भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १४ ) चतुर्दश अध्याय अयोध्या काण्ड ४५६-४७१ उदीर्ण रावण के वधार्थी देववृन्द की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में प्राकट्य ४५६ राम के विविध उत्तम गुणगण ४५६ मेदिनी की राम को पतिरूप में वरण करने की इच्छा ४५७ अयोध्याकाण्ड के प्रथमसर्ग को प्रक्षिप्त कहना निराधार ४५८ बालकाण्ड की प्रक्षिप्तता का खण्डन ४५८ राम का अयोध्या न लौटने का दृढ़ निश्चय ४६० पादुकाओं का वृत्तान्त ४६६ काकवृत्तान्त ४६७ राम का वनगमन ४६७ रामवनगमन के कारणों के विषय में अनेक रामायणों के अनेक मत ४६७ कौशल्या का रामबिछोहजनित दुःखावेश में अपने पूर्वजन्म के अनेक पापों की कल्पना करना ४६७ कैकेयी को वर-प्राप्ति का वृत्तान्त ४६९ कैकेयी का दोष निवारण ४७० मन्थरा के सम्बन्ध में विविध कथाएँ ४७१ पञ्चदश अध्याय अरण्यकाण्ड ४७२-५०३ अयोमुखीवृत्तान्त का दाक्षिणात्य पाठ में ही अस्तित्व ४७२ इन्द्र का सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त दाक्षिणात्य पाठ में प्रक्षिप्त तथा अन्य पाठों में अप्रक्षिप्त ४७२ याकोबी के आदिरामायण में चित्रकूटप्रस्थान के बाद अरण्यकाण्ड के आरम्भ का वर्णन, तदनन्तर पञ्चवटी आगमन का वर्णन ४७२ राम को जटायु का परिचय पहले न था पूर्वपक्ष का खण्डन ४७२ परम आस्तिक राम का ऋषियों से मिलन अत्यावश्यक ४७३ अनसूया-सीता-संवाद प्रक्षिप्त नहीं ४७३ प्रिय अतिथि राम के दर्शन किये बिना शरभङ्ग ऋषि की ब्रह्मलोकगमन की अनिच्छा ४७३ महर्षि अगस्त्य के समीप पहुँचकर राम का उन्हें प्रणाम करना उचित ४७३ लक्ष्मण का संयम ४७३ विश्वामित्र की वला और अतिबला विद्याओं के कारण क्षुधा और पिपासा की बाधा की निवृत्ति ४७४ बला और अतिबला राम के साथ लक्ष्मण को भी प्राप्त ४७४ लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता पिता मानते थे ४७५ भारतीय संस्कृति और संस्कृत से अपरिचित बुल्के का अनेक स्थलों पर अर्थावगति में प्रमाद ४७५ लक्ष्मण की सेवापरायणता ४७५