रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५ ) यात्रा की तथा लङ्का में सीता दर्शन की सब बातें संक्षेपतः कहीं— लङ्का दहन एवं कई राक्षसों के हनन की बात भी कही ९२ शुभ मुहूर्त में सेना का व्यूह बनाकर सबका लङ्का की ओर प्रस्थान ९२ समुद्रलङ्घन का प्रश्न आने पर समुद्र ने स्वप्न में राम से कहा—मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता। नल जिस पत्थर आदि को मुझपर रखेगा उसे मैं धारण करूँगा ९२ नल द्वारा सेना की सहायता से १० योजन चौड़े तथा १०० योजन लम्बे पुल का निर्माण ९२ शुक और सारण नाम के रावणचरों के तोह लेने आने पर उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया ९२ अङ्गद का दूत के रूप में रावण के दरबार में जाना और निर्भय होकर राम का सन्देश सुनाना ९३ वायुवेग वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार का तुड़वा देना ९३ वानरों का शिविर में प्रवेश करने पर राक्षसों द्वारा उनपर हमला करना ९३ सदलबल रावण का स्वयं युद्धभूमि में आना, श्रीराम के साथ घमासान युद्ध ९३ कुम्भकर्णवध ९३ इन्द्रजित् का रणक्षेत्र में आगमन, इन्द्रजित् का लक्ष्मण से घमासान युद्ध ९४ इन्द्रजित् द्वारा राम और लक्ष्मण को वरदान प्राप्त बाणों से चारों ओर से बाँध देना ९४ विशल्या ओषधि से दोनों क्षणभर में स्वस्थ और युद्धार्थ सन्नद्ध ९४ लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजित् का वध ९४ मातलि द्वारा आनीत रथ पर आरूढ़ होकर राम का रावण पर आक्रमण ९४ राम और रावण का अनुपम युद्ध, अन्त में राम ने रावण को धराशायी कर दिया ९५ रावण के मरने पर महर्षियों सहित देवताओं द्वारा राम पर पुष्पवृष्टि ९५ सीता के प्रति राम की शङ्का एवं वायु, अग्नि आदि देवताओं तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की विशुद्धि ९५ का वर्णन ९५ पञ्चम अध्याय बौद्धों तथा जैनों द्वारा विकृत रामचरित ९९-१७८ दशरथजातक की कथा ९९ अनामकजातक की कथा १०० दशरथकथानक की कथा १०१ राम की कहानी राम की जबानी १०२ छद्ममयी नीति से भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा राम का आधुनिक नास्तिक युवक के तुल्य चित्रण १०२ उक्त पुस्तक न राम की कहानी है और न राम द्वारा कही ही गयी है। वह मिथ्या वासुदेव निरी- श्वरवादी बौद्ध आनन्द कौसल्यायन के मस्तिष्क का फितूर है। उसमें छद्ममयी नीति का आश्रयण करते हुए वेदशास्त्रविरुद्ध, रामायणविरुद्ध अनेक अनर्गल कल्पनाएँ उल्लिखित हैं १०२ विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का-वध कर डाला, क्योंकि पिताजी की आज्ञा थी कि विश्वामित्र की हर बात का पालन करना, वाल्मीकि रामायण में कहीं ऐसा उल्लेख न होने पर कौसल्यायन का मिथ्या भाषण का यह एक नमूना १०५