रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) सीता के अनुरोध पर सीता की रक्षा में लक्ष्मण को नियुक्त कर राम का मृग पकड़ने जाना ८७ कनकमृग का कभी अन्तर्हित कभी प्रकट हो राम को बहुत दूर ले जाना ८७ राक्षस जान राम द्वारा अमोघ बाण मारने पर रामस्वर के तुल्य हा सीते, हा लक्ष्मण, चीखकर उसका धराशायी होना ८७ राम के अनिष्ट पर रोती हुई हतबुद्धि सीता का लक्ष्मण के प्रति शङ्का करना ८७ यतिवेष में प्रच्छन्न रावण का सीतापहरण ८८ जटायु के साथ रावण का युद्ध ८८ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार ८८ सीता की खोज में आगे बढ़ने पर कबन्ध से भेंट ८८ दोनों भ्राताओं द्वारा कबन्ध का वध ८८ शापमुक्त विश्वावसु गन्धर्व से सीतापहरणकर्ता का पता जान राम का पम्पातट पर गमन ८८ राम और लक्ष्मण का परिचय जानने के लिए सुग्रीव का हनुमान् को भेजनां ८९ हनुमान् से सुग्रीव का वृत्त जानकर राम का सुग्रीव के निकट गमन ८९ सुग्रीव और बाली का युद्ध ८९ राम द्वारा बाण से वाली का वध ८९ रावण का सीता को नन्दनोपम अशोक वाटिका में राक्षसियों के पहरे में रखना ८९ भीषण राक्षसियाँ सीता का तर्जन करतीं और कहतीं हम तुझे तिल-तिल कर खा जायेंगी । तू हमारे स्वामी की अवहेलना कर रही है ८९ सीता कहतीं—आर्याओ, मुझे खा जाओ नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन का मोह नहीं—त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना ८९ त्रिजटा का स्वप्न ९० भर्तृशोकाकुला दीना मलिनवसना पतिव्रता सीता को रावण ने देखा ९० पतिप्राणा सीता के सम्मुख रावण की दाल न गली ९० रावण का अपना अनुपम ऐश्वर्य बखान कर सीता के प्रलोभन का असफल प्रयास ९० शुभानना सीता ने मुख फेर कर और बीच में तृण रखकर कहा—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनी हैं। मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं सर्वथा अलभ्य हूँ, तुम मेरी ओर से मन हटा लो । ९० रावण का सीता की फटकार सुनकर चला जाना ९० माल्यवान् पर्वत पर वर्षाऋतु बिताकर-शरत्काल के आगमन पर श्रीराम की सीताविषयक स्मृति का उद्बोधित होना ९१ श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—वत्स, देखो तो सुग्रीव ग्राम्यधर्मों से प्रमत्त हो कृतघ्न तो नहीं हो गया ? ९१ सक्रोध लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचे, सुग्रीव ने कहा मैंने विनीत वानर सीतान्वेषणार्थ विभिन्न दिशाओं में भेज दिये हैं, उनके लौटने का समय सन्निहित है ९१ पवनात्मज आदि द्वारा मधुवन विध्वंस की खबर से सुग्रीव का कार्यसिद्धि का अनुमान ९१ सीतान्वेषणार्थ दक्षिण की ओर गये हुए ऋक्ष और वानरों से राम के पूछने पर हनुमान् ने कहा— मैंने आर्या सीता के दर्शन किये ९२