेशचन्द्र का मत १८२ रामायण के मूल स्रोत वेद तथा उपनिषद् १८२ जैन साहित्य में उपलब्ध रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर आधारित १८३ बौद्ध लङ्कावतारसूत्र १८३ दीपवंश तथा महावंश सिंहल द्वीप के प्राचीनतम ऐतिहासिक काव्यों में रामकथा १८३ वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८८ वेदावतार वाल्मीकिरामायण में ईश्वर, देवता, राक्षस, असुर तथा ईश्वरावतार आदि का वर्णन वेदसंमत १९१ नाना अलङ्कारों से विभूषित कामरूपी रावण के सुन्दर रूप का वर्णन १९२ उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ महर्षि विश्वामित्र का राम को विष्णु का अवतार कहना २०० वलगर्वित रावण के वधार्थ देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में अवतार २०१ राम की अतुल सामर्थ्य का ऋषि, मुनि, देव, राक्षस, मानव आदि अनेकों द्वारा मुक्तकण्ठ से वर्णन २०२ राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, उनके लोकशिक्षार्थ मनुष्योचित कर्म युक्तियुक्त २०६ परब्रह्मरूप विष्णु इन्द्र की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठतम २१८ राज्यच्युत इन्द्र को पुनः राज्य में प्रतिष्ठित करने के लिए ही विष्णु का वामन (इन्द्रानुज) के रूप में अवतार २१९ तैत्तिरीयसंहिता की इन्द्रवृत्रविषयिणी आख्यायिका से विष्णु ही इन्द्र की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं और इन्द्र की सहायता करते हैं यह सिद्ध है २२१ विष्णु की परमेश्वरता एक नहीं बोसियों वैदिक मन्त्रों से सिद्ध २२२ सप्तम अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२३-२४८ वेद और वेदान्त के रहस्य से अनभिज्ञ पाश्चात्यों की नाराशंसी गाथा सम्बन्धी कल्पना अशुद्ध और निराधार २२३ नरों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी २२३ वेदमन्त्र नाराशंसी गाथाओं के गान में सूत का अधिकार नहीं २२३ पौराणिक गाथाओं के गान में सूत का भी अधिकार २२४ गाथाएँ वैदिक और लौकिक अनेक प्रकार की हैं २२४ रामायण प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्यों पर निर्भर—बुल्के २२७ बुल्के का उक्त कथन रामायणविरुद्ध २२८ बालकाण्ड के अनुसार नारदोपदिष्ट मूलरामायण तथा ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा रामायण के आधार २२८