भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १० ) भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ, यह कथन सर्वथा असंगत, क्योंकि वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि २५५ श्रीराम ने सेतुबन्धन पर रामेश्वर शिवलिङ्ग की पूजा की, शिवपूजा की प्राचीनता का यह सर्वोत्कृष्ट प्रमाण २५७ श्रीराम का अतुलित सर्वोत्कृष्ट, यश, ऐश्वर्य और माहात्म्य २५८ श्रीरामनाम का अनुपम माहात्म्य २५८ रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध आपत्तियों से निस्तार पाता है एवं ऐश्वर्यवान् और पुत्रवान् होता है २५९ राम का स्तवन तथा दर्शन अमोघ एवं ऐहिक और पारलौकिक सुख का मूल २६० विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा अग्निपुराण अर्वाचीन नहीं वेद एवं पुराण अनादि, अपौरुषेय वेदों की अनुपूर्वी नहीं बदलती, किन्तु पौरुषेय पुराणों की अनुपूर्वी में विभिन्न कल्पों में परिवर्तन सम्भव २६० सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं २६३ अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थों का ही प्रामाण्य। अद्भुतरामायण द्वारा वर्णित उस घटना के अभाव में प्रमाणाभाव २६३ भारतीय भक्ति का इतिहास अतिप्राचीन काल से ही वेदों में वर्णित २६४ भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति २६४ उत्तररामचरित, जानकीहरण हनुमन्नाटक आदि में ही नहीं—वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकि रामायण में भक्तिभावना से ही रामचरित-वर्णन २६५ अध्यात्मरामायणवर्णित राम की बाललीला पर कृष्ण-बाललीला का प्रभाव नहीं २६५ रामायण के राम, भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही तत्त्व २६७ हरिवंश का काल ई० सन् ४०० के आसपास नहीं, महाभारत का काल ही उसका काल, क्योंकि वह महाभारत का खिल है २६७ भागवत का काल छठीं अथवा सातवीं शती नहीं। महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के अनन्तर भी जब व्यासजी का चित्त प्रसन्न नहीं हुआ तब नारदजी के परामर्श से उन्होंने भागवत की रचना की, अतः महाभारत के आसपास का काल ही उसका काल २६८ कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय, ७वीं ई० शती नहीं २६९ महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्त्तारूप से व्यास की प्रसिद्धि २७० लिङ्गपुराण को १०वीं शती ई० का मानना पूर्ववत् भ्रान्ति २७० वामनपुराण भी व्यास-कृति होने से अर्वाचीन नहीं २७१ प्रचलित नारदीय पुराण को १०वीं शती का कहना अनर्गल कल्पना २७१ पुराणों में प्रमुख स्कन्दपुराण प्रसिद्ध व्यासकृति ई० सन् से ३५०० वर्ष पूर्व रचित २७३ पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचना काल पृथक्-पृथक् कहना और उसके प्रचुररामकथासम्बन्धी सामग्रीवाले पातालखण्ड को १२वीं शती का कहना अटकलबाजी २७४ उपपुराण भी पुराणों के समसामयिक ही हैं उनका रचनाकाल, जो बुल्के ने निर्धारित किया है, अशुद्ध है २७५ पुराणों के लक्षण, नाम तथा श्लोक संख्या का विभिन्न पुराणों के अनुसार वर्णन २७८