रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाइयों के प्रति राम का कथन—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथिवी का राज्य तुम भाइयों के लिए ही चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य चाहता हूँ, यह मैं आयुध-स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुदमन के जो भी मेरा सुख हो, अग्निदेव उसे जलाकर भस्म कर दें— धर्ममर्थञ्च कामञ्च पृथिवीञ्चापि लक्ष्मण । इच्छामि भवतामर्थे एतत्प्रतिशृणोमि ते ॥ भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थञ्चापि लक्ष्मण । राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नञ्चापि मानद । भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतांशिखी ॥ राम का परम सुहृत्स्नेह श्रीराम के वनवासार्थ गङ्गातट पर पहुँचने पर निषादराज ने राम का पूर्ण स्वागत सत्कार किया और कहा—नाथ ! मेरा सारा राज्य आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी, हम सब आपके सेवक हैं। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, खाद्य पदार्थ तथा ये शय्याएँ एवं घोड़ों के लिये घास, चारा आदि सामग्री भी उपस्थित है। परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज के दिये गये भोजन, पानी आदि को ग्रहण नही किया, तथापि अपने व्यवहार तथा स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। उन्होने कहा—सुहृद्वर, आप मेरे समीप पैदल ही चले आये, आपके इस परमोत्कृष्ट प्रेम से हम अत्यन्त प्रसन्न एवं अर्चित हो गये हैं। अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं से निषादराज का निर्भर आलिङ्गन करते हुए राम ने कहा—प्रियवर ! हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ तथा प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे हैं। आपके मित्रों, वनों एवं राष्ट्र में कुशल तो है ? आप जो मेरे लिए लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार है, किन्तु मैंने वनचारी तपस्वी का व्रत धारण कर रखा है। इन व्रत के दिनों में मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण करके कन्द, मूल, फल अशन करता हूँ, अतः आप अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें । केवल घोड़ों के लिए चारा दाना मात्र ही मुझे अपेक्षित है। ये मेरे पिताजी के अत्यन्त प्रिय हैं। इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा । राम का शरणागतरक्षण व्रत विभीषण की शरणागति प्रसिद्ध है। भगवान् राम के सचिव सुहृद् सुग्रीव आदि विभीषण को शरण देने के विरुद्ध थे। वे कहते थे कि यह रावण का अनुज रावण का प्रणिधि बनकर हमारा भेद लेने या हममें फूट डालने, यदि मौका मिलें तो हममें से किसी पर सांघातिक प्रहार करने आया है। यदि रावण का प्रणिधि न भी हो, उसका विरोधी ही हो तो भी वह ग्राह्य नहीं है, क्योंकि ऐसे विपत्तिकाल में जो अपने सहोदर भाई का त्याग कर सकता है, अपने सगे भाई का अपना नहीं हुआ तो किसका विश्वस्त या आत्मीय हो सकता है। तस्मात् सर्वथा अग्राह्य है। भगवान् ने कहा—यदि वह प्रणिधि भी हो, हमारा भेद लेने आया हो तो भी वह रजनीचर हमारा सूक्ष्मातिसूक्ष्म भी अहित नहीं कर सकता। पृथिवी भर में जितने पिशाच, दानव, यक्ष तथा राक्षस हैं उन सभी का यदि इच्छा करूँ तो एक अङ्गुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ— पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥ ( वा० रा० ६।१८।२३ )