भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ८ ) हरिवंश की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास पुराण प्रसिद्ध गाथाओं से ही २२८ हरिवंश यदि मान्य है तो तदनुसार राम का विष्णुत्व मान्य होना चाहिये २२८ हरिवंश में राम का ईश्वर हरि के अवतारत्वेन वर्णन २२८ सीता का लक्ष्मी के अवतारत्वेन वर्णन २२८ इक्ष्वाकु-वंश में रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति—बुल्के २२९ ‘इक्ष्वाकूणामिदं तेषाम्’ श्लोक का अर्थ है—महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में रामायणरूप महान् आख्यान की उत्पत्ति हुई न कि बुल्के द्वारा उक्त अर्थ २२९ महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व का संक्षिप्त रामचरित आख्यान काव्य पर निर्भर प्रतीत होता है, बुल्के का यह कथन असङ्गत २२९ महाभारत के बहुत पहले आर्ष वाल्मीकिरामायण के रहते उसे भुलाकर अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक उपाख्यानों को आधार मानना तर्कविरुद्ध २२९ वैदिक काल के बाद चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठीं शती में रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी यह कथन निष्प्रमाण २२९ रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण २२९ रामायण का निर्माण आर्ष-विज्ञान के आधार पर न कि आख्यानों के आधार पर २२९ आदि रामायण नाम की कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं २३० उपलब्ध समग्र बालकाण्ड प्रामाणिक उसके बिना रामायण की अपूर्णता २३२ वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर उसके गाने का आदेश दिया, उनमें कुश और लव ( सीता-पुत्र ) मुख्य २३३ कुश और लव काव्योपजीवी नहीं, रामपुत्र एवं सीतापुत्र २३४ निर्वासित सीता के करुण क्रन्दन से करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोकरूप में परिणत २३५ सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापनार्थ समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से गुप्त और प्रकट निखिल वृत्त जानकर रामायण का निर्माण २३६ कुश और लव का चमत्कारपूर्ण रामायण-गान २३७ कुश और लव का स्व-पुत्ररूप में राम को परिचय २३८ देवता, ऋषि, महर्षि, राजा, प्रजा आदि की महती सभा में सीता का प्रत्यय प्रदान २३९ माधवी देवी का प्राकट्य, सीता को सादर सिंहासन पर बैठा कर रसातल प्रवेश २४० अपने अमर महाकाव्य के निर्माण द्वारा आदि कवि सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापन में पूर्ण सफल २४१ कुश और लव के रूपसौन्दर्य, स्वरमाधुर्य, सङ्गीतकौशल आदि अपूर्व गुण २४१ नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ के यथार्थ ज्ञाता राम २४२ मत्स्य, कूर्म, वराह तीनों अवतार आरम्भ में प्रजापति के माने जाते थे, विष्णु का महत्त्व बढ़ने से विष्णु के माने जाने लगे । बुल्के के ये विचार भारतीय ग्रन्थों की वास्तविकता न जानने के दुष्परिणाम २४६ भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता २४७ विकासवादियों के विकासवत् मनुष्यमात्र राम में ईश्वरत्व का विकास नहीं हुआ, अनन्त कल्याण गुणगणास्पद राम में ईश्वरत्व परब्रह्मत्व स्वाभाविक २४७

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